Tuesday, March 15, 2011

love diary 3

अध्याय-७
मुझे मेरी दुआ रंग लाती नजर आने लगी.
हाँ!
अचानक उनका आना बंद हो गया.
वो दो-तीन हफ्ते में एक बार आते थे. उस बार आठ हफ्ते बीत गये मगर वो नहीं आये. आठवे में मेरा मन बेचैन हो गया.
" तू क्यों परेशान हो रही है?"- नेहा ने  फोन पर कहा.-"नहीं आया तो ना सही."
उस समय डिनर के बाद मैंने नेहा के पास कॉल की तब मैं अपने बैडरूम में थी. पापा अपने कमरे में थे.
"yaar, i not worry about it."-मैं फोन पर बोली, बैड पर पीठ के बल लेटी हुई, ठीक ऊपर छत को ताकते हुए जहां पर धीमी चल रहा था.ए. सी. को चलान बंद कर  दिया था क्योंकि व ओक्टोबर का महीना था.
" so waht it is baby?"- वो हंसी.
" यार, मैं हैरान हूँ."- मैं बोली-" पता नहीं उनके साथ कोई ट्रेजिडी तो नहीं हो गयी?"
" अगर हो भी गयी हो तो तुझपर क्या फर्क पड़ता है?"-वो लापरवाही से बोली-" अब तुझे उस ` एंग्री यंग मैन' को फेस नहीं करना पड़ेगा. ये भी हो सकता है कि तेरे पापा ने उस नौकरी से ही निकाल दिया हो. ऐ लिसन,पर वो तेरे पापा की फर्म में करता क्या है?"
" i dont know."
क्यों नहीं जानती ?-उसने ये नहीं पूछा.
 किन्तु.....
तब मुझे इस सवाल ने उलझा दिया.
***
ये सवाल मैंने पापा से किया.शाम के समय जब मैं और पापा घर  के छोटे से  बगीचे में झूले पर बैठे थे. मैंने लाड से पापा के गले में बांह डाल रखी थी और उनसे एकदम सटकर बैठी हुई थी.
" चीफ  प्रूफ रीडर है."-पापा नए बताया.
" बस."- मैं हैरान- "प्रूफ रीडर!"
" हां पर उसकी नालेज गजब की है.हर सब्जेक्ट पर कमाल की  कमांड है उसे. इंटरनेशनल पोलिटिक्स और इकोनोमिक्स तो उसके टिप्स पर रखी रहती है.?"
"इतनी सी उम्र में !"-मैं हैरान-" अगर इतनी नोलेज है तो आइ. ए. एस.वगैरा फोड़ें.-"मैं जरा-सी हिकारत भरे भाव से बोली-" प्रूफ रीडिंग में क्या कम लेते होंगे? तब वैल्यू भी अलग ही होगी."
"वो जॉब करना ही नहीं चाहता."
" क्या अब जॉब नहीं कर रहे?"- मैं व्यंग्य से कह उठी
" नहीं."- पापा ने बताया -"ट्रेनिंग ले रहा है."
" ट्रेनिंग ले रहे है!"- मैं हैरान.
" हाँ"- पापा ने मेरे साथ झोंटे खाते हुए कहा -" दरअसल वो पब्लिकेशन के धंधे में उतरना चाहता है.मेरेपास काम समझने के लिए आया है.मैं तो चाहता था कि वो मैनेजमेंट पर काम करे या मार्केटिंग संभाले पर उसने प्रोडक्सन  चुना.पहले वो सबसे जूनिअर प्रूफरीडर था. अब मैंने उसे चीफ बना दिया है. काम बड़े ध्यान से करता है "
"तो क्या वो आपकी पहचान का है?"
" सीधी पहचान का तो नहीं है."-पापा ने बताया-" एक दोस्त का भांजा है.उसी ने मुझे उससे मिलवाया था."
"ओह"
मैं उनके बारे में और भी ज्यादा जानना चाहती थी. मैं ये भी जानना चाहती थी कि वो अब घर  क्यों नहीं आ रहे थे-मगर पापा से नहीं पूछा.मन में डर था कही पापा के मन में ये बात ना धंस जाये कि उनकी बेटी उनमे ज्यादा उनमे ज्यादा इंटरेस्ट ले रही है.
किसी जवान लडकी का किसी मर्द में ज्यादा इंटरेस्ट लेने का लोग यही मतलब लगते है कि वो लडकी उसपर फ़िदा है.
मैं नहीं चाहती थीं- पापा मेरे बारे में ऐसा सोचें.
***
पापा की  बातें  सुनकर मुझे लगा कि वो शख्स वास्तव में एक छुपा रुस्तम ही है.तब मेरी समझ में आने लगा कि पापा उन्हें इतना भाव क्यों देते थे?
