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Saturday, June 4, 2011

कैसे-कैसे लोग???

एक दिन मैं सिटी बस से कहीं जा रहा था. बस में अच्छी खासी भीड़ थी. एक साहब बस में दरवाजे के जस्ट पास वाली सीट पर बैठे थे. अच्छी खासी उम्र के थे. उनकी बेटी जवान न भी हो तो टीन एज की जरूर होगी.पढ़े लिखे भी लग रहे थे.सवाल ये है मैंने उनकी उम्र और बेटी की उम्र  का जिक्र क्यों किया?
उसकी हरकत ही ऐसी थी.
उसकी हरकत का जिक्र करने से पहले मैं मेरठ की सिटी बसों के बारे में बता दूं. जवान लड़कियों को मनचलों की छेड़छाड़ से बचाने के जिलाधिकारी  महोदय ने सिटी बसों में पार्टीशन करवा दिया था. ड्राईवर वाली सीट की तरफ वाले हिस्से में महिला केबिन बना है-जो कि  पुरुष केबिन से एक दरवाजे के द्वारा जुड़ता है.वैसे दोनों केबिन्स में  चढ़ने और उतरने के लिए अपने-अपने दरवाजे हैं. दोनों केबिनों को जोड़ने वाला दरवाजा बेसिकली सहचालक की सुविधा  के लिए बनाया गया है ताकि वो टिकट काटते समय दोनों तरफ आराम से जा सके. सहचालक की इस सुविधा का पुरुष यात्री भी पूरा फायदा उठाते है.वो महिला केबिन की तरफ से चढ़ते हैं और दोनों केबिनो को जोड़ने वाले दरवाजे से होकर अपने केबिन में  पहुँच जाते है. उतरते वक्त जो आदमी महिला केबिन के पास होता है वो भी दोनों को जोड़ने वाले दरवाजे को पर करके महिला केबिन वाले दरवाजे से नीचे उतर जाते है.इससे उन्हें पीछे हटकर पुरुष केबिन वाले दरवाजे के पास जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती. 
अब बात करते है उन भाई साहब की.
हाँ वही भाईसाहब जो पुरुष केबिन के एग्जिट दरवाजे के ठीक पास वाली सीट पर आराम  से बैठे थे. उनका स्टॉप हापुड़ अड्डे से कुछ पहले आया था.जब वो भाई साहब बस से उतरे तो भाई साहब अपने ठीक पास वाली खिड़की से न उतरकर पूरे पुरुष केबिन की भीड़ को को बहादुरी के साथ चीरकर महिला केबिन में गये, उसके बाद वहां महिलाओं के भीड़ में पिसते हुए महिला केबिन के एग्जिट डोर से नीचे उतरे.
उन्होंने ऐसा क्यों किया????? ये समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं.
सच तुच्छ काम करने में  उम्र या शिक्षा कि कोई बंदिश नहीं होती.
पता है जब हम ऐसा काम करते है तो भूल जाते है कि हमारी भी बहन बेटियां है.

Tuesday, May 31, 2011

क्या पैसे से ही सब कुछ हो सकता है??????????

 बात परसों की है. मैं बड़े भाई की दूकान से घर वापिस आ रहा था. तेजगढ़ी पर मैं ऑटो स्टैंड पर पहुंचा और जब मैं तो लोगों को बड़ी उलझन में देखा. एक बूढ़े बाबा जी थे. वो बांह और घुटने में चोट खाए हुए थे. पता चला कि वो कहीं से दवाई लेकर आ रहे थे और दो जगहों पर गिर गये थे, उसी वजह से उन्हें चोट आई थी. वो ऑटो में तो बैठ चुके थे.लेकिन बात ये चल रही थी कि बाब जी को उनके घर कैसे भेजा जाये. एक कपल कि कोशिश था कि ऑटो वाला बाबा जी को उनके घर पर छोडकर आये-मर्द पैसे देने के लिए तैयार था.ऑटो वाला इसके लिए  तैयार नहीं था. बाबा जी ने बताया कि वो R.T.O. के पास कहीं रहते है.  फिर एक रिक्शा  वाले को रोका गया लेकिन उसने  भी उन्हें ले जाने से इन्कार कर दिया. वो थे भी काफी बूढ़े. अपनी उम्र  ९४ साल बता रहे थे. एक और लड़का की मदद करना चाहता था. वो भी रेकुएस्ट कर रहा था की ऑटो वा उन बाबा जी को उनके घर तक छोड़ आये. वो भी उसे पैसे देने की बात कर रहा था. मजे की बात है कि बाबा जी के साफ़-सफ्फाक सफ़ेद झक्क कपडे इस बात के लिए साफ़ इशारा  कर रहे थे कि वो किसी अच्छे घर से थे. उनको पैसे की नहीं सहारे की जरूरत थी. मुश्किल से १५-२० मिनट का समय देना था. खैर, एक बन्दे ने बाब जी को उनके घर ले  जाने की जिम्मेदारी  ली. उसके उस का इ कुल ही १८ रूपये और लगभग आधा घंटा खर्च हुआ.
 मुझे अजीब-सा लगा.क्या हर बार पैसे से ही मदद की जा सकती है?
एक इंसान प्यासा है वो नल तक नहीं जा सकता तो क्या पैसे उसकी प्यास बुझ सकती है?
क्या जरूरत के वक्त जरूरतमंद के लिये  थोडा सा टाइम खर्च नहीं किया जा सकता???

