Friday, July 23, 2010

अद्भुत भूटान

अगर किसी देश का शासक कहे-"हमारे लिए जितनी महत्वपूर्ण लोगों की खुशहाली है उतना देश का सकल घरेलू उत्पाद(G.D.P.) नहीं है।"-----तो अजीब सा लगता है।हालाँकि कुछ अर्थशास्त्री भी सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा जनता कि खुशहाली को महत्व देते है. जैसे-हार्वे, लिविन्सतीन, हिंगिस आदि. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये बात एक निरंकुश शासक कहता है. 
और ज्यादा अजीब-सा लगता है किसी देश की जनता को ये लगता हो कि लोकतंत्र ली स्थापना से देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है, सत्ता से अछूते लोगो को सत्ता का स्वाद मिल जायेगा और वो सत्ता के लिए लड़ने लगेंगे।
बचपन में जब सुना कि भूटान में कोई सिनेमा नहीं है तो बड़ा अजीब सा लगता था कितना बेकवर्ड देश है। बाद में पता चला कि वहां पर एक सिनेमा बन गया है। २००५ के आस पास पता पता चला कि वहा के राजा ने बड़ी ही बहादुरी से वहा के उग्रवादियों को काबू में किया।
दरअसल  इस देश के  बारे में मुझे बहुत कम जानकारी है.......मुझे ही क्या ज्यादातर लोगों को कम ही जानकारी होगी. उसकी वजह ये है क्योंकि  ये देश खबरों में कम ही रहता है.बेसिक जानकारी
# नाम का अर्थ-संस्कृत में -भू+उत्थान =ऊंची भूमि
                      अन्य मन्यता- भोग+अंत= तिब्बत का अंत
                     *यहाँ के मूल निवासी इसे द्रुक-युल यानी ड्रेगन का देश कहते है.
#मूल निवासी -गांपोक, जिनता सम्बन्ध तिब्बत से है.           
                    उसके बाद नेपाली हिन्दुओं की बहुलता है.           
                    उसके बाद शरपोच और ल्होतशांप आते है             
                   *यहाँ के निवासियों को द्रुपका कहा जाता है
#राजधानी-    थिम्पू




#आधिकारिक धर्म - बौध (महायान शाखा)
                              १७ वी सदी में बौध धर्म को अंगीकार किया.




#आधिकारिक भाषा -जोंगखा ( Dzonkha)
# मुद्रा - डुल्त्र्म
तथ्य
*१८६५ में भूटान और ब्रिटेन के बीच 'सिनचुल संधि' पर हस्ताक्षर किये गये. जिसमे तय किया गया कि भूटान के सीमावर्ती भूभाग के बदले वार्षिक अनुदान का करार किया गया.
*१९०७ में वर्तमान राजशा ही अंग्रेजों कृपा से स्थापित की गयी. १९१० में एक समझौता किया गया जिसके तहत ब्रिटेन भूटान के आन्तरिक मामलो में दखल नहीं देगा परन्तु उसकी विदेश नीति इंग्लेंड द्वारा तय की जाएगी
      १९४७ ई० के बाद ये भूमिका भारत को को मिल गयी. १९४९ में भारत ने - जो इन्गलैंड के अधीन थी-साडी जमीन भूटान को लौटा दी
हिमालय कि गोद में बसे इसदेश को मैं अद्भुत ही कहूँगा. किसी  देश में  बिना संविधान के सफल शासन हो रहा हो( ध्यान  दें वहां बोध मान्यताओ के अनुसार शासन किया जाता था) अब सुना है वहां संविधान तय कर दया गया है. सबसे बड़ी बात है उस देश के नागरिक संतुष्ट थे.
हमारे रिश्ते  
सब जानते  मैं एक कमीना इंसान हूँ हमेशा ही दिमाग से सोचता हूँ. मैं मानता हूँ कि भूटान में लोकतंत्र का आना सैधांतिक रूप से ठीक है मगर सोचने वाली बात ये है कि उसका हमे कितना फायदा होगा?
एक बात तो भूटान के लोगों ने ठीक सोची थी कि लोकतंत्र के आने के बाद वहां पर सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो जायेगा. सत्ता के लिए लोग कुछ भी करने लगेंगे. मुझे  लगता है हमे थोडा सतर्क हो जान चाहिए. पहले सत्ता एक आदमी के पास केन्द्रित थी और वो भारत का समर्थक था- अब वो बिखर चुकी है इसका फायदा चीन जरूर उठाएगा और उन लोगों को सत्ता पर काबिज करने कि कोशिश करेगा जो भारत का विरोध करते है. वो भूटान में राजनैतिक  उथल-पुथल भी मचाने कि कोशिश करेगा.ऐसा नहीं है कि वो भी समस्याओं से अछूता है जातिवाद को लेकर वहां भी दिक्कत है. वहाँ भी कई जातीय निवास करती है वो अपने बन्दे को सत्ता में लाने कि कोशिश जरूर करेगी. चीन उस फूट का फायदा जरूर उठाना चाहेगा.  हो सकता है वो भूटान को भी पाकिस्तान और बांग्लादेश कि तरह इस्तेमाल करे.

Wednesday, June 30, 2010

दो मुहें सांप

मैं शक्ल से ही ढक्कन नजर आता हूँ कई बार इसका बड़ा फायदा मिलता है। कम पढता हूँ पर कभी कभार दिमागमें कीड़ा उभर जाता है तो अग्रवाल भाई साहब की दुकान पर जाकर पढने लग जाता हूँ। उस दिन भी मैं एक साइड में बैठा पढ़ रहा था तब एक मुस्लिम अंकल वहां आये और अग्रवाल भाई साहब से बात करने लगे। इस्लाम का मतलब बताने लगे। मुझे बातें ठीक- ठाक लगीं मगर इरादा सही नहीं लगा। मुझे लगा अग्रवाल भाई साहब फंस चुके थे। सो मैं कुर्सी पर से उठकर उनके पास को  खिसक गया। इस्लाम दुनिया का सबसे पुराना धरम है...... इस्लामये कहता है...........इस्लाम वो कहता है..........इस्लाम हिंसा विरोधी है.....इस्लाम कभी किसी को किसी की जमीनपर नमाज तक अदा करने की इजाजत नहीं देता.....।
उस बीच उन साहब ने मुझसे-" क्यों मैं ठीक कह रहा हूँ  न?"- खाकर मेरा समर्थन लेना चाहा।
तब मैंने-" मुझे इतनी अक्ल  होती तो मैं वहीँ कुर्सी पर ही बैठा रहता, आपके पास आपकी बात सुनने के लिए नहीं आता। मैं तो आपसे जानकारी लेने के लिए उठकर यहाँ आया हूँ। "- कह दिया।
उन्होंने बात आगे बढ़ाई  -जरूरी नहीं जो इस्लाम को मानता  हो सच में ही मुसलमान हो..........मुसलमान वो है जिसका ईमान सच्चा हो.......वगैरा-वगैरा।
उस समय मैंने एक सवाल किया - " अंकल एक बात मेरी समझ में नहीं आई। इतिहास गवाह है कि जब मुस्लिम शासक भारत में आये तब उन लोगों ने हिन्दू मंदिर तुड़वाकर मस्जिदे बनवाई। वो जमीन तो हमारी हैं न अब हम अगर वहां दोबारा से मंदिर बनवाये तो गलत क्या है ?"
चचा जरा बोखला गए क्योंकि वो अपने ही जाल में फंस चुके थे। उनके पास कोई जवाब नहीं था। उसके बाद उन अंकल ने आल-बबाल बकना शुरू कर दिया जिसका कोई मतलब नहीं था। हकीकत ये थी कि अग्रवाल भाई साहब वहां अपना धंधा करने बैठे थे उन्हें तो ग्राहक की दस फालतू बातें सुननी पड़ती है- सो वो झेल रहे थे। मुझे लगा अगर उन अंकल की टांग  नहीं खीची गयी तो वो भाई साहब के दिमाग का बैंड बजा देंगे।