पापा के लिए वो केवल एम्प्लोई नहीं थे उनके दोस्त के भांजे भी थे. उनकी नॉलेज ने उन्हें और ज्यादा प्रभावित किया था.
उनकी डीसेंट नेचर( तब मेरे हिसाब से बोरिंग) पापा को क्लिक कर गयी थी.
पर..........!
वो घर पर क्यों आ रहे????????????
अध्याय-८ 
वो जनवरी का महीना था.
तारिख भी सम्भवत: १०-११ या १२ होगी.
दिन मंगलवार ही था.
मैं कॉलेज से लौटी. मैंने घर के पोर्च पर एक `छोटा हाथी' खड़ा हुआ देखा.कई लोग बड़े ही व्यस्त भाव से उसमे से सामान उतार-उतारकर अंदर ले जा रहे थे.
मैं जरा उलझी.
अपनी कार को मैंने `छोटा हाथी' के ठीक सामने रोका था.मैं कर से उतरी और अपने घर के अंदर की तरफ बढ़ गयी. मुझे यकीन था कि पापा वही पर मिलेंगे.
पापा मुझे ड्राइंग रूम में नजर नहीं आये.मैंने नोटिस किया कि वो लोग सारा सामान ऊपर की तरफ ले जा रहे थे. उसी समय शबनम आंटी किचन से निकली हमेशा  की  तरह वात्सल्यपूर्ण भाव से बोली-"आ गयी,बेबी? आप फ्रैस हो लो मैं आपके लिए डिनर वगैरा तैयार करती हूँ."
डिनर यानि लंच.
वो दोपहर का वक्त था.( आप शबनम आंटी की इंग्लिश की टांग तोड़ने की  आदत को बूले तो नहीं ना?)
मैं चाहती थी कि आंटी कि गलती को सुधारूं मगर नये मेहमान के बारे में उभरी उत्कंठा ने मुझे वो फालतू काम करने से( भैंस के भैरवी राग सुनाने से) रोक दिया.उत्सुक भाव से मैने पूछा-"शब्बो आंटी.कौन आया है?"
" वाही जनाब हैं जो मंगल को आते हैं."-उन्होंने मुंह बनाकर कहा -"आज यहीं आकर तम्बू गाड लिए."
" मतलब ?"
" अब यहीं रहा करेंगे."
"कौन मुकुल?"
" हाँ."
मै तुरंत भागती हुई तेजी से ऊपर की तरफभागती हुई गयी.तपो फ्लोर पर. वहां पर बस एक कमरा, बरसाती, बाकी  खुली छत थी. कमरे से ही अटैच्ड बात और टायलेट  भी थे.
पापा और मुकुल वहीँ थे सारा सामान बरसाती में ही रखा जा रहा था. सीढ़ियों पर दौड़कर चढने के कारण मेरी साँसे फूल रही थी.किताबें वक्ष में दबा रखी थीं. मैंने पहुँचते ही पापा को नमस्ते की.पापा मेरी तरफ पीठ करके खड़े थे और उनसे बातें कर  रहे थे.मेरी आवाज सुनकर वो मेरी तरफ घूमे. मुझे देखते ही उनकी आँखों में हमेशा  की तरह वात्सल्य उमड़ पडा-" ओह!तू आ गयी पलक बेटा."
"जी, पा..."-मैं उखड़ी साँसों के साथ बोली- " पा, ये सामान किसका है?"
" ये मुकुल का है."- पापा ने गम्भीर भाव से बताया-" ये फिलहाल यहीं रहा करेगा."
" क्यूं?"-मैं कह उठी .
पापा ने जवाब नहीं दिया.बोले-" जा शब्बो से पता कर खाना कितनी देर में तैयार हो रहा है?"
" वो कह रही हैं किमैं फ्रेस  हो लूं."-मैंने शबनम आंटी को टोन की  नकल करते हुए बताया-"वो डिनर तैयार कर रही हैं."
" डिनर?"- `वो' चौंके.
मैं और पापा एक दुसरे की तरफ को लुक  मुस्कुराए. मेरे अधरों पर थिरकती मुस्कान ज्यादा चपल थी.पापा ने उन्हें मुस्कुराते हे बताया-"भई, हमारी शब्बो कुछ ज्यदा ही पढ़ी लिखी है. लंच को डिनर, फ्रेश को फ्रेस .."-पापा बता ही रहे थे कि मैंने पापा की टोन से टोन मिलाई-"एप्पल को एप्पिल.बनाना को तरबूज बोलती है."
" ओह रीअली !!!!!!!"-वो तपाक से सब समझ गये.-"तो फिर उन्हें अब तक पी.एच. डी. की डिग्री मिल जानी चाहिए ."
हम सब हंस पड़े.
***
मैं वहां से अपने बैडरूम में गयी.