Monday, November 8, 2010

स्टुपिड होना भी बुरा नहीं

बड़ी अजीब सी घटना है जब मैंने अपने  चरित्र के खिलाफ काम किया. क्यों किया-अब तक मेरी समझ में नहीं आया. मैं आज तक हैरान हूँ कि मेरे जैसा कमीना बन्दा ऐसा कैसे कर गया?
उसे मैने दोनों बार सड़क पर देखा था. गजब का पीस है बॉस. ज्यादा लम्बी नहीं थी लेकिन गोरी-चिट्टी, स्लिम-ट्रिम, खूबसूरसत मासूम-सा चेहरा, सुतवां नाक, पतले गुलाबी होंठ,लम्बी गर्दन. सच कहूं तो पहली बार उसे मैंने नोटिस ही नहीं किया.
दरअसल मुझे तब टी.पी. नगर के बिजली घर में काम था.  मैं ओटो से  बागपत अड्डे पर उतरा और तो वो वहीँ पर खाड़ी थी मगर तब मैंने उसे ठीक से नोटिस नहीं किया.मैं कुछ देर के लिए पास ही किसी के पास गया और जब लौटा तो उसके पास से गुजरा तो उसे नोटिस किया. कुछ देर मैं क्रोस्सिंग पर रुका वो भी वहीँ खड़ी थी.अब जब मैं वहां खड़ा था तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं उसे ना तकूँ . मैं भी तक रहा था और भी कई तक रहे थे. कुछ देर बाद एक सजीला युवक बाइक पर आया और वो हसीना बाइक पर सवार होकर चली गयी. चली क्या  गयी कईयों पर बिजलिया गिरा गयी उसका पता मुझेया उसके जारे ही चल गया. सबसे पहले रिक्सा वाले ने कमेन्ट पास किया-"देखा ये है आजकल के बालक. घर से पढने के लिए आते है और लाडलियों को घुमाते हैं"
मुझे हंसी आ गयी-"भाई वो वो उसकी कनपटी पर पिस्तोल रखकर तो नहीं ले जा रहा............वो  जा रही है इसीलिए वो ले जा रहा है.अगर हमारी शक्ल ठीक-ठाक होती तो और हमें कोई भाव देगी तो हम क्या मोका छोड़ देंगे"
उसी समय पीछे से तीन-चार बाइकों पर लडके सवार होकर आये. एक लड़का जो पहले से ही वहां पर उसकी ताक में खड़ा था उसने बड़े ही उत्तेजित भाव से बताया कि वो अमुक के साथ अभी-अभी बाइक पर गयी है. वो सब तुरंत  ही उस लड़के को साथ बाइक पर बैठकर  उसके पीछे चले गए.कुछ देर के बाद मैं भी अपना रास्ते हो लिया.मैं मुश्किल  से आधा किलोमीटर ही गया था मैंने उसे फिर देखा. उस बार मैं उस धांसू पीस को कैसे नोट नहीं करता मैना उसे गोली कि तरह पहचाना. वो बाइक के साथ हिप लगाकर खाड़ी थी.  मैं उसके पास से गुजरा और आगे चला गया. आगे जाकर मेर्स दिमाग में अचानक एक बात आई-`बालक पिट-पिटा ना जाएँ'. मैंने  उन्हें वार्न करने का फैसला कर लिया. मैं मुडना के लिया मुड़ा तो मेरे दिल में संका पैदा हुई-` कहीं सवरी बखेड़ा खड़ा ना कर दे'
मैं अपने रास्ते चल दिया. कुछ कदम चलने के बाद मेरे कदम फिर रुक गये. मैने कुछ देर सोचा. और- जो होगा देख जायेगा- वाला  इरादा बनाकर वापिस मुड़ा और वापिस चलकर उसके पास गया. उसके पास  जाकर उससे पुछा-` जो लड़का तुम्हरे साथ था वो कहाँ  है?'
` क्यों'-उसने पुछा.
` कुछ लड़के तुम्हारे पीछे लगे है'- मैंने बताया.
उसने पीछे स्थित ATM कि तरफ इशारा करके कहा-` उसके पीछे  लगे है?'
तब मैंने देखा. वो लड़का ATM के अंदर था . मैना कहा-` मुझ नहीं पता, पर टार्गेट तुम हो.................अगर कोई पंगा हो तो ध्यान रखना'
कहकर मैं रुका भी नहीं अपना रास्ते चल दिया.पीछे मुडकर उसकी रिअक्सन देखनी तक जरूरी नहीं समझी. 