खैर, मुझे मंदिर मस्जिद के बनने से कभी कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि मेरा मानना है की धर्म मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे,या किसी निश्चित धार्मिक जगह पर नहीं पनपता वो तो आचार-विचारों में पनपता है। मैं शायद उस बन्दे की बातों को ध्यान से भी सुनता और उनकी इज्जत करता अगर वो दूध का धुला होता। मैंने उन अंकल को कभी भी धार्मिक किताब खरीदते हुए या किराये पर ले जाते हुए नहीं  देखा है जबकि मैं वहां कई सालों से बैठ रहा हूँ मैंने उन्हें हमेशा क्राइम मैगज़ीन खरीदते ही देखा है( `मधुर कथाए' के तो वो रसिया है सुना है वो मस्तराम भी काफी पढ़ते थे जब वो उपलब्ध थी)
पता है सही बात सोच लेना बड़ा आसान है। सही बात करना भी आसान ही है मगर एकदम सही बात करना मुश्किल है क्योकि जब आप बात करते है आपके मन की हकीकत झलकती है बस कोई उसे पकड़ने वाला चाहिएऔर सही बात को व्यवहार में ले पाना बेइन्तहा मुश्किल।
बात मात्र एक मुस्लिम धर्म की नहीं है हकीकत तो ये है जो राजनैतिक पार्टी वहां मंदिर बनवाना चाहती है वो भीधर्म के लिए कुर्सी के लिए सब कर रही है। अगर उन नेताओं के इरादे नेक है तो वो अदालत में खड़े होकर सीना तानकर स्वीकार क्यों नही करते की वो कांड उन लोगों ने कराया था। वो क्यों मीडिया के सामने बैठकर मुस्लिम धर्म के उलेमाओं से इस बारे में सीधी बात नहीं कर लेते। अगर उनकी बात में दम है उन्हें सच में इतिहास और धर्म की जानकारी है तो क्यों मुंह छिपा रहे है? हकीकत तो ये है कि उन्होंने भी सही गलत के बारे में सोच ही नहीं- इतिहास, धर्म और देश के बारे में सोच ही नहीं। सोचा है तो बस कुर्सी के बारे में। कुर्सी मिली तो पाकिस्तान का विरोधी स्वर दोस्ताना हो गया। लोह पुरुष पिघल  गये और कंधार विमान काण्ड होते ही ९०० करोड़ रूपये देकरआतंकवादी को आजाद कर दिया। मजे कि बात है कि कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं।
मुद्दा एक ही धर्म का नही हर धर्म का है। यूरोप से जो लोग आए वो मात्र व्यापर के मकसद से नहीं आए उनका मकसद यहाँ अपना धर्म भी फैलाना था जब यहाँ उनका राज कायम हो गया तो लोगों को अपने धर्म में शामिलकरने की कोशिश तेज कर दी गयी वो १८५७ के नागरिक विद्रोह का मुख्य कारण भी बना। हर धर्म के ठेकेदार धर्म की  बात करते है मगर सम्प्रदाय के रास्ते पर चलते है। सब कहते है इश्वर एक है मगर दूसर के इश्वर का विरोध करते है।सबके भीतर गड़बड़िया है मगर वो अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करने के बजाये दूसरों पर कीचड उछालने में लगे रहते है। खुद सन्यासी जो समस्त मानवता कि सेवा का प्रण लेकर मानवीय एकता का प्रचार करने कि बात करते है वो ही कुम्भ के मेले में मार-काट मचाते है।केवल अपनी ताकत का प्रदर्शन करने केलिए। आप सत्संगों में जाओ । धर्म के नाम पर एक नए संप्रदाय की शुरुआत के निशान मिलेंगे।सबका ध्यान इतना समाज सेवा में नहीं जितना अपने ग्रुप को फ़ैलाने में है।
मेरे ख्याल से धर्म उनके ठेकेदारों के लिए एक धंधा होता है कुछ भी हो ज्यादा से ज्यादा प्रचार हों चाहिए भले ही उनमे कितनी भी कमी क्यों न हो। कुछ भी हो किसी भी तरह फोलोवर बढ़ने चाहिए। एक जुबान से एकता की बात करते है दूसरी जुबान से अपने मासूम लोगों के अन्दर सच्ची झूठी बातों में मसाला लगाकर जहर भरते है। जो लोग उन्हें स्मार्ट दीखते है वो उन्हें कभी भी छेड़ते है बस  उन्ही को ये दो मुहें लोग अपना टार्गेट बनाते है जो इन्हें ढक्कन नजर आते है या जो इनकी बात सुनते है। जैसे उन अंकल ने मुझे टार्गेट बनाने की कोशिश्की। ये बात जुदाहै उनका दांव मुझपर नहीं चला वैसे ढक्कन(कैयरलेस) बनकर रहने का भी अपना ही मजा है क्योंकि ऐसे लोगों केसामने लोग अपनी ओकात जल्दी दिखा देते है।

Monday, June 14, 2010

राजनीति- खोदा पहाड़ निकला चुहिया का बच्चा

मैने`राजनीति' देखी। सच बड़े ही अरमानों के साथ PVS में फिल्म देखने गया कि शायद कुछ ओरिजनल देखने कोमिल जाये। फिल्म की मार्केटिंग बध्गीय की गयी थी लेकिन जिसका प्रचार किया गया था वो चीज नहीं मिली।प्रचार किया ऐसे गया था कि जैसे पूरी फिल्म ही कटरीना के ऊपर टिकी हो मगर फिल्म देखने पर वो मुझे बस शोपीस से ज्यादा नजर आई। उसे हर जगह इस्तेमाल सा किया जाता रहा- या लिखूं इस्तेमाल ही किया जातारहा।बाप ने अपने व्यापार के लिए इस्तेमाल किया और उसकी शादी अर्जुन रामपाल से कर दी। बाद में रणबीरकपूर ने उसे राजनीति में उतारा ताकि उन्हें मुख्यमंत्री कि कुर्सी मिल सके। अरे यार जब सबकुछ है तो नेतागिरीकरनी जरूरी है क्या???? करनी भी है तो खुद करो ओरो को क्यों इसमें धकेला जाता है। मुख्यमंत्री पद के लियाजब नाना पाटेकर था तो कटरीना क्यों ????
यार मार्केटिंग के लिए बेस तो बना ही था न- वर्ना प्रकाश अंकल क्या कहते कि उन्होंने `गोडफादर' औरमहाभारत' कि कोकटेल हमें परोसी है ??????
मार्केटिंग का ही जलवा है कि प्रकाश अंकल ने केटरीना को फोकस में लेकर फिल्म में हवा बांध दी कि उसका चरित्रसोनिया गंधी से मिलता जुलता है, फिल्म पूरी तरह उसी पर टिकी है.....लोग थियेटर कि और भागने थे ही- भागेभी।असल में फिल्म में मास्टरमाइंड था समर (रणबीर कपूर) । पूरे करते है प्रोमो में केटरीना कॉटन की सदी मेंछाई रही,जबकि केटरीना का वो रूप मात्र कुछ मिनटों का था। १:३८ पर केटरीना का कोत्तों की सदी में पहला सीनआया और २:०७ मिनट पर मैं फिल्म ख़त्म होने के बाद PVS से बाहर उसकी पार्किंग के पास पहुँच चुका था।
` अब बात करते है गोडफादर से समानता की...........
* समर का चरित्र गोडफादर के माइकल कारलिओन से मिलता है।
वो भी माइकल की तरह अपने पारिवारिक काम से दूर रहता है।उसे भी अपने पिता पर हमले की खबर तभीमिलती है जब वो परिवार से दूर हो रहा है। ध्यान दें समर उसी सीन से पहले बताया यह की वो हमेशा के लिएअमेरिका में बसने जा रहा है।
वो भी बाद में बेहद क्रूर हो जाता है।
* प्रथ्वी( अर्जुन रामपाल ) का चरित्र सनी के जैसा है। गुस्से वाला। क्रूर।


कहानी में तो सीन दर सीन गोडफादर से मार रखे है जैसे-
*जिस तरह डोन कारलिओन जैक वाल्ट्ज़ के बेडरूम में रात को उसके सबसे प्यारे घोड़े खार्तूम की गर्दन काटकररखकर जैक वाल्ट्ज को अपनी बात मानने पर मजबूर करता है उसी तरह समरऔर मामा भी विरोधी ग्रुप केआदमी को उसके ` यार' का उसके बेडरूम में क़त्ल करके और उसके `अन्तरंग' पलों की तश्वीरें उसे दिखाकर उसेमजबूर करते है।
* समर के पिता का क़त्ल ठीक उसी तरह किया जाता है जैसे गोडफादर में सनी का किया गया था। जैसे सनी कोसनी को एक जगह पहुँचने के लिए निर्देशित किया गया और रास्ते में उसे रोककर क़त्ल किया गया ठीक उसीतरह समर के पिता का क़त्ल किया गया।
* जिस तरह गोडफादर में कार में ड्राईवर द्वारा बम प्लांट करके माइकल की हत्या की कोशिश में उसकी पहली पत्नीअपोलोनिया मरी जाती है उसी तरह समर की अमेरिकन गर्लफ्रेंड और उसका भाई प्रथ्वी (अर्जुन रामपाल) मारेजाते है।
*समर ठीक उसी तरह से दुश्मन के आदमी से अपने पिता के क़त्ल की साजिशकर्ता का नाम उगाल्वता है जैसेमाइकल ने कार्लो रित्जी से उगलवाया था।
और बाद में कार में प्यार से विदा करके कार में ही क़त्ल करवा दिया .........फर्क बस इतना है की कार्लो रित्जी कोगले में फंदा डालकर गला घोंटकर मारा गया था,` राजनीति' में बम लगाकर बन्दे को मारा गया था।
* समर को जब हॉस्पिटल में S.P. थप्पड़ मारता वो सीन भी गोडफादर से ही कॉपी किया गया है जब माइकल कोकैप्टन मैक क्लान्सकी थप्पड़ मारता है।


कुल मिलकर मुझे राजनीति ने पूरी तरह निराश किया। सोच था कुछ नया शानदार मिलेगा मगर उसे देखकर एकही बात दिमाग में आई कि खोदा पहाड़ निकला चुहिया का बच्चा .........चुहिया भी नहीं निकली यार।