किताबों को बिस्तर पर फेंका अपनी चुनरी को गले में से निकालकर फेंका. निढाल-सी बिस्तर पर बैठ गयी.मर मन बुरी तरह से उग्द्वेलित था.
मैं उस शख्स का सामना करने से बचना चाहती थी. हालांकि उनके न आने के कारण मन में सस्पेंस भी था. एक रिलीफ भी मिला था कि जब इतना दिनों से नहीं आये तो अब क्यों आएँगे?
और अब.
अब तो वो घर पर ही आ गये थे सामान समेत.
***
"यार,उसके घर में रहने से तुझे क्या प्रॉब्लम है?"-नेहा ने कहा.मैने उसे रात को बैडरूम से फोनपर `उनकी'  आमद की खबर दी.
"अब यार, रोज उसके साथ दिन मा कई बार सामना हुआ करेगा."-मैने फोन को एक कान से दूसरे कान की तरफ शिफ्ट करते हुए कहा-" u know yaar.मैं उसे फेस पसंद नहीं करती."
"पर, जब वो नहीं आ रहा था-तब तू बड़ी तडप रही थी ये जानने के लिए की वो  क्यों नहीं आ रहा."-उसने मुझे तब भी टीज करने का मौका  नहीं खोया. हालाँकि वो जानती थीकि मेरे मन में उनके लिये कोई फीलिंग नहीं थी.-"अब  तो वो तेरे घर ही आ गया है, अब तुझे उसके मंगलवार के दिन न आने पर तडपना नहीं पड़ेगा."
" ओह शट-अप"- मैं झल्लाई-" तू फालतू बकवास तो कर मत."
" अच्छा!"-वो हंसी-" मैं बकवास कर रही हूँ!now just tell me baby why u hate him.?"
" i dont hate him but i dont like him too."-मैं स्पष्ट शब्दों में कहा-"वो कभी-कभार मुश्किल से मुस्कुराते हैं.हर वक्त उनके चेहरे पर बारह बजे रहते है. जब लुक देते है तो लगता है जैसे एक्स-रे से बदन को को खंगाल रहे हों.मेरे से ऐसे बिहेव करते है जैसे मेरी कोई वेल्यु न हो. तू जानती है ही जब वो मुझे ट्यूशन पढाता  था  तो कभी मुझसे फ्रैंक नहीं होता था. पा से खुलकर बातें करता है पर मुझे ठीक से हाए तक नहीं करता."
***
अगले दिन जब मैं कॉलेज में थी मेरे मोबाइल पर शशांक की कॉल आई. उसकी आवाज से साफ़ पता चल रहा था कि वो ख़ुशी के कारण हवा में उड़ रहा था उसने बताया -" मेरा एन.डी. ए. में सलेक्शन  हो गया है."
"क्या बात कर रहा है!!!!!!"-मैं चहकी-" सच्ची."
"ya"
" तो ट्रीट कब दे रहा है?"
" आ जा और ले ले."
 "कहाँ आऊं?"
" वहीं जहां हम हमेशा मिलते हैं."-उसने बताया-"क्लासखत्म होते ही मुझे मिस कॉल मार देना. मैं इधर से चल दूंगा उधर से तुम लोग भी पहुँच जाना."
" नेहा को बता दिया?"
"नहीं, पहला फोन मैंने तेरे पास ही किया है."-उसने बताया-" मैं उसी को फोन करने वाला हूँ तेरे बाद."
 " ओ. के."-मैंने व्यस्त भाव से कहा-"टीचर क्लास में पहुँच गये होंगे मुझे भी पहुंचना है.कट कर रही हूँ. bye see u latter."
"take care."

***
तब बस हम तीनों ही मिले.
वो बस हमारे ही ग्रुप का सेलिब्रेशन था. बस एक छोटी सी ट्रीट उसने दी थी. 
असली दावत तो वो ट्रेनिंग पर से छुट्टियों में आने पर  देने वाला था. तब तक उसे तनख्वा भी
 मिल जाने वाली थी. अब वो सब दोस्तों को बुलाने वाला था. 
अध्याय-९ 
उस दिन रात को मैं अपनी पढाई का काम निबटाकर बुक्स समेत रही थी कि मेरा फोन बजा.
मैंने किताबें सेफ में रखकर वापिस बैड के पास आकर फोन उठाया मैंने फोन के स्क्रीन पर फ्लैश होता देखा- जो कि शशांक का था. मैंने फोन लिए-लिए बैड पर लेटते  हुए  कल्ला रिसीव की-और तकिया अपनी तरफ खींचकर अपने अंक में दबा लिया-" hi Shashank, how r  u. तो कल जा रहा है."
" yaa."
" साड़ी तैय्यारी कर ली?"- मैं चहकी-" किस टाइम डिस्पैच हो रहा है?"
"रात को १० बजे की ट्रेन है"-उसने बताया-"Palak, i want to meet u."
" why?"
