आधे घंटे केव बाद `वो' आये. एक पैकेट उनके हाथ में था.मैं तब भी मासूम बच्ची की तरह गुमसुम सी शबनम आंटी से चिपकी बैठी थी.
" आंटी,"-`वो' पैकेट आंटी की तरफ बहाते हुए बोले-" इन्हें वाशरूम में ले जाकर इनकी वूलन कोट और फुलोवर निकलवा लो. ये गर्मी से परेशान होंगी. अगर फुलोवर के नीचे भी कोई वूलन कपडा पहन रख हो तो उसे भी उतरवाकर इन्हें ये शर्त पहना देना."
शबनम आंटी ने वो पैकेट ले लिया. मुझे उठाकर वाशरूम की तरफ लेकर चल दी. मैं रोबोट की तरह उनके साथ चल दी.
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पापा के शव को लेकर हम शाम तक दिल्ली से मेरठ आ गये. तब तक काफी अँधेरा हो गया था. सो पापा का शव बर्फ में रख दिया गया. तय किया गया था पापा का अंतिम संस्कार अगले दिन किया जायेगा. तब तक कई और रिश्तदार आ जाने वाले थे. नेहा तो शाम को ही कुफरी स लौट आई थी. उसे `उन्होंने' ही फोन पर पापा के गुजरने की खबर कर दी थी. खबर मिलते ही टूर छोडकर वापिस आ गयी थी. वो मुझे मेरे घर पर ही मिली उसी देखते मेरी हिचकिय बांध गयीं. उसने आगे बढकर मुझे अपनी बांहों में भर लिया. वो भी अपनी रुलाई पर काबू नहीं रख सकी थी.
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पापा का शव जब अंतिम संस्कार के लिए ल जाया गया तो `वो' पापा की शवयात्रा में शामिल नहीं हुए. मुझे बड़ा बुरा लगा -जब शव को कन्धा देने के वक्त पर वो अपने रूम म चल गये. पापा को दाग मेरे बाद चाचा सुरेन्द्र शर्मा ने दिया था.
उसी दिन मेरे बाद चाचा का पूरा परिवार मेरे घर में आकर रहने लगा. चाचा जी केवल रात को सोने के लिए ही जाया करते थे. या कुछ टाइम के लिए ऑफिस जाया करते थे. छोटे चाचा लखन शर्मा की फैमिली दिन में हमारे घर में रहती थी. रात को भी कोई न कोई-सी चाची मेरे साथ ही सोती थी. पापा की शव यात्रा से लेकर उनक तीजे तेहरवीं तक में शबनम आंटी के पति और दामाद अल्ताफ - जो बाईस-तेईस साल का था.सोती गंज में मोटर मैकेनिक था.
पापा की तेहरवी निबट जाने के बाद उस शाम मेरे भविष्य का फैंसला करने के लियी मरी ननसाल और दधियल परिवार के लोग बैठे. सब घर के ड्राइंग रूम म बैठे थ. पापा क दोस्त और वकील एडवोकेट सचदेव भी वहीं थे.
`वो' भी एक तरफ उपेक्षित से बैठे थे.
मैं घर की सीढ़ियों पर रेलिंग का सहारा लिए खड़ी थी.
शबनम आंटी मेरे साथ ही थी. मुझ एक-दो स्टेप नीचे.
" पलक अब हमारे घर में रहगी"-सुरेन्द्र चाचा ने कहा-" पलक के लिए बड़े भैया की जो भी जिम्मेदारिय थीं वो मैं पूरी करूंगा."
" और बिजनेस का क्या होगा."-मामा जी बोल-" जीजा जी बिजनेस भी तो छोडकर गये है."
" उसका क्या होना है? वो पलक का था उसी का रहेगा."- चाचा जी नी सहजता स कहा-" फिलहाल तो फर्म के एग्जिक्यूटिव संभल लेंगे . सारा पैसा खाते में जाता है. ये चाहे तो खुद फर्म संभल सकती है या भैया की जगह किसी की चीफ एग्जिक्यूटिव बना देंग. इसक शेयर का पैसा तिमाही हिसाब से इसे मिलता रहेगा. "
तब नाना जी बोले-" अगर ये आपके साथ रहेगी तो इस घर में कौन रहेगा? सवा महीने तक तो घर में दिया जलना जरूरी है वरना घर में भूत बिया जायेंगे."
" घर में किरायेदार तो हैं ना." - सुरेन्द्र चाचा ने कहा-" वो घर में दिया जलाकर रखेगा.नौकर चाकर साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा करंगे."
तभी एड्वोक्त सचदेव ने गला खंखारकर कहा-" can i say something?"
सबने उनकी तरफ लुक दी.
" मरे मरहूम दोस्त और क्लायंट ने मरने से पहले ही अपनी बेटी की फ्यूचर का फैंसला कर दिया था."-वो बोले-"अब पलक को कहाँ रहना है कहाँ नहीं-इसका फैंसला उसके हसबैंड को करना है.... मिस्टर मुकुल रस्तोगी से पलक की रजिस्टर्ड मैरिज हॉस्पिटल में ही हो चुकी है. वहां पर आप लोग मौजूद नहीं थ इसीलिए तमाम औपचारिकताएं आपक सामने नहीं हुई थी."
सब हैरान रह गये.
मेरा शरीर जैसे जड हो गया था.
मरे तमाम सैंस सुन्न हो गये थे. पता नहीं वेदना की अधिकता थी या कोई और कारण था -मेरे आंसू तक बाहर न निकल सके. शायद सूख गये थे.
मेरी जिन्दगी का वो सबसे बड़ा सरप्राइज था.
मैं सपने में भी नहीं सोच था -पापा मेरे फ्यूचर का फैंसला इस तरह करेंगे.
अब समझ में आया- मरने से पहले पापा ने मेरा हाथ `उनके' हाथ में क्यों दिया था?
उन्होंने मेरी जिम्मेदारी ही `उन्हें' नहीं सौंपी थी बल्कि मुझे ही उनके हवाले कर दिया था.
love diary जारी है ...........