Friday, June 4, 2010

सेक्स समाज और मीडिया

अभी नयी (मई के महीने की)` फेमिना' मैगजीन में तीन swinger couples के साक्षात्कार पढ़े- सच कहूँ तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि मेरी जानकारी में ये तत्थ्य है की ऐसे ऐब अब काफी चल रहे है। हालाँकि महिलाओ की मेग्जींस में सेक्स के टोपिक्स मिलना कोई नई बात नहीं है। हर मैगजीन में ये चल रहा है।
उदाहरण के लिए-
साथी मूड न होने का बहाना करे तो पूरी लाइट्स को बुझा दे व चुपके से न्यूड हो जाएँ या पारदर्शी वस्त्र पहन लें। उसके पास लेटकर ऐसी आवाजें निकालें जैसे आपको कोई प्रॉब्लम हो। साथ ही कोई पोर्न मूवी की सीडी लगा दें। जैसे ही वो लाईट ऑन करें तो वी.सी.डी. ऑन कर दें व उसे निमंत्रण दें.
गृहशोभा, अगस्त(द्वितीय) २००८
चेप्टर -१० लव गेम्स, पेज ३८-३९



ये तो कोई बड़ा उदाहरण नहीं है आप महिलाओं वाली मेग्ज़िन्स पढोआपको हर इशू में सेक्स से जुड़ा कोई न कोई चेप्टर जरूर मिलेगा।
हालांकि पढाई लिखाई के मामले में मेरा हाथ हमेश ही टाईट रहा है मगर थोडा बहुत कभी- कभार पढ़ भी लेता हूँ। चलिए मार्केट सर्वे देता हूँ। अब बात करते है दूसरी मेग्जिंस की- इंडिया टुडे, आउटलुक- साल में एक बार सेक्स सर्वे जरूर देती है। हरेक हेल्थ मेग्जिन में सेक्स के बारे एक चैप्टर जरूर होता है निरोग-धाम, निरोगी दुनिया जैसी मेग्जींस शादी के सीजन के शुरू होते ही एक सेक्स स्पेशल इशू जरूर निकालती है, उसकी कीमत भी ज्यादा रखती है, वो इशू हाथों हाथ बिकता भी है। मुझे अब तक कोई मैगजीन नजर ही नहीं आई जिसने सेक्स को न छुआ हो।हर प्रकाशक सेक्स के ऊपर किताब छापता है। जितना बड़ा प्रकाशक उतनी ही बोल्ड किताब। तकरीबन हर बुक स्टाल वाला सेक्स के ऊपर किताब रखता है। अगर बड़े लेवल का सेलर है तो आराम से `penthouse' ले लो बस आप विश्वास के आदमी होने चाहियों।
`cosmo' को पढो यार आपको कामसूत्र पढने की जरूरत ही नहीं है। उसका ` love nd lust' पढो। पार्टनर को खुश करने के सारे दांव पेंच आप सीख जाओगे। मजे की बात है साहित्यकार अपनी रचना में जनन अंगों का नाम तक लिख दे। तो बवाल मच जाये। समाज के ठेकेदार, महिला संगठन कार्यकर्त्ता आन्दोलन खडा कर दें मगर मुझे अभी तक ` cosmo' के खिलाफ-जिसमे ओरल सेक्स करने तक के तरीके बताये जाते है, किस जगह पर किस तरह किस आसन से सम्बन्ध बनाने चाहिए ,जिसमें लुब्रिकेंट्स को इस्तेमाल करने का तरीका बताया जाता है - आज तक कही आवाज उठी नजर नहीं आई। क्यों?? ये बात मेरी समझ में नहीं आई ।
अब सवाल ये है की वे सही है या गलत????


पता है लाइफ में किसी भी चीज की बुराई करना बड़ा आसान है मगर उस चीज की अच्छाई को समझकर उसका फायदा उठाना हर किसी के वश की बात नहीं है।
बात तब की है जब मैं १२वी क्लास में पढता था। तब मैं दिलजला टाइप का बंदा था। गंभीर रहता था। ये रोग मुझमे बचपन से ही था। अपने आप में मगन रहना। हालांकि अपने घर में और होस्टल रूम में प्रेंक्स किया करता था मगर बाहर चुप रहता था सचमुच मेरी गंभीरता मुझपर हावी सी होने लगी थी। दोस्त थे, मगर हर किसी के साथ मैं खुलकर बात नहीं करता था। तब मेरे एक टीचर ने मुझे मुझे सलाह दी कि मैं दोस्तों के बीच नोनवेज जोक्स शेयर किया करूं। मुझे लगा कि वो शख्स मुझे भटकाना चाहता है। मैने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। हकीकत ये भी है पागल तो था, स्ट्रेट फोरवर्ड भी था मगर वल्गैरिटी मेरी लाइफ में नहीं आई थी।फनी बात ये है जिसपर लाइन मारता था उसका नाम तक नहीं लेता था।
उसके बाद थोडा सा बड़ा हुआ व्यावसायिक राइटर बना तो हर चीज लिखनी पड़ी और मैने लिखी भी। वहां सब मुझसे काफी बड़े थे पब्लिशर के ऑफिस में बैठकर बातें होती थी तब बोल्ड बातें भी होती थीं। फिर अपने ही मूड से एक लव स्टोरी बेस्ड नोवेल लिखा। शादी के बाद के बेडरूम सीन्स में शैतानियों का डिस्क्रिप्शन किया......बिंदास किया और बाद में उसका सर्वे किया। उसका रेस्पोंस मेरे लिए हैरानी भरा था। उसे किसी ने भी गन्दा नहीं कहा। बल्कि मेरे प्रूफरीडर ने उसे घर ले जाकर अपने परिवार और दोस्तों को पढ़ाया। कुछ पत्र मेरे पास आये। मिस पारुल - जो अब शादीशुदा है शायद- उन्होंने मेरे भाव बढाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। तब मैने इस मुद्दे पर सोचना शुरू किया। नोवेल को दोबारा पढ़ा- तब मैंने समझा _१- मैंने जो लिखा था वो गलत नहीं था(ये मैं पहले ही जानता था) २-हर सीन में लोजिक था। ३- मेरा शब्दचयन सटीक था, मैने लिखा सबकुछ था मगर चीप कुछ भी नहीं था।४- सबसे बड़ी बात थी मेरे नायक ने जो किया शादी के बाद किया, प्यार के चक्कर में पड़कर काम से अपना फोकस नहीं खोया, परिवार के मूल्यों का पालन किया(यही वजह थी की एक त्यागी जी ने उसे प्रेरणादायक नोवेल कहा )।
अगर घ्यान से देखा जाये तो समाज सेक्स को गलत नहीं मानता। उदाहरण के लिए आप शादी की तमाम रस्मो की स्टडी कर लो, सब रस्मो के मतलब समझने पर आपकी समझमे आ जायेगा । शादी के बाद दम्पति को अलग रूम दे दिया जाता है जब जोड़ा उस कमरे में होता है तब घर का कोई भी बंदा उस कमरे में जाने की कोशिश तक नहीं करता अगर जोड़े में से किसी से काम भी होता है तो उसे आवाज देकर बाहर ही बुलाया जाता है या उन्हें अपनी आमद की बाहर से जानकारी देकर ही उनकी इजाजत लेकर रूम में जाया जाता है।

सवाल सेक्स को गलत माना क्यों जाता है ?????????
हमें इससे बचने के लिए क्यों कहा जाता है?????

सच ये है की शारीरिक सुख हासिल करना कोई गलत नहीं मानता मगर कोई भी माँ-बाप ये नहीं चाहते की उनका बच्चा पतन के रास्ते पर चले। हर काम का एक सही वक़्त होता है। ये शारीरिक सुख ही है जो दम्पति को करीब लाता है, उनके रिश्ते का बोंड मजबूत करता है। इसके बिना तो दम्पति केवल एक दूसरे को मजबूरी में झेलते हैं। हर आदमी जानता है कि ये लाइफ की जरूरत है और मानते भी हैं कि ये जिन्दगी के तनावपूर्ण पलों के लिए सबसेशानदार टोनिक है, और हर आदमी इसका इस्तेमाल करता है। लेकिन उन्हें ये भी पता है कि इस राह में कितनीफिसलन है एक बार गिरे कि जल्दी से उठने का मोका नहीं मिलता।
सच लिखूं तो मैं शारीरिक स्वच्छन्दता का समर्थक नहीं मैं नहीं कहता कि हमें भी स्वापिंग जैसे काम करने चाहियेंया शादी से पहले ही ये सुख हासिल करना चाहिए हजारो सालो से हमारे पुरखों ने जो नियम बनाए है उनमे कोई तोबात होगी ही जो वो इतने सालों से समाज में टिके हैं। समाज के नियम बनाने वालो को पता था कि इंसान किजरूरतें क्या है ये हम ही है जो या तो सही जानकारी नहीं रखते और रस्ते से भटक जाते है या जानबूझकर ही उनसही बातो कि गलत व्याख्या देकर उनका इस्तेमाल अपने लिए करते है।

मैंने इस समाज में एक अजीब सा रिवाज देखा है -जो पावरफुल है वो कुछ भी कर सकता है उसके ऐब उसके शोक कहलाते हैं। जो शर्मदार है वो बस सही गलत के बारे में ही सोचता रह जाता है और बेशर्म अपनी तमाम ख्वाहिशें पूरी कर लेते हैं। नियम तो उनके लिए बनते है जो उन्हें फोलो करते है या तोड़ने से डरते है या इस सुकून से जीना चाहते है कि उन्होंने जिन्दगी भर किसी को अपनी तरफ ऊँगली नहीं उठाने नहीं दी।ताक़तवर हमेशा नियम बनाता है या बदलता है।बेशर्म कोई नियम फोलो नहीं करता वो तो बस नियम तोड़ने के तरीकों के बारे में और तोड़ने के बाद बहानो के बारे में सोचते है न कि दुनिया वाले क्या कहेंगे???