" बस मन कर रहा है."
 मैं कुछ न कह सकी. उसकी आवाज की गम्भीरता उसके किसी निर्णायक सोच तक पहुँच जाने की चुगली कर रही थी.
मेरी ख़ामोशी  के बाद वो फिर बोला-" तुम आ रही हो ना?......नेहा भी आ रही है."
" किस वक्त?"
" तुम दोनों कल कॉलेज नहीं जा रही हो."-उसने अधिकारपूर्ण  भाव से कहा-"मैंने नेहा से बात कर ली है. वो घर से  सीधी मेरे पास ही आ रही है."
" ठीक है."-मेरे होंठ थिरके-" मैं  भी आ जाउंगी."
मैंने ये नहीं पूछा- कहाँ आना  है? 
मुझे पता था कि नेहा को अपने घर का पता बता चूका होगा और उसके जस्ट बाद मैं नेहा से ही बात करने वाली थी.
मैंने वही किया. नेहा ने बताया -" कल उसके घर पर ही चलते है. वहीँ पार्टी करेंगे."
"उसके घर?"
" हाँ, उसके ममा-पापा तो घर पर नहीं रहेंगे."-नेहा ने बताया-" कल दोपहर बाद तक ही लोटेंगे. सो उसने सोचा  कल रेंड़ेवू उसका घर ही बना किया जाये."
मैंने कहा-" ओ.के."
 ***
शशांक का घर-|
वो दो मंजिला मकान था- जो कि एच-ब्लोक शास्त्री नगर में स्थित था. मेरा घर साकेत में है और नेहा का घर थापर नगर में.
मैं और नेहा तेजगढ़ी चौराहे पर मिलीं. वहां वो पहले से ही स्कूटी लिए मेरा इन्तजार कर रही थी. मैने भी अपनी स्कूटी पर थी. हम एक साथ  एच-ब्लोक की तरफ चल दीं-जहां पर शशांक हमारा वेट कर रहा था. 
हमे अपनी स्कूटी अंदर ले ली और गेट की मूसली लगा दी.वो हम दोनों को ऊपर वाले कमरे में में ले गया जो कि उसका बैडरूम था.वहीं उसने लहाने-पीने का इंतजाम किया हुआ था.हमारे वहां पहुंचते ही उसने पिज्जा डिलीवरी वाले को फोन कर दिया. लाइट भी आ रही थी.सो हमने टी.वी. ओं करके म्यूजिक चैनल चला लिया. टी. वी. के आवाज कम ही रखी ताकि बात करना में कोई दिक्कत न हो.
पिज्जा डिलीवरी  आधे घंटे में आ गयी.
हम उसके बाद तकरीबन एक घंटे तक बातें करते रहे. कोक के सिप  लेते समय मैंने नोटिस किया कि नेहा और शशांक कि नजरे मिलीं. गुप्त इशारे हुए.
" oh shit."-नेहा चिहुंकी.
"what happened?"-मैं चौंकी.
" आज ममा मेरी ढंग से पिटाई क्र देने वाली है."नेहा ने कहा.-"i must leave."
"why?"-शशांक ने पूछा.
" यार, ममा ने एक काम बताया  था."-नेहा झटके से उठकर  खड़ी भी हो गयी.-" मैं जा रही हूँ."
मैं चुप रही.
" यार, ये अच्छी बात नहीं है."शशांक ने नाराजगी जाहिर की.-"आज मेरे घर आई है. आज रात को मैं जाने वाला हूँ और तू है कि बिजी बनके दिखा रही है."
" हमेशा के लिए थोड़े ही जारहा है."-नेहा ने अधिकारपूर्ण भाव से कहा.-" तू छ:महीने बाद तो लौटने वाला है."- हंस भी पड़ी-" वैसे बजी डियर, तू फोज की ट्रेनिंग पर जा रहा है न कि बोर्डर पर वार के लिए जा रहा है जो तेरे लौटकर आने की गारंटी न हो."
" चल तुझे बाहर तक छोड़ आऊ." -शशांक ने व्यस्त भाव से कहा.
नेहा ने मुझे लुक दी. -" तू यहीं ठहर. हम बाद में मिलते है."
"ओ.के."- मैंने अपनी बांहों को अपने वक्ष पर समेटकर आपस में बांधकर कहा.
"i will call you in evening."
" o.k."
नेहा कमरे से बहार निकल गयी.शशांक ने मुझे बिलकुल लुक नहीं दी और वो नेहा के  पीछे-पीछे चला गया.   मेरे दिल की धडकने बढ़ गयी थी.
कुछ पलों बाद मेरे कानों में आयरन गेट की मूसली खुलने की आवाज पड़ी.फिर चाँद पलों के बाद नेहा की स्कूटी  के इंजन की घरघराहट मेरे कानों में पड़ी फी मूसली के बंद होने की आवाज.