मैं अब सोचता हूँ कि मैंने वो क्यों कर दिया. क्या इस वजह से कि वो बहुत खूबसूरत थी या मुझ कमीने के अंदर पहले वाला स्टुपिड -सा जोगेंद्र सलामत है ??????????? जिसने कभी भी कभी भी सही करने से पहले ये नहीं सोचा कि लोग क्या कहेंगे?
पता है जब कोई आपको ढक्कन कहे तो बुरा लगता है मगर तब कुछ भी सही कर डालने पर कभी भी पछतावा नहीं होता .................वैसे भी इतनी सेक्सी लड़की का भला करने कि कोशिश के बदले मा क्या पता वो इम्प्रेस हो जाये और मुझ जैसे गधे को भी पंजीरी खाने का मोका मिल जाये.........................हिहिहिही




Thursday, August 19, 2010

किसपर यकीन करें?

 आज मैने शहादत हसन मंटो साहब कि एक कहानी पढ़ी नाम था ` खुदा कि कसम` एक बदनाम लेखक के द्वारा लिखी गयी मार्मिक उस कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. गजब की मर्मस्पर्शी कहानी वो भी उस इंसान के द्वारा लिखी गयी जोअपनी गन्दी कहानियों के लिए बदनाम है.................ये अलग बात है उनकी इज्जत काफी है.और उनके काफी प्ले भी खेले जाते है. कहानी इस प्रकार है ......... एक गरीब औरत बंटवारे के बाद अपनी बेटी को तलाश करती फिर रही है . नायक यसे समझाता है की उसे मार दिया गया है(ताकि वो भटकना बंद कर दे)मगर वो नहीं मानती है क्योंकि उसका मन्ना है की उसकी बेटी इतनी ख़ूबसूरत है कि कोई भी उसे मरने के बजाये उसे अपने पास रखना पसंद करेगा. ....................अंत में जब बुढिया की हालत बेहद ख़राब हो जाती है तो एक  बेहद हसीं लड़की एक मर्द के  साथ आती है मर्द उस लड़की को उस बुढिया की ओर इशारा करके बताता है -' तुम्हारी माँ'.  लड़की उसे जबरन वहां से ले जाती है.  अपनी माँ से बात तक नहीं करती. बुढिया लड़की को पहचान लेती है और  उसके बारे में नायक को बताती है. मगर नायक के मन में लड़की के लिए कडवाहट पैदा हो चुकी होती है  और वो बुढिया से कहता है कि  उसकी बेटी सचमुच क़त्ल की जा चुकी है ये बात वो खुदा की कसम खाकर कहता है. वो बुढिया तत्क्षण मर जाती है. वास्तव में बेइंतेहा प्यार करती थी वो माँ अपनी बेटी को........और बेटी इतनी पत्थर दिल निकली कि  उसकी खस्ता हालत देखकर नजर फेरकर निकल गयी.  उसकी माँ की पुकार सुनकर भी नहीं रुकी. वैसे ये नोर्मल है कि माँ बाप बच्चों के लिए बहुत कुछ करते है मगर बच्चे उनके केयर नहीं करते ...........पर इस कहानी को पढ़कर अपने एक दोस्त कि याद आ गयी. उसकी कहानी ज़रा हटकर है. शायद अजीब सी और कडवी भी.
वो अपने परिवार से बेइंतेहा प्यार करता है. बचपन में अपनी माँ कि बड़ी सेवा करता था कोई बहन नहीं थी. कहता था कि माँ को बेटी की कमी महसूस नहीं होने दूंगा. घर के सारे काम करता था लगा रहता था कभी कोई डिमांड नहीं `ऐसे कपडे चाहियें .........ये खाना है` बस दस साल की उम्र में बर्तन साफ़ करता, झाड़ू लगाता,घर में मिटटी लीपता था, पापा के कपडे धुलता था, घर का कूड़ा और गोबर जब सिर पर रखकर घर से निकलता था तो गली की की लडकिय मजाक उड़ाती थी पर उसे कभी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो ये काम अपने परिवार के लिए करता था अपनी माँ की सेवा करता था अपनी माँ के लिए बेटी की कमी को पूरी कर रहा था. दादी पापा खाना कहा लेते थे मगर उसे खाना काम निबटने के बाद ही मिलता था. लाइफ आगे बढ़ी, उसका परिवार बिखरने लगा