पावरफुल के खिलाफ कभी आवाज नहीं निकलती निकलेगी भी कैसे नियम तो उसी ने बनाए होते है या जब भी उसेकुछ अपने खिलाफ नजर आता है तो वो नियम ही बदल देता है या बदलवा देता है।
अंत में बस एक बात लिखूंगा जिन्दगी में आप कुछ भी करो, बस एक बात याद रखना समाज आज आपका है कलआपके बच्चो का होगा आप इसे जैसे बदलोगे वैसा ही आपके बच्चों को मिलेगा। याद रखना बाबू - शेर भी बूढा होता है, आप भी बूढ़े होओगे, हो सकता है ऐब करके पतन से बच जाओ मगर जरूरी नहीं कि आपके बच्चे भी आपजितने ही स्मार्ट हों, जब आपके भी बच्चे पतन के रास्ते पर चलेंगे तो आप उन्हें कैसे रोकोगे????
मीडिया का काम आज कि तारीख में खबरे बेचना हो गया है। सब व्यापार कर रहे है रे मामू तेरे को खुद हीसमझदार बनने को मांगता है समझदार बनजा बच्चा वर्ना अपने बच्चो को कैसे समझदार बनाएगा????
समाज तेरा है सोच ले कल को तेरे बच्चे तेरे से ये न कहे -` डैड तूने अपुन को कैसा समाज दिया है कि मेरे बच्चे ही डवलप नहिऊ हो पा रहे है'

Thursday, May 20, 2010

२६\११ का हीरो

तारीख-२६ नवम्बर २००८।
दस आतंकवादी समुन्द्र समा की चोकसी को भेदकर मुंबई के पार्क कफ परेड के सामने भंडारकर मच्छीमार कालोनी पहुंचे। ११ A.K.-47, 834 A.K.-47 कारतूस ६५ मैगजीन, १० पिस्तोल, २१ मैगजीन, ९५ कारतूस, ९ हथगोले २४ किलो RDX से लैस। एक चुस्त अचूक कुशल और जटिल योद्धिक कार्रवाही के लिए पूरी तरह तैयार।
वहाँ से वो जब अपना ख़ूनी तांडव शुरू करने के लिए निकले तो पूरी मुंबई ही नहीं, पूरा देश क्या पूरी दुनिया हिल गयी। शहर में मझगाँव डाकयार्ड और विले पार्ले इस में धमाका किया गया।इस पूरी कार्रवाही में १७३ लोग मरे जिसमे १०० भारतीय थे बाकि विदेशी थे, तकरीबन ३०८ लोग घायल हो गए। तारीफ़-ऐ-काबिल होसला हमारे जवानों ने भी दिखाया और बड़ी तेजी के साथ उस स्तिथि पर काबू पा लिया।
अगर इस हमले की समीक्षा की जाये तो साफ समझ में आता है कि ये एक फिदाइन हमला था उन दस लोगों का मकसद का इंडिया में आकर तबाही मचाना था तब ताका तबाही मचाते रहना था जब तक वो मर न जाएँ। वेसे इस सच को कसाब भी स्वीकार कर चूका है। ............ उनका मकसद था विदेशों में इंडिया कि छवि को धूमिल करना-ताकि वो इंडिया आने से, यहाँ व्यापार करने से डरें -जिससे इंडिया के पर्यटन और अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचे।इसीलिए उन लोगों ने विदेशियों को चुन-चुनकर मारा, ये कहकर मारा कि इंडिया अब उनके लिए सुरक्चित नहीं है। उनका मकसद सिर्फ तबाही मचाना ही नहीं था बल्कि लम्बे समय तक तबाही मचाना था ताकि वो मीडिया में छाए रहें और लोगों के दिलों में ज्यादा से ज्यादा डर पैदा हो। सच तो ये है कि वो अपने मकसद में काफ्ही हद तक कामयाब भी रहे थे।
सब जानते हैं की उसके बाद इंडिया के पर्यटन को कितना बड़ा धक्का लगा। दूसरे- जिस कदर इंडिया की प्लितिच्स में उथल पुथल मची थी ये सब जानते है। सबसे बड़ी बात ये है कि वो दस के दस हीरो बन चुके है। कैसे?????????
चलिए इस घटना को दूसरे नजरिये से देखते है। ........... दस `जांबाज' फिदाइन इंडिया कि सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर इंडिया की आर्थिक राजधानी में पहुंचे और वहां तबाही मचानी शुरू कर दी।जांबाजों ने ६० घंटों तक शहर की पुलिस और इंडिया की फोज को धता बताई और लगातार क़त्ल-ऐ-आम मचाते रहे। उन जाबांजो को काबू में करने लिए इंडिया की फोज को अपनी सबसे बेहतरीन टुकड़ी को लगाना पडा तब भी वो उन पर ६० घंटे तक भारी पड़े। उन्होंने सारे देश में दहशत की लहार पैदा कर दी। उन सबने अपने इस मिशन के लिए अपनी अपनी जान दे दी बस एक जांबाज जिन्दा बचा- वो जांबाज है आमिर अकमल कसाब। जिसकी सुरक्षा के लिए इंडियन सरकार २०० करोड़ रूपये हर महीने खर्च करती है.............ये सब जानकर कट्टरपंथी समुदाय के लोगों के लिए कसाब का कदकितना ऊंचा हो गया होगा-क्या ये किसी ने सोचा है??????? शायद लोग भूल गए कि ज्यादातर लोग उसकी ओर आकर्षित नहीं होते जो अच्छा काम करता है बल्कि उसकी ओर आकर्षित होते हैं जो बड़ा काम करता है। अपनेलिए नए फिदायीन तईय्यार करने के लिए हमारे दुश्मनों को कितना बड़ा सहारा मिला है शायद ही किसी ने सोचाहो। ये सब जानकार जाने कितने मासूम लड़के कसाब बनना चाहेंगे ताकि उन्हें भी इतिहास में जगह मिले ओरउन्हें जन्नत नसीब हो।
हमारा महान मीडिया भी उनके कारनामे को लगातार दिखता रहा। लोगों के आंसू देखकर पकिस्तान में बैठे उनलोगों कि मुस्कान के बारे में किसी ने नहीं सोचा जो हिन्दुस्तानियों को रोता हुआ देखना चाहते है। मैं तो कहता हूँ येबताना ही नहीं चाहिए था कि वो कोण थे। कुछ पागलों ने मुंबई में कत्लेआम मचाया ओर वो मारे गए या पकडेगए। जो पकड़ा गया उससे सब उगलवाओ और एक्शन लो। ये तो पक्की बात है अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में जाकर कोईफायदा नहीं होने वाला है। कश्मीर मुद्दा लेजाकर इंडिया देख चुका ही है।
अबकी स्थिति देखो सजा को सुनाने से पहले कसाब कितना नोर्मल सब जानते है। वो नोर्मल क्यों था क्योकि उसेपता था कि उसे मौत कि सजा मुश्किल होगी। उसे इतना यकीन क्यों था क्योकि वो जानता था कि इंडिया काक़ानून कितना लचीला है। प्लस उसके सपोर्ट में यहाँ भी लोग मौजूद है।
खैर उसे सजा तो हो गई है पर उसे फंसी पर लटकाया कब जायेगा लटकाया जायेगा भी या उसे भी माफ़ कर दियाजाएगा या उसका भी मामला राष्ट्रपति जी कि अदालत में पेंडिंग पड़ा रहेगा???? वैसे अब पाकिस्तान केस कोअंतर्राष्टीय कोर्ट में ले जा रहा है। वहां की होगा। जब अमेरिका सद्दाम को तय तारीख से पहले फांसी पर लटकासकता है तो हम क्यों कायदों का राग अलाप रहे है। लगाओ उसे फांसी-इन्तजार किस बात का है????? हम यानहीं कर सकते देश तबाह हो जाये हम कायदों से नहीं डिगेंगे। कायदे का इस्तेमाल करके ये शैतान भले ही हीरो बनजाये। भले ही मरने वालों के परिवार के लोग खून के आंसू बहते रहे ........पर कायदों से नहीं डिगेंगे क्यों डिगें भैयाहम तो अहिंसावादी है। एक थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने वाले बापू की औलाद है।
कुछ भी हो कसाब को सजा मिले ( जो अभी अनिश्चित है ) या न मिले - वो जेहाद जैसे पवित्र नाम पर खून बहानेवालो के लिए हीरो बन चुका है। आखिर एक देश को दहला देने वाले लोगों के ग्रुप का इकलोता जिन्दा बंदा है। उसकी सुरक्षा के लिए २०० करोड रूपये महीने खर्च होते है। मीडिया उसे प्रचार दे ही चुका है सरकार सजा देने मेंसक्षम नजर नहीं आ रही।