मैं बिस्तर के पास ज्यों-की-त्यों खड़ी थी. 
वो वापिस आया.
कमरे में पिन-ड्रॉप-साइलेंस का माहौल व्याप्त था.लाईट के जाने के बाद टी.वी. अपने आप ही बंद हो गया था,मुझे खड़ी देखकर उसकी आँखों में एक सवालिया भाव उभरा.
" बोल, क्या कहना चाहता  है??"-मैं  बोली 
"sorry?????"-वो उलझा 
" हाँ इसीलिए तो नेहा को इतनी जल्दी  डिस्पैच कर दिया ?"-मैं पूर्ववत्त उसे देखती रही. 
वो सकपकाया-" प-प-प-पलक, its not like that....."
" what do u think  i m a  fool?-मैं एकदम सपाट भाव में कह उठी-" तुम जब नजरो से आपस में इशारे कर रहे थे तो क्या मुझे कुछ नजर नहीं आया-मैं क्या अंधी हूँ."
" पलक......."
मैंने फिर उकसी बात काट दी-" पता है जब तू कल नाईट में मुझे फोन करके मुझे आज इन्वाईट कर रहा था तो तेरिया आवाज से साफ़ पता चल रहा था कि कुछ भी नोर्मल नही है. फिर जब नेहा ने कहा कि तेरे घर को ही रेंड़ेवू बनाने का प्लान  था तो मेरा शक और मजबूत हो गया .............और अब नेहा का जाना. यु नो-वो अपनी ममी की इतनी ओबिडीएंट बेटी नहीं है कि वो  पार्टी बीच में छोड़ दे  वैसे भी उसके घर में नौकर-चाकर कम नहीं है."
इस बार शशांक बुरी तरह से बौखला गया-" पलक लिसन, जैसा तू समझ रही है वैसी कोई बात नहीं है." 
" अगर ऐसी कोई बात नहीं है तोमर टाइम वेस्टक्यों कर रहा है." -तभी मैंने कोड़े की फटकार से लहजे में कहा.
वो और ज्यादा बौखलाया.
चौंका.
अगले ही पल वो सदीद हिरानी से मेरा चेहरा देखता रह गया था क्योंकि वहां पर मद्धम-सी  मुस्कान भरतनाट्यम कर रही  थी.अगले ही पल वो मुस्कान हंसी में तब्दील होती  चली गयी.शब्द मेरे होंठों र मचले -"स्टुपिड, अगर मैं तेर बात सुनना नहीं चाहती होती तो सबकुछ समझ जाने पर भी रुकी क्यों रहती?"
उसकी हैरानी ख़ुशी में बदल गयी.उसका चेहरा यूं खिल गया जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी हो.
उसकी हैरानी का भाव भी हंसी में तब्दील होती चली गयी.
 वो मेरी तरफ बढ़ा.
मेरा दिल धक् से रह गया मेरे होंठ थरथराए किन्तु शब्द अंदर ही रह गये.सांसे अव्यवस्थित हो गयी.दिल चाँद पलों के लिए जैसे धडकना ही भूल गया था. " पलक."- वो पूरी गम्भीरता से बोला-" क्या तू भी.......?" 
" ya ,  i like you too."
" don't you love me?"
" शशांक तुझे पता है न-नेहा बता चुकी ही होगी-मैं पा की बात नहीं टाल सकती." मेरा लहजा ख्वाहिशो से भरा  हुआ था,-"मार बीएस चले तो मैं अपनी जिन्दगी अभ तेरे नाम कर दूं पर पा की मर्जी के बिना कुछ नहीं कर सकती."
" पता है."-वो बोला-"पर तेरे मूंह से  सुनना चाहता था."
पता नहीं क्यों?मैं भावविहल होकर शशांक से लिपट गयी.
मेरा शरीर भी मेरी आवाज की तरह कांप रहा था-"i love you too shashank."
शशांक ने भी मुझे अपनी बांहों में कसकर जकड़ लिया.
उसके होंठों का स्पर्श मेरी कनपटी पर हुआ तो मेरा समूचा शरीर जोर से कांपा. रग-रग में बिजली-सी दौड़ती चली गयी.शरीर में छिपा मेरे अरमानों का ज्वालमुखी खदकने लगा.शशांक मेरे कान में फुसफुसाया-"पलक, मेरा यकीन कर. तेरा हाथ थामकर मैं जिन्दगी भर नहीं छोडूंगा."
" पता है."-मैं अपना चेहरा उसके सीना मा छिपाकर बोली-"मुझे तुझपर यकीन है."
" शादी करेगी मुझसे?"
" हाँ, अगर पा मान गये तो कर लूंगी."
उस्न्स्र मुझे अपना से जरा-सी  अलग किया.मेरे मुखड़े को फिर हथेलियों के बीच लेकर मेरे माथे पर किस किया.