था. कहते है मेहनती आदमी पर देवता भी मेहरबान होते है उसपर भी सरस्वती मेहरबान थी लोग कहते थे कुछ बन जायेगा. जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ी उसे लगा उसके परिवार को उसकी ज्यादा जरूरत है. लोग अपन भविष्य के बारे में सोचते है वो अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोचने लगा. हर वक़्त दिमाग में परिवार को एक करने की उलझन रहती थी. इंटर की दोस्त जॉब की तैय्यारियों में लग गए और वो बस ये सोचने में लगा रहता था कि परिवार को एक साथ लेकर कैसे आगे बढूँ. दोस्त कहते कि फॉर्म डाल मगर वो कहता कि graduation के बाद डालूँगा. उसे डर था कहीं परिवार बिखर न जाये. ऐसा नहीं था कि परिवार पर पूरी तरह निर्भर था. थोडा बहुत कमाने भी लगा था. उसी से अपनी पढाई जारी रखे था. फिर लाइफ का सबसे तकलीफ भरा वक़्त आया. उसकी माँ बीमार हुई. हालत लगातार खराब होती जा रही थी माँ की.लग रहा था कि बच नहीं पायेगी. तब माँ से अकेले में बात हुईआज मैने शहादत हसन मंटो साहब कि एक कहानी पढ़ी नाम था ` खुदा कि कसम`
एक बदनाम लेखक के द्वारा लिखी गयी मार्मिक उस कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. गजब की मर्मस्पर्शी कहानी वो भी उस इंसान के द्वारा लिखी गयी जोअपनी गन्दी कहानियों के लिए बदनाम है.................ये अलग बात है उनकी इज्जत काफी है.और उनके काफी प्ले भी खेले  जाते है.
कहानी इस प्रकार है .........
एक गरीब औरत बंटवारे के बाद अपनी बेटी को तलाश करती फिर रही है . नायक यसे समझाता है की उसे मार दिया गया है(ताकि वो भटकना बंद कर दे)मगर वो नहीं मानती है क्योंकि उसका मन्ना है की उसकी बेटी इतनी ख़ूबसूरत है कि कोई भी उसे मरने के बजाये उसे अपने पास रखना पसंद करेगा. ....................अंत में जब बुढिया की  हालत बेहद ख़राब हो जाती है तो  एस बेहद हसीं लड़की एक मर्द क्वे साथ आती है मर्द उस लड़की को उस बुढिया की ओर इशारा करके बताता है -' तुम्हारी माँ'
लड़की उसे जबरन वहां से ले जाती है अपनी माँ से बात तक नहीं करती. बुढिया लड़की को पहचान लेती है ओर उसके बारे में नायक को बताती है. मगर नायक के मन में लड़की के लिए कडवाहट पैदा हो चुकी होती और वो बुढिया से कहता है की उसकी बेटी सचमुच क़त्ल की जा चुकी है ये बात वो खुदा की कसम खाकर कहता है.
वो बुढिया तत्क्षण मर जाती हैवास्तव में बेइंतेहा  प्यार करती थी वो माँ अपनी बेटी को........और बेटी इतनी पत्थर दिल निकली की उसकी खस्ता हालत देखकर नजर फेरकर निकल गयी उसकी माँ की पुकार सुनकर भी नहीं रुकी वैसे ये नोर्मल है कि माँ बाप बच्चों के लिए बहुत कुछ करते है मगर बच्चे उनके केयर नहीं करते ...........पर इस कहानी को पढ़कर अपने एक दोस्त कि याद आ गयी. उसकी कहानी ज़रा हटकर है. शायद अजीब सी और कडवी भी
वो अपने परिवार से बेइंतेहा प्यार करता है.
बचपन में अपनी माँ कि बड़ी सेवा करता था. कोई बहन नहीं थी. कहता था कि माँ को बेटी की कमी महसूस नहीं होने दूंगा. घर के सारे काम करता था.हर वक़्त  लगा रहता था.  कभी कोई डिमांड नहीं `ऐसे कपडे चाहियें .........ये खाना है`