Sunday, May 9, 2010

संरक्षणवाद की वापसी

कुछ दिन पहले एक न्यूज़ मिली कि अमेरिका और यूरोप में पर्दूषण कर लगाने कि तय्यारी शुरू हो गयी है।अमेरिकी पर्तिनिधि सभा ने ये विधेयक पारित कर दिया है। यूरोप में मामला विचाराधीन है। इस अवधारणा कीशुरुआत फ़्रांस ने की थी। २०१२ से यहाँ आने वाले और यहाँ से उड़ान भरने वाली airlines पर कार्बोन टेक्स लगाकरेगा। फनी है न !!!!
यानी पर्यावरण के नुक्सान कीभरपाई के बिना पर्यावरण की सुरक्षा। वो भी उन देशों के द्वारा जो कार्बोन उत्सर्जन मेंकटोती के लिए तैयार नहीं है असल में ये कोई फनी बात नहीं ये सोची समझी साजिश का एक कदम भर है जिसकीभविष्यवाणी एकोनोमिस्ट्स ने मंदी की शुरुआत में कर दी थी .....जी हाँ ये संरक्षणवाद की और जाता रास्ता हैजिसके बारे में एकोनोमिस्ट्स में बहुत पहले कर दी थी। ये टेक्स उस हर सामान पर लगेगा।
सच कहूं तो मैं भी इसका समर्थन करता हूँ।
अगर इसके इतिहास की बात करें तो इसका प्रतिपादन अमेरिकेन अर्थशास्त्री और राजनेता Alexander hamilton ने किया था १७९१ में।जिसका समर्थन बाद में J.S. Mill, fredrichlist, H.C.Carey इत्यादि economicts ने भीकिया। अगर देखा जाये तो भारतीय महान नेताओ ने तो आजादी की लड़ाई में इसे हथियार बनाकर इस्तेमाल भीकिया। आन्दोलन के दोरान जो विदेशी सामानों का बहीशकर किया गया वो संरक्षणवाद का ही एक रूप था।हकीकत तो ये है कि संरक्षण वाद यदि एक देश के लिए फायदेमंद है तो दुसरे के लिए नुक्सान दायक है
संरक्षणवाद का सिद्धांत -`" Nurse the baby, protect the chield nd free the adult"- पर आधारित है
सच तो ये है कि संरक्षण के बिना विकास शील देशो के उद्योग आगे बढ़ ही नहीं सकते क्योंकि उनमे न तो विकसितदेशो के उद्योगों के बराबर सिद्ध हस्त मजदूर होते हैं न ही उनकी तकनीक इतनी विकसित होती है कि वो कम कोस्टपर बेहतर उत्पादन कर सकें। अपने ही बाजार में टिकने के लिए उन्हें तब तक संरक्षण कि जरूरत होती है तब तकवो बाजार में पैर जमाने के लायक न बन जाये। जब भी देह के बाजार पर विदेशी हावी होते है तभी संरक्षण वाद किजरूरत होती है। मुक्त व्यापार कि बात बस वो देश करते है जिनका निर्यात ज्यादा होता है। अमेरिका का हीउदाहरण देख लो यार B P O SERVICES में विदेशी हावी हुए वहां बेरोजगारी बढ़ी तो उसी देश ने संरक्षण वाद कादामन थम लिया और उन्ही विदेशी compnies मदद बने का वादा किया जो अमेरिकंस को जॉब देंगे उसकापरिणाम ये हुआ कि भारतीय कंपनिया अब अमेरिकंस को ज्यादा नोकरी दे रहे है, इंडिया से बन्दे भेजने कीबजाये।
सच तो ये है कि संरक्षण वाद एक बहुत ही शानदार तरीका है देश के उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बस इसकाइस्तेमाल सही तरीके से होना चाहिए वर्ना यही चीज भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। संरक्षण के कारण ही देश के बड़ेउद्योग देश के छोटे उद्योगों को आगे बढ़ने से रोकने लगते है। इससे देश का ही विकास रुकता है। इसी वजह से कुछलोग संरक्षण वाद का विरोध करते है। `गुरु` फिल्म में गुरुभाई (धीरुभाई) का विरोध लाइसेंस के लिए नहीं थाअसल में उस व्यवस्था के लिए था जिसके कारण छोटे लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बड़े उद्योगपतिलाइसेंस व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे थे। राजीव जी ने उस हकीकत को समझा और जान गए कि अब लाइसेंसकि हर उद्योग को जरूरत नहीं रह गयी है सो उन्होंने लाइसेंस व्यवस्था के नियम बदल दिए। लेकिन अब भी मेरे देहके उद्योगों को संरक्षण कि जरूरत है क्योकि आज भी हमारा आयत निर्यात सी ज्यादा है और लगातार बढ़ भी रहाहालांकि । कुछ सही तरीके से करना होगा ताकि सभी उद्योगों को आगे बदने का मोका मिल सके।
हमे चीन पर भी कंट्रोल करना होगा ताकि उसका सामान हमारे बाजार पर हावी ना रह सके । हालांकि इंडिया वालेतरह विदेश में compnies take over कर रहे है उससे उम्मीदें पैदा होती है मगर जिस तरह इंडिया कूटनीतिक रूपसे कमजोरी शो करता है ,जिस तरह हर चन्द महीनो के अंतराल के बाद कोई न कोई गद्दार निकल आता है, जिसतरह इंडिया में आतंक वादी बढ़ते नजर आ रहे है- ये सब देखकर दिमाग में शंका पैदा होती है की ये उन्नति कितनेदिन कायम रहेगी???????
खैर जब भी मंदी ने दस्तक दी है यूरोप और अमेरिका ने संरक्षण का सहारा लिया है हमरे साथ दिक्कत ये है कीहमारा ज्यादातर व्यापार वहीं है अब वक्त आ गया है की हमें गंभीरता से विश्व के दुसरे बाज़ारों पर पकड़ बनानीशुरूकर देनी चाहिए जैसे अजीम प्रेमजी ने किया।
ये एक हकीकत है यूरोप और अमेरिका की अर्थव्यवस्था का ग्राफ नीचे की ओर जा रहा है वो संरक्षण का सहारा लेंगेही, बेहतर है हमें तूफ़ान से पहले खुद को संभाल लेना चाहिए- आता है तो हम सेफ होंगे नहीं आता है तो हम सेफ हैही ..................भैया जी प्रिकोसन ही तो इलाज का सबसे बेहतर तरीका माना जाता है ना।

Monday, April 12, 2010

some facts 2

* अगर आप youtube पर लोड की गयी सभी videos को देखनेव लगें तो तमाम videos देखने में आपको तकरीबन ६०० साल लग जायेंगे youtube पर हर मिनट में २० घंटे की videos upload ki जाती है।
*इब्न-बतूता का जन्म २४ फरवरी १३०४ को मेरिडीन राजवंश के दोरान मोरक्को के तंजोर शहर के एक मुस्लिम विधिवेत्ता के घर में हुआ था।
*फिल्म `पिरान्हा-२:दा स्पानिंग`के दोरान director जेम्स केमरून के निर्माता के साथ एडिटिंग को लेकर इतने मतभेद हुए कि उन्हें डरावने सपने आने लगे थे कि भविष्य से मशीन मानव सिर्फ और सिर्फ उन्हें मारने आ गया है .....
यही सपना उनकी हिट फिल्म `the tarminator` की कहानी का बेस बना।
*विश्व के ११० देशों में २.५ करोड़ से भी ज्यादा भारतीय मूल के लोग रहते है। अमेरिका में ३८% डोक्टर, १२५ scientists, 36% nasa workers भारतीय मूल के है। microsoft में 34% I.B.M. में, २८% इंटेल में, १७% कर्मचारी भारतीय मूल के है।
* वर्ष २००९ के best director का oscar award जीतने वाली निर्देशक केथरीन बिगेलो ने अपने पूर्व पति जेम्स केमरून (अवतार के निर्देशक ) को पछाड़कर वो खिताब जीता है।
*महान नाटककार जयशंकर प्रसाद जी ने अपने प्रसिद्द नाटक `चन्द्रगुप्त` की प्रस्तावना में सिद्ध किया है कि`कामसूत्र` के लेखक `वात्स्यायन` और चाणक्य एक ही आदमी थे
चाणक्य द्वरा लिखित ग्रन्थ है - चाणक्य नीति, अर्थशास्त्र, कामसूत्र, और न्यायभाष्य।