उफ़!
वो कैसा भंवर था जिसमे मैं फंस गयी थी. उस कम्बख्त नर जैसे मेरे अरमानों के ज्वालामुखी में विस्फोट कर डालने का इरादा कर रखा था.मैं उस भंवर से निकलना चाहती थी किन्तु निकल नहीं पा रही थी. मुझे पता था अगर मेरे अरमानों का ज्वालमुखी फूट मेरा समूचा वुजूद ही वासना के लावे में फना हो  जायेगा.
उसने फिर मेरी आंख को किस किया  .
दूसरी आंख पर किस किया और फुसफुसाया-"i wish तुम्हारी जिन्दगी में हमेशा नूर बरसता रहे."
मेरे बदन में  मानो ज्वालमुखी का लावा दौड़ने लगा.एक  बार फिर दिल धडकना भूलने-सा गया था. सांसे अंदर ही जब्त हो जाती थी कभी-कभी.
उसके होंठ मेरे मुखड़े पर अपनी मुहर अंकित करने लगेया थे. 
" श-श-श-शशांक......"-मैं मिनमिनाई.
उसने मुझे अपनी बांहों में फिर भर लिया.उसके होंठ मेरी गर्दन को चूमते चले जा रहे थे. उसके हाथ-जहाँ तक उनकी रीच थी- मेरे बदन को सहला रहे थे.
उफ्फ्फ!!!!
मैं मानो पागल हो गयी थी. 
पूरी तरह बेकाबू.
भंवर में तो पहले से ही फंसी हुई थी, किन्तु अब आंतरिक संघर्ष भी शून्य-ससा हो गया था.उसने फिर मेरा मुखड़ा अपनी हथेलियों में लिया.
" श-श-आंक."-मेरी आत्मा छटपटाई -"for god sake leave me please."
किन्तु.
उसपर मेरी गुजारिश का कोई फर्क नहीं पड़ा. वो मेरे मुखड़े को फिर चूमने लगा.
तभी.
उसके होंठ मेरे होंठों की तरफ बढे.....
घर्रर्र.
डौरबैल की चिंघाड़ के साथ हम दोनों फ्रीज हो गये.
मेरे गिर्द फैला भंवर बिखर गया.मैंने पूरी ताकत से शशांक को अपने से दूर धकेल दिया.वो पीछे को धिकलता हुआ लडखडाया और वहां राखी कुर्सी के साथ उलझा हुआ.उसके गले से चीख निकल गयी.
घर्रर्र.
डौरबैल पुन:चिंघाड़ी.
मेरी सांसे बुरी तरह उखड़ी हुई थी-जिनसे मैं लगातार काबू करने  की कोशिश कर रही थी.शशांक विस्फारित  नेत्रों से कभी मुझे देखता था कभी दरवाजे की तरफ-जिधर से डौरबल की आवाज आ रही थी.
" कौन आ गया अब?"-वो सस्पैंस के कारण हलकान भाव से बुदबुदाया.हालत चोरी करते उस चोर की तरह हो गयी जिसे थानेदार के आने की आहट मिल गयी हो?
मैं अपनी उखड़ी साँसों के बीच बोली-"देख जाके, कौन आया है?"
वो उठकर खड़े हो गया-" मैं देखता हूँ.जो भी होगा उसे दरवाजे से ही बगा दूंगा.तू जरा वेट कर."
वो तुरंत ही रूम से बहार निकल गया.मैं वहीं खड़ी-खड़ी अपने हवासों पर काबू पपने का प्रयास करती रही.मेरे मन में कोई ख़ास उत्कंठा नहीं थी, मैं तो मन-ही-मन  उसके आने पर उसकी शुक्रगुजार हो रही थी-कि वो आया था.उसी पल मेरे याद आया कि शशांक आगंतुक को दरवाजे पर से ही दफा कर देने वाला था.मेरे कानों में गेट की मूसली खुलने की आवाज पड़ी तो मैं समझ गयी कि शशांक गेट  खोल रहा था.
मैंने तत्काल पर्स उठाया. अपनी चुनरी को अपने वक्ष पर ठीक किया और उम से बाहर निकल गयी.
***
मकान की सीढियां मकान की गैलरी में आकर उतरती थी जहां ठीक सामने गेट था.
वहीं गैलरी में मेरी स्कूटी खडी थी.सीढियां उतरते-उतरते जैसे ही मेरी नजर गेट पर पड़ी तो मेरा खून जम-सा  गया था.  वो अप्रत्याशित आगंतुक शशांक की मम्मी थीं-जिन्होंने तब एक थैला थाम रखा था.
शशांक से बात करते-करते उन्होंने गैलरी में कड़ी स्कूटी को लुक दी.फिर उन्होंने अपनी नजर को आस-पास फिराया तो उनकी नजर सीढ़ियों की तरफ उठी और मुझपर आ टिकी.