दस साल की उम्र में बर्तन साफ़ करता, झाड़ू लगाता,घर में मिटटी लीपता था, पापा के कपडे धुलता था, घर का कूड़ा और गोबर जब सिर पर रखकर घर से निकलता था तो गली की की लडकिय मजाक उड़ाती थी पर उसे कभी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो ये काम अपने परिवार के लिए करता था. अपनी माँ की सेवा करता था. अपनी माँ के लिए बेटी की कमी को पूरी कर रहा था. दादी पापा खाना कहा लेते थे मगर उसे खाना काम निबटने के बाद ही मिलता था.
 लाइफ आगे बढ़ी, उसका परिवार बिखरने लगा था. कहते है मेहनती  आदमी पर देवता भी मेहरबान होते है उसपर भी सरस्वती मेहरबान थी लोग कहते थे कुछ बन जायेगा. जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ी उसे लगा उसके परिवार को उसकी ज्यादा जरूरत है. लोग अपन भविष्य  के बारे में सोचते है वो अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोचने लगा. हर वक़्त दिमाग में परिवार को एक करने की उलझन रहती थी. इंटर की दोस्त जॉब की तैय्यारियों में लग गए और वो बस ये सोचने में लगा रहता था कि  परिवार को एक साथ लेकर कैसे आगे बढूँ. दोस्त कहते कि फॉर्म  डाल मगर वो कहता कि graduation  के बाद डालूँगा. उसे डर था कहीं उसके दूर जाने  के बाद परिवार बिखर न जाये.उसकी जॉब लगती तो उसे घर से दूर जाना ही पड़ता. ऐसा नहीं था कि परिवार पर पूरी तरह निर्भर था. थोडा बहुत कमाने भी लगा था. उसी से अपनी पढाई जारी रखे था.
फिर लाइफ का सबसे तकलीफ भरा वक़्त आया. उसकी माँ बीमार हुई. हालत लगातार खराब होती जा रही थी माँ की.लग रहा था कि बच नहीं पायेगी. तब माँ से अकेले में बात हुई. तब माँ ने कहा-"मेरे बाद तेरे भाइयों और पापा का क्या होगा मुझे बस इसी बात कि चिंता है"
तब उसकी समझ में ये नहीं आया कि उसकी माँ के लिए उसकी importance ही नहीं थी या माँ को उसपर ज्यादा यकीन था.
तब उसने अपने बचपन के बारे में सोचना शुरू कर दिया.
पता है बचपन में वो बड़ी शिद्दत से काम करता था तो हमेशा ही ये मानकर चलता था कि उसे कोई मदद नहीं मिलने वाली वो परिवार के लिए जो भी कर ले उसको कोई return मुश्किल ही मिलेगा. पर तब भी यकीन था कि अगर वो टूटकर बिखरने लगा तो कोई कुछ भी करे उसकी माँ जरूर उसे कहेगी-"डर मत, मैं हूँ ना." उसे यकीन था कि भले ही कभी उसने उसकी केयर ने कि हो मगर अगर वो कमजोर पड़ने लगा तो माँ उसका सिर गोद में रखकर जरूर कहेगी-"चल थोडा आराम कर ले"
मगर उसके आखरी टाइम में जब उसने उसके लिखे चिंता जाहिर नहीं कि.............उस हालत में जब वो sattled नहीं था, जॉब नही थी, माँ के गुजर जाने के बाद के बाद घर कि सारी जिम्मेदारी उसी पर आ जानी थी. कोई उसे suport नहीं करता. उसके मोहल्ले वालों  तक  को इस बात का इल्म था मगर माँ को उसकी चिंता नहीं थी. क्यों?कुछ भी हो उसके बाद सच में टूट सा गया.उसे लगने लगा जैसे माँ भी उसे इस्तेमाल कर रही थी. उसने मुझसे पूछा-"यार जिस ओरत के लिए मैं बेटे से  बेटी बन गया......अपना भविष्य तक दांव  पर ही लगा दिया. अपनी लाइफ को मुश्किल बना दिया- उसकी ख़ुशी के लिए ही तो ना. जब उसी ने मेरी केयर नहीं कि तो कौन करेगा?"
सच में मेरी समझ में नहीं आया कि उसे तसल्ली कैसे दूं?
मेरी समझ भी ये नहीं आया कि उसकी ईमानदारी में क्या कमी रह गयी ही कि उसकी केयर नहीं की गयी ?
शायद ये चीज important है ही नहीं कि हम किसी को कितना चाहते है और उसकी कितनी केयर करते है? हर आदमी बस उसी कि केयर करता है जिसे वो चाहता है.हम किसी से कोई भी उम्मीद बस इस वजह से नहीं कर सकते कि हम उसे बेहद चाहते है.