Wednesday, March 31, 2010

some facts 1

*इंडिया १५ अगस्त को आजाद हुआ था लेकिन उसे united national organigation ka member 30-10 1945 को बना लिया गया था
मेरी समझ में नहीं आ रह की अगर ये सच है तो ३०-१०-१९४५ इंडिया को एक आजाद देश का दर्जा मिल गया होगा- तो कांग्रेस देश को आजाद करने का क्रेडिट क्यों लेती है??????
*आधुनिक जासूसी के पितामह wilhelm johann kark eduard stieber जो बिस्मार्क का मुख्य जासूस था जब १८९२ में मरा था तो यूरोप के तमाम सामंत उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होने आये थे। इसलिए नहीं की वो उसे बहुत प्यार करते थे बल्कि इसलिए क्योंकि वो खुद देखना चाहए थे की क्या वो सचमुच ही मर गया है या मरने का ड्रामा कर रहा है।
*लेखक गुरुदत्त ने ५५ साल की उम्र में लेखन कार्य शुरू किया था।
*एक magazine ने हाल ही में रिपोर्ट पुब्लिश की है जिसमे बताया गया है की बिहार में कई जगहों पर लड़की वाले दहेज़ से बचने के लिए जबरन लडको का अपहरण करके बन्दूक की नोक पर उनकी शादी अपनी लड़की से करवा रहे है।
*james bond 007 के लेखक Ian Flaming खुद वास्तव में ब्रिटिश नोसेना के ख़ुफ़िया विभाग में जासूस थे। उन्होंने हिटलर के दाहिने हाथ कहे जाने वाले जर्मनी के डेपुटी फ्यूहर को डिफेक्ट करने पर मजबूर कर दिया था।
=>डिफेक्ट का मतलब गद्दारी करके दुश्मन के खेमे में शामिल हो जाना होता है

Saturday, March 27, 2010

सरकार बजट और हम

ये पोस्ट जरा देर से लिख रहा हूँ उसकी कई वजह है। पहली वजह तो यही है की इस मुद्दे पर लिखने के लिए सब कुछ बड़ी ही सावधानी से समझना था मेरे लिए तो बात को समझना ही मुश्किल काम है,बजट जैसी चीज को समझना और भी मुश्किल। ऊपर से मैं कोई नेता भी नहीं जो वोट बैंक के लिए किसी भी मुद्दे को पकड़ कर बयान दे डालूं। ऊपर से नेट पर स्पीड की प्रॉब्लम थी कई बार पोस्ट को टाइप करने का इरादा बीच में ही छोड़कर जाना पड़ा। एक और वजह मेरी समझ में ये न आना था की किस तरह इस बोरिंग टॉपिक को इंटरेस्टिंग बनाकर लिखा जाये।
हाँ जी तो शुरू करें। सब जानते थे की बजट अच्छा ही होगा आखिरकार कांग्रेस के संकट मोचक श्री श्री श्री प्रणव मुकर्जी साहब ने बनाया है। उनकी स्मार्टनेस पर कोई शक कर सकता है भला भैया अपने कई दशक के राजनीतिक जीवन में चाचा अब जाकर जंगीपुर से लोकसभा चुनाव जीत सके है मगर इंदिरा जी तक उनके हर बार चुनाव हार जाने के बावजूद उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल करके रक्ति थी मात्र उनकी स्मार्टनेस के के कारण। सोनिया जी ने उन्हें वित्त मंत्रालय गिफ्ट किया है जो की उनकी काम करने के लिए पसंदीदा जगह है। तो भैया बजट तो अच्छा बनना ही था बना भी विरोघियों के अलावा सबने अच्छा बताया भी। वैसे भी कोई खास बड़ी समस्या इस बार थी भी नहीं। न तो चुनाव पास थे जो लोगों को वोट के लिए कोई लोलीपोप देनी होती। मंदी फिलहाल गुजर चुकी है। बस तीन ही problems मुकर्जी चाचा जी के सामने थीं।१ -बजट घाटा कम करना २-देश के विकास को गति देना ३-महंगाई को काबू करना। मुकर्जी चाचा का कहना है की वो घाटा पिछली बार के घाटे ६।९% से कम करके ५.५% पर लेकर आयेगे। ज्यादा दिक्कत वाली बात नहीं थी वजह इस बार की सरकार की अलग से होने वाली बचत और कमाई पर नजर डालने पर अपने आप समझ में आ जाएगी * विनिवेश से कमाई - १५००० करोड़ रूपये *3G की नीलामी से कमाई - ३५००० करोड़ रूपये *ऋण माफ़ी योंजा के खात्मे से हुई बचत - १५००० करोड़ रूपये *पेट्रोल उत्पादों की सब्सिडी जारी न करने से बचत - १०००० करोड़ रूपये *वेतन आयोग का बकाया न चुकाने से बचत - २०००० करोड़ ।रुपये कुल बचत - ९५००० करोड़ रूपये कुल G. D. P. -69.45 लाख करोड़ रूपये यानी बचत =G.D.P. का १.४%। पिछला राजकोषीय घाटा G।D.P. का ६.९%था सो इस बार घाटा रहने की उम्मीद है ६.९%-१.४%=५.५%. भैया जी मुकर्जी चाचा ने ५.५% राजकोषीय घटा रखने का ही वादा तो किया है । मुश्किल ही क्या है ?????? इसके अतिरिक्त कर से होने वाली कमाई अलग है। ये भी जुदा बात है - इस समय कर्ज ३.८१ लाख करोड़ रूपये है जिसका ब्याज ही हर साल ३२७५० करोड़ रूपये जाता है जबकि पिछले तीन सालों में कर की बढ़ोतरी ही कुल २१% रही है कर्ज की बढ़ोतरी रही ५५%. खैर डाटा तो बहुत हैं उनको लिखकर आपको नहीं पकाऊंगा #दूसरा वादा मुकर्जी चाचा ने समग्र विकास का किया है यार विकास तो हो ही रहा है वो होता रहेगा ही सब जानते है उसके लिए सरकार को कोई खास कोशिश करने की जरूरत है ही नहीं सब जानते है नहीं। इस समय देश की सबसे बड़ी दिक्कत है महंगाई। अगर देख जाये महंगाई कोई हर क्षेत्र मैं है भी नहीं। मोबाइल, t.v. की कीमतें पिछले कई सालों से कम हुई है। मकान की जमीन की कीमत बढ़ी है जिसमे भू माफिया का बहुत बड़ा हाथ है। लोगों के पास पैसा भी बढ़ा है पैसे का फ्लो बढ़ने से कीमते भी बढती ही है। सबसे बड़ी दिक्कत है खाद्यान की कीमत का बढ़ना उसमे भी सबसे बड़ी कमी है हमारे बुनियादी ढाचे में। आप खुद ही सोचो कई सको से आलू की बम्पर पैदावार हो रही है उत्तर प्रदेश में किसानो को जमकर नुक्सान हुआ। एक साल अखबार में खबर आई की पटना में सब्जियां लोगों ने खरीदार न मिलने के कारण सडकों पर फेंकी थी। क्या सरे देश में सब्जियों की पैदावार बम्पर हुई थी ? अगर हुई थी तो सब्जियां महँगी क्यों है???? सच तो ये है की देश के पास न तो कोल्ड स्टोर्स हैं न ही प्रचुर मात्र में फ्रीजिंग वेंस हैं ताकिजल्दी खराब हो जाने वाली सब्जियों को दूर की मंडियों में पहुँचाया जा सके देश के टोटल कोल्ड स्टोरों में से ७५%-८०% स्टोरों को सिर्फ आलू के संग्रहण के लिए यूज किया जाता है। यही असली सर दर्द है सरकार के लिए जिससे निजात पाने की कोश्शिश इस बजट में की गयी है। #ने कोल्ड स्टोर,पोल्ट्री,मत्स्य पालन,समुद्री उत्पाद और मांस के कारोबार के विस्तार लिए या नयी इकाई की शुरुआत के लिए छूट के प्रावधान रखे है। #परियोजनाओं को मूल उत्पाद शुल्क के रूप में ५%कर देना होगा साथ ही एडिशनल ड्यूटी ऑफ़ कस्टम और स्पेशल एडिशनल ड्यूटी इ भी छूट के साथ इन परियोजनाओं को सस्ती उधारी की भी सविधा मिलेगी । #ट्रक रेफ्रिजरेशन को सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया गया है #कुछ कृषि उपकरणों का सीमा शुल्क ७.५%से कम करके ५% कर दिया गया है। गौरतलब है कोल्ड स्टोरेज को पिछले बजट में ही बुनियादी ढांचा का दर्जा दिया जा चुका है ताकि उन्हें आय कर में छूट मिल सके इससे अन्य कृषि उत्पादों के लिए स्टोर खोलने को बढ़ावा मिलेगा। सच तो ये है की ये एक दम से फायदा देने वाले कदम नहीं है इनका परिणाम आने में वक़्त लगेगा। हालाँकि देश की जनसँख्या बहुत है उसकी जरूरत पूरी करने के लिए काफी उत्पादन में भी बढ़ोतरी करने के साथ कला बाजारी को भी रोकना क्योंकि जब भी किसी चीज की कमी की खबर बाजार में आती है सेठ उसकी जमाखोरी शुरू कर देते है और कीमते बढ़ जाती है। खैर इस बारे में तो ज्यादतर जगहों पर पढ़ चुके होंगे मेरी तो ये ही समझ में नहीं आता की लोग बजट को इतना महत्त्व क्यों देते है ???? बजट है ही क्या बस साल भर का लेखा जोखा , और कुछ नहीं। हर बजट पर लोग इस बात पर निगाह गडाते है की उन्हें क्या मिला ??? यार कभी किसी ने ये सोचा है की उसने देश को क्या दिया ??? सब जानते है की ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार फैला पड़ा है .........सच तो ये है की अगर सरकार के १००% मदद गरीब को इमानदारी से मिले तो देश आज की तारिख में विकसित देशो की लाइन में खड़ा होता और देश को नयी पंचवर्षीय योजना की जरूरत न होती। देश को घाटे का बजट न बनाना पड़ता न ही देश पर आज ३.८१ लाख करोड़ रूपये कर्ज होता-अगर सब नागरिक इमानदारी से कर देते। आपको क्या लगता है इस मंदी से देश इतनी आसानी कैसे निकल गया ???? सरकार कितनो को मदद दे सकती है दरअसल लोगो के पास पैसा दबा पड़ा होगा तभी तो वो झटका झेल गए। सब जानते है यार सरकार की मशीनरी कितने तेजी से काम करती है। लोगों ने धर्म और समाज के नाम पर संश्थाये खोल रखी है ताकि कर न देना पड़े। भैया अगर कमी हो रही है लोग करोडो रूपये कम रहे है तो उनका उपभोग भी कर रहे है तो कर क्यों नहीं देते????? बजट आते ही पूरा व्यापारी वर्ग ये नजर टिकाकर बैठ जाता है की सरकार ने उन्हें क्या दिया। नेताओ के कहे पर लोग सडको पर उतर आते है की इस चीज में सब्सिडी क्यों नहीं दी उसमे सब्सिडी नहीं दी क्या किसी ने उस समय अपने गिरेबान में झांककर देखा है की वो देश दे लिए कितना इमानदार है ???? सरकार कहाँ से सब्सिडी देती है-जो टैक्स उसे मिलता है उसी से न ????? टैक्स कितने लोग इमानदारी से देते है???? अगर १०० रूपये सरकार किसी परियोजना को देती है तो कितने परियोजनाओ में लगते है सब जानते है।