अंदर-ही-अंदर मैं और भी ज्यादा सहम गयी.
"अरे पलक...."-वो चहकीं-"कैसी है तू?कब आई?"
 मैं खुद संभालकर सीढ़ियों से नीचे उतरी और उनके पास पहुंची झुककर उनके पैर छुए."नमस्ते"-भी की.
आंटी ने मुझे शत-शत आशीर्वाद दिए.
" तुम अकेली हो, बेटा?"-आंटी ने पूछा.
"जी, नेहा भी थी."-मैंने खुद को सुसंयत रखते हुए सर  झुकाकर बताया-"वो अभी-अभी गयी है.मैं भी जा ही रही थी."
" चली जाना, बेटा."- आंटी ने इन्सिस्ट किया.-" अभी-अभी तो मैं आई हूँ."
" बट आंटी, हमें भी यहाँ  काफी वक्त गुजर गया है. घर से फोन भी आ गया है .........आंटी, आपसे फिर कभी मुलाकत्ब करूंगी.now i must go."
आंटी ने मुझे फिर इन्सिस्ट करना चाहा मगर मैं नहीं रुकी.वहां से खिसक ली.
***
मैं जब घर पहुंची तो घर पर कोई नहीं था.माली घर की सफाई करनेवाली नौकरानी  अपन घर जा चुके थे.शबनम आंटी घर के किस कोने में थी-मुझे नहीं पता.
मैं सीधी अपने बैडरूम में पहुंची. बैग को बिस्तर पर फेंका और बिस्तर पर ऑंधी जा पड़ी.तकिया अपने अंक में भींच लिया.मेरे अंदर जैसे तूफ़ान मचा हुआ था.मेरी रगों का लहू जैसे तेजाब बन गया था. शशांक की हरकतों ने जैसे शांत समन्दर में ज्वारभाटा खड़ा कर दिया था.एकांत मिलते ही दिमाग में पन्द्रह मिनट पहली उस घटना के सीन फ्लैश होने लगे थे. वासना का भंवर मेरे वुजूद को फिर से अपने घेर में लेने लगा था.
जब रहा नहीं गया-वो ` तूफ़ान' सहा नहीं गया, तो मैंने एक-एक करके सारे कपड़े उतार दिए और बाथरूम में जाकर टब में पानी भरकर टब में जा लेटी.
मैंने अपन गर्दन का प्रष्ट भाग टब के किनारे पर पर टिका लिया और लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगी.
बाथरूम के एकदम ख़ामोशी भरे वातावरण में बस मेरी लम्बी-लम्बी सांसों का शोर गूँज रहा था.
***
मैंने  कपड़े तो वही पहने जो पहले पहन रखे थे.हाँ, अपने अंडरगारमेंट्स को नहाने के बाद बदल लिया.
क्यों??
लड़कियां तो समझ ही सकती है.( लडकों को वो वजह बतानी जरूरी नहीं समझती. कोई समझ गया हो तो उसे उसकी जानकारी के लिए बधाई)
तत्पश्चात नेहा को कॉल की,पूछा-"कहाँ है?"
" घर पर ही हूँ"-नेहा बोली, उसकी सांसों के लय बिखरी हुई थी.
"I want to meet उ"
."तू कहा है."
"घर पर."
" कब आई?"
" घंटा भर  पहले."
"what?"-वो हैरान-" उसने तुझे इतनी जल्दी छोड़ दिया!कुछ हुआ नहीं क्या?"
" मैं आ रही हूँ."मैंने निर्णयात्मक लहजे में कहा-" तेरे पास जो है, उसे वापिस  भेज दे."
" तू  आजा."
***
" अगर तुझे पता था उसका इरादा क्या है तो मुझे बताया क्यों नहीं?"-जाते ही मैंने उसे आड़े हाथों लिया.
" क्या पता था?"-वो बुरी तरह सकपकाई-" what are you saying."
" ज्यादा इनोसेंट बनकर मत दिखा."-मैंने उसे झाड़ दिया-"i know - ये तुम दोनों  की मिलीभगत थी.मैं तो सोच रही थी कि वो मुझे प्रपोज़ करना चाहता था पर उसका इरादा तो...."
उस समय हम दोनों ही उसके घर में थे. उसका बॉयफ्रेंड मेरे आते ही वहां से चला गया था.
"पलक."-वो बैड पर से उतरकर मेरे पास आई. तब मैं फर्श पर खड़ी थी मेरे करीब आकर मेरी आँखों में झांककर बोली-"क्या तू वो सब नहीं चाहती है? कम-ऑन यार. मुझे पता है तेरे मन में ख्वाहिशें जागती हैं.तू भी चाहती है कि तू भी ये सब करे. शशांक ही तेरा मिस्टर राईट है ना.....यार मैने तो बस तुम दोनों मौका  दिया था."