Wednesday, February 17, 2010

प्यार का funda

सुना है प्यार काफी शानदार `शै` है ।ये हैवान को इन्सान बना देता है । प्यार इंसान को अमर बना देता है। प्यार जेवण को स्वर्ग बना देता है
पर मुझे कभी ऐसा कुछ नजर नहीं आया। वजह शायद ये हो ली मैं आज तक एक भी लड़की नहीं पटा सका। पटाना तो दूर तवज्जो तक हासिल नहीं कर सका । ये अलग बात है की कोशिश बहुत की । बार- बार नाकाम होकर भी आशा जरूर है शायद कभी न कभी चिता पर लेटने से चार पाँच मिनट पहले ही सही मुझ गधे को पंजीरी खाने को मिल ही जाये ।हा-हा-हा-।
चूँकि अपुन ने प्यार का स्वाद चखा नहीं सो अपुन की भेजे में प्यार का फंडा घुसा ही नहीं । इस बारे में अपुन ने सोचा तो प्यार की रूमानियत के पीछे पंगे, बदनामी, तकलीफे, ही नजर आयी या वक्ती झाग या कमीनापन या वो बेवकूफी जिसे दिल की सुनकर कर चुकने के बाद ........रिपीट - कर चुकने के बाद .............दिमाग की अत्कार सुनने को मिलती है। जेहन में बस उबलते पछतावे के लावे में आत्मा को जलना होता है।
* क्या प्यार हैवन को इंसान बना देता है ??????
अगर ऐसा है तो क्यों प्रपोजल स्वीकार न करने पर लड़कियों के चेहरे पर दिलजले तेज़ाब फेंक देते है ????? क्यों लोग प्यार में हत्याए कर देते है??????????????
*क्या प्यार जिन्दगी को जन्नत बना देता है ????
हमारे गाँव में एक लड़का था । घर का लाडला माँ बाप के खिलाफ लव मेरिज की बाध्य दिमागदार मन जाता था। शादी के बाद लाइफ का बैंड तो बजा ही जिन्दगी भर उसकी बीवी लडकियों को यही कहती रही की कोई उसकी तरह न करे।
*क्या प्यार इबादत है?????
शायद हो । सवाल ये है ----लड़के- लडकिय एक दूजे के प्यार को पाने के लिए माँ- बाप का प्यार क्यों भूल जाते है। माँ बाप की सालो की ममता पर उनका `प्यार` क्यों भारी पड़ता है??? क्या ये प्यार माँ-बाप की सालों की तपस्या से बड़ी चीज है???? और अगर है तो क्यों बाद में आशिक पछताते है?? क्यों २६% लव मेरिज करने वालो ने अपने विवाहेत्तर सम्बन्ध की को स्वीकार किया है ।ध्यान दें की बस स्वीकार किया है जिन्होंने नहीं माना वो जरूरी नहीं पाक-साफ़ हों । इसके अलावा एक बात मेरे में पैदा भी होती है । प्रेमियों बुरा मत मानना यारो-अगर कोई अपने पैदा करने वालों के लिए ही संवेदनशील नहीं तो वो अपने spouse के प्रति ईमानदार कैसे हो सकता है ?????? जिसने उन माँ-बाप की भावनाओ की कद्र नहीं की -जिन्होंने उन्हें पाला-पोसा, पढाया,उसकी केयर की- वो अपने spouse की फीलिंग्स की क्या क़द्र करेगा???? ये सोचकर मेरा दिमाग भन्ना गया । आत्मा ने कहा की प्यार नाम की कोई चीज दुनिया में होती ही नहीं ।
ये तो हुई वो बात जो मैंने देखा और सुना अब अपनी बखिया उधेड़ता हूँ । वैसे तो मैं बड़ा कमीना इंसान हूँ लेकिन हमेशा से कमीना इंसान नहीं था मुझे पहली बार जो लड़की पसंद आई या लिखू में खुद ही जिस लड़की की तरफ खीचा चला गया वो मेरे सामने सातवीं कक्षा में आई तब मैंने सोचा काश ये मेरी बहन होती ये न होती तो इसी के जैसी होती ...........सचमुच बड़ी cute लगती वो मुझे थी (यार अब भी काफी क्यूट है )और में हमेशा एक प्यारी सी बहन की ख्वाहिश करता था। और बाद में ............ । उसी की सहेली पर नजर टिकी और मैं उसपर लाइन मारने लगे ...सोरी `प्यार' करने लगा उसे। क्यों?? क्योंकि तब मैं अपनी लाइफ पार्टनर की कल्पना करने लगा गया था। मामला उसी तक नहीं टिका कईओं पर लाइन मारी। मार रहा हूँ। एक बुक स्टाल पर कभी कभार बैठकर किताबें चाटता हूँ हर सब्जेक्ट पर। वहां मुझसे अच्छे standerd ki बड़ी धांसू-धांसू लडकियां किताब लेने आती हैं। वहां जब किसी सी इंटरेक्ट करने का मोका आता है तो दिल में आवाज उठती है बस भैया ना कह दे। वैसे पता है की कोई भाव नहीं देगी कभी भी भाव नहीं देगी लेकिन `भैया' सुनकर दिलपर आरी सी चल्री है। क्यों .........ये भी कोई पूछने वाली बात है यार?????????
सवाल ये है की मैंने प्यार किसे किया -उसे जिसे अपनी बहन बनाना चाह ( हालांकि उसके लिए शायद मैं अब भी बुरा इसान होऊ ) या उसे जिसपर पहली बार लाइन मारी या उन्हें जिनपर लाइन मार रहा हूँ या उन्हें जिनपर लाइन मारने वाला हूँ क्योंकि तय है की कोई भाव नहीं देने वाली आगे तो बढ़ना ही पड़ेगा न आखिरकार।
वैसे भाइयों ऐसा नहीं है की प्यार करने वाले नाकाम ही होते है। हमरे एक प्राचार्य जी ने भी सुना है लव मेरिज की थी दोनों कामयाब भी थे और खुश भी थे। celebtities की लव मेरिज की खबर तो सब पढ़ते ही रहते है साथ ही रिश्ता टूटने की भी न्यूज़ आप तक आती रहती ही है काफी जोड़ियाँ कामयाब भी रही है। पर , अब भी मेरा मानना यही है की ये जोडियाँ इसलिए कामयाब नहीं की उन्होंने `प्यार' किया बल्कि इस वजह से कामयाब है की उन्होंने रिश्ते की कीमत को समझा और निभाया। उन्होंने `प्यार' के आसमान में परवाज तो भरी मगर रिश्ते की हकीकत की जमीन पर भी पैर टिकाये रखे।
दोस्तोंअब मैं `प्यार' के अपने funde पर आता हूँ । मैं हमेशा की तरह अब भी ताल ठोककर कहता `प्यार' नाम की कोई चीज इस दुनिया में नहीं होती। होता है या तो रिश्ता या फिर महज आकर्षण। हम अच्छी चीज की तरफ आकर्षित होते है और तब तक उसकी और आकर्षित रहते है जब तक वो अच्छी और आकर्षक बनी रहे । जबकि रिश्ता बस रिश्ता होताहै वो कभी ख़त्म नहीं होता कोई ताकत रिश्ते को मिटा नहीं सकती। अब ये हमारी सोचा है - हम आकर्षण के गुलाम बनते है या साश्वत रिश्ते को जीते है। ख़ुशी क्या है रेगिस्तान में भी लोग आशियाना बनाकर ख़ुशी को अपना गुलाम बना लेते है वहां हरियाली पैदा कर देते है वर्ना कश्मीर जैसी जन्नत को हम ही इंसानों ने आतंक से जहन्नुम बना दिया है वहां की वादिय तो बस खामोश है ।
हो सकता है मेरा funda आप लोगो को पसंद ना आये या हो सकता है की मैं भी किसी खास लड़की को बहुत importance देता होऊ उसी की वजह से और लड़कियों को पास ही न आने देता होऊ ताकि `उसके' लिए जगह खाली बनी रहे (यार इतना झूठ तो चल जाता है हा-हा-हा-हा) किन्तु ये तय है -अगर मजबूरी वश या दुर्घटना वश शादी की तो मेरी बीवी ही सबसे ज्यादा important होगी सबसे सेक्सी होगी नहीं होगी तो मैं बना दूंगा ।
वैसे एक बात पक्की है की जब तक शादी जैसी दुर्घटना मेरी लाइफ में नहीं घटती जब तक किसी हसीना ( हसीं तो पक्की होगी ही) मेरे साथ बंधकर नहीं फूटते तब तक मैं लाइन मरता रहूँगा । दिल लगाकर बिना spaceship के चाँद पर लैंड करने की कोशिश करता रहूँगा आखिरकार इन फालतू कामो का अपना ही मजा है। वैसे भी guys अगर हम लफंगे लड़कियां पर लाइन नहीं मारेंगे तो उन्हें अपने हसीं होने का अहसास कैसे होगा ?????? और क्या पता कोई हसीना बेवकूफ बनकर मुझे धाकड़ बंद मान ले और मेरे भाग्य का पिटारा खुल जाये। वैसे भी किसी को हसीं होने का अहसास कराना भी क्या कम धर्म-कर्म का काम है?????????? सो भाइयो अपुन का इरादा धर्म-कर्म से पीछे हटने का जरा भी नहीं है मैं तो करता रहूँगा आप बोलो आपका क्या इरादा है?????

Monday, February 1, 2010

मेरा टूटता बिखरता देश

मैं कोई देशभक्त बन्दा नहीं हूँ मगर कहते है न की आप माँ को भले ही प्यार न करते हूँ फिर भी अगर माँ पर संकट आता दिखे तो हर बेटा सोचने लगता है मैंने भी सोचा। आज की तारीख में तकरीबन १२ नए राज्यों की मांग जोर पकड़ रही है तेलंगाना का मुद्दा सबसे ज्यादा गरमा रहा है। विदर्भ के लिए भी कम जोर नहीं लग रहा।
नेता लोग कहते है की छोटे राज्यों से विकास होता है। जैसे झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, का हो रहा है। नागालेंड, manipur, tripura, के विकास को कौन नहीं जानता । राजनीती वहां की इतनी स्थिर है कि दो विधायक ही सत्ता बदल डालने कि ताकत रखते है। बहुमत के लिए विधायक चाहिए ही कितने।
अमेरिका का उदाहरण देते है जहा ५० राज्य है पर शायद भूल गए कि उसका आकर भारत से तीन गुना है इस तरह तो वहां ८० राज्य होने चाहिए जबकि वहां इतने ही राज्य अमेरिका के बन्ने के समय थे उतने ही अब है एक भी नया राज्य नहीं बनाया गया ।
मामला दरअसल देश के development का नहीं है अलग राज्य की मांग वो नेता कर रहे जिनका कोई राष्ट्रया आधार नहीं चन्द लोगों को इकठ्ठा करके नया राज्य गठित कराकर वो सत्ता में आना चाहते है और सेंटर में बैठे लोग भी एक मुट्ठी लोगों के समने झुककर अपना वोट बैंक खो देने के डर से उनकी मांग को ममन लेते है
आज दए लोग नया राज्य मांग रहे है कल को दए नया देश मांगने लगेंगे। क्या मुश्किल है यार ?????संयुक्त राष्ट्र में समर्थन ही कितने देशो का चाहिए नया देश बनाने के लिए शायद २४-२५ या इससे कुछ ज्यादा। सब जानते है हमारी intelligence agencies के क्या हल है ??? raw के ज्यादातर अधिकारी अमेरिका परस्त है । लगभग ७५% रिटायर होकर अमेरिका में बसते है। जब अमेरिका और चीन जैसे देश भारत को नुकसान पहूचना चाहते हों तो उनके लिए २४-२५ देशो का समर्थन इकठ्ठा करना कितना मुश्किल है ??????
देश टूटता तो क्या हाल होता है हमसे ज्यादा बेहतर कौन जन सकता है । अपने देश के ह्स्सो में चीन को घुसने से तो हम रोक नहीं पा रहे है पाकिस्तान से कश्मीर तक हासिल नहींकर पा रहे है क्या देश को टूटने से बचा पायेंगे ??????

डर लग रहा है कहीं इन स्वार्थी नेताओं की वजह से मेरी माँ के टुकड़े न हो जाये । जाग जाओ यार कब तक सोते रहोगे ????????????????

Tuesday, January 12, 2010

sex scandle की चांदनी

एक हैं tiger woods. स्टार है। आज कल चर्चा मैं है भाई साहब अपनी कार मे सफ़र कर रहे थे एक पत्रिका में रखी अपनी girlfriends की तस्वीरे देख रहे थे -अन्तरंग टाइम वाली । एक टक्कर हुई और सारी तश्वीरें बिखर गयी और बात मीडिया तक चली और पोल खुल गई। भाई साहब बदनाम तो हुए साथ ही अब बीवी भी साथ छोड़कर जा रही है मामला कोर्ट में जाने वाला है।
खैर
मामला अब ये है इस scandle का फायदा किसे हुआ ???
कहते है जब रात में चांदनी बरसती है तो समझदार लोग उसे जमकर लूटते है और लूटी भी यार जैसे -
१- भाई साहब तब `ग्रेट अ ग्रिप ऑफ़ फिजिक्स - पढ़ रहे थे तब तक वो कुल ही २२६८ बिकी थी अब तक ४००००० के आस पास बिक चुकी है।
२ - जिस कार में बैठे थे उसकी बिक्री का आंकड़ा दोगुना हो चूका है
3- प्रेमिकाओ की sudh ले लेते है
i- जेमी ग्रेब्स एक वेट्रेस थी अब वो १० लाख डॉलर- लेकर playboy के कवर पर आने वाली है ऐसा सुना है
ii- रशल ( एक क्लब के vip सेवाओ की director ) और बैर पूल लांग की मार्केटिंग director कलिका मेकिन अब तक परसिद्ध हो चुकी है।
iv -porn stars holly simpson और joslin james की मार्केट में इजाफा हो ही चूका होगा।
v- मीडिया तो चांदी काट ही रहा है
अब पत्नी की बात करते है । दुनिया की कोई पत्नी नहीं जो अपने पति के एब न जानती हो खासकर तब - जब बन्दे के कई चक्कर चल रहे हों । पत्नी ने तलाक की बात तब क्यों नहीं की ??????
तब उसे शायद पैसा मिलने की गारंटी न हो अब पक्के तोर पर गारंटी ज्यादा है सो तलाक लाइन की बात कर रही है

मेरा इरादा वूड्स भैया को दूध का धुला प्रूव karna नहीं जो गलत है वो गलत है ही
यार मेरी समझ में आज तक ये नहीं आया की लोग कई औरतों के साथ रिश्ता कैसे बना लेते है ????????
एक औरत की शारीरिक जरूरत मर्द से ज्यादा होती है
डाटा उठा लो
एक सर्वे के अनुसार ९०% औरतों ने कहा की वो अपनी sexual life se satisfied हैं उनमे से मात्र २०% ने कहा की ओ पूरी तरह satisfied है। manaa ये भी जाता है की औरत की शारीरिक जरूरत मर्द से आठ गुनी होती है । बहुत औरतों को तो orgasm की जानकारी ही नहीं होती उन्हें orgasm कभी मिला होगा तभी तो उसके बारे में पता होगा ना यार।
तो मेरे भाइयो एक की जरूरत तो पूरी नहीं होती लोग दूसरियों के चक्कर में क्यों आ जाते है ????????

Monday, December 28, 2009

शोला और शबाब

एक तरफ शोला,

एक तरफ शबाब।

देखा था एक ख्वाब,

जो यूँ ही टूट गया।

पाया इक साथी

इक पल में छूट गया।

दिल में छुपी थी जो हसरत-

वो दिल में ही रह गयी।

न हम कुछ कर पाई,

न वो कुछ कह गयी।

धक् से रह गया था दिल-

जब वो लगी थी जाने

मुसूकुरा रहे थे हम,

पर दिल की हालत हम ही जाने।

न करना मोहब्बत यारो,

नहीं तो पछताओगे।

इस शोला और शबाब के चक्कर में यूं ही फंस जाओगे

Saturday, December 26, 2009

*वो कंगन की खन-खन,

वो पायल की छन-छन,

और साथ में उसका मुस्काना,

आंचल को दबाकर दांतों में-

याद आता है उसका शर्माना।

*देखा है लोगों को इकरार करते हुए,

काँटों की सेज पर भी प्यार करते हुए,

कभी तो उनको हमारी याद सताएगी,

किसी मोड़ पर मिलेंगे वो हमें इंतजार करते हुए.

Thursday, December 17, 2009

शायरी

ले छोड़कर तेरा दामन हम आगे को चल दिए,
कोई दामिनी ही सही, मेरा आशियाना रोशन तो बनाएगी