" नेहा तेरे लिए ये नोर्मल होगा"-मैं भड़की-" मेरे तेरे जैसी नहीं हूँ."
" oh shut-up."-वो भी भड़की-" what do u think i m slut? or nymphomaniac?"
" नहीं मैंने ऐसा तो नहीं कहा."
" तो क्या कहा?"
" मैंने बस इतना कहा कि मैं तेरी तरह इस चीज में कम्फर्टेबल नहीं."-मैंने बड़े ही सधे हुए शब्दों में कहा-"नेहा, तेरे लिए सेक्स एन्जॉय करने का साधन है.मैं उसे अपना बदन सौंपना चाहती हूँ जिससे मैं प्यार करूं.जिससे मेरी शादी हो."
" तो तू उसे प्यार नहीं करती?"-नेहा ने पैनी निगाह से मुझे घूरा.
" तू जानती तो है सबकुछ- हाँ, i love him."
" तू उससे शादी नहीं करना चाहती?"
"you know-हाँ.बट,क्या भरोसा शादी हो या न हो".-मैं कसमसाकर बोली-" तू जानती है पा कंजर्वेटिव टाइप के हैं . क्या पता वो हाँ करें या न करें."
"अगर ना भी कर दें तो क्या फर्क पड़ता है?"-नेहा बोली-"बाबू,ये तो तू भी जानती है कि वो तुझे कितना प्यार करते है?तेरी हरेक इच्छा पूरी करते है.तू जिद करेगी तो वो मान जायेंगे.-खैर ये भी छोड़. अगर तुम दोनों की  शादी नहीं होती तोम्क्य गारंटी है जिससे तू शादी करेगी वो वर्जिन ही होगा.तू क्या सोच रही है वो मौके पर चौका नहीं मार रहा होगा?कौन है जो मौका छोड़ देते है. तू भी अपना मौका कैश कर लेती.-वैसे भी २-४ प्रसेंट ही चांस हैं जो शादी नहीं होगी."
" मैं पा का सिर नहीं झुका सकती."-मैंने द्रढ़ता से कहा.
" यार उन्हें पता ही कब चलेगा ?"
" क्यों पता नहीं चलेगा?"-मैं बोली-"मुझे क्या  पता पा को कैसे पता चलेगा- पर क्या पता,पता चल जाये?और मैं अगर प्रेग्नेंट हो गयी तो?"
" प्रीकोशन......"
"सब फेल हो जाते है."-मैंने उसकी बात काट दी-" वैसे भी हम हर काम में एक्सपर्ट नहीं होते जो प्रीकोशन यूज करने के सही तरीकों में माहिर हों.ना ही हमे ये पता होता है अच्छी क्वालिटी के किस कम्पनी के हैं?- देख मैं  ऐसा काम  नहीं करना चाहती पा का  सिर झुके. कल को पा को अगर ये पता चल गया कि मैं क्या करती हूँ- तो वो मेरी जान नहीं लेंगे. मुझे कैद भी शायद नहीं करेगे. मेरे ऊपर शायद थोड़े बहुत बंधन लगा दें मगर मेरी जरूरतों को पूरा भी करेंगे.इसके बावजूद उनका सामने मेरी  इज्जत तो खत्म हो जाएगी ना. पा बस अपना फर्ज   
पूरा करेंगे-उनका लाड खत्म हो जायेगा.- मई ये कैसे भूल जाऊं कि पा ने दूसरी शादी इस वजह से नहीं ताकि उनका प्यार ना बाँट जाए. मैं छोटी सी थी जब ममा गुजर गयी थी.क्या पा को लाइफ पार्टनर की जरूरत महसूस  नहीं होती होगी?"
मेरी बात समाप्त होने तक कमरे का वातावरण बेहद तनावपूर्ण हो गया था.
नेहा भी एकदम खामोश.
मैं उसके पास से हटी और रूम की खिड़की पर जाकर खड़ी हो गयी. 
" सॉरी, पलक."-वहीं खड़ी-खड़ी नेहा बोली-"यार, मैं बस ये  सोच रही थी थी कि तू करेज नहीं जुटा पा रही थी. मुझे पता था कि तुम दोनों एक-दुसरे पर मरते हो लेकिन कुछ कह नहीं पा रहे."
" it ok"-मैं खिड़की से हटी और वापिस उसके पास गयी-"i know- you are my well wisher. don`t feel regret. यकीन कर मेरे मन में तेरे लिए कोई नफरत नहीं. पर यार कम-से-कम बता तो देती."
" बता देती तो क्या करती?"
" तब हम दोनों मिलकर उसके दिल की बात निकलवाने के का कोई और मौका देखते."-मैं मुस्कुराई-" बस `ऐसा' कुछ होने से बचने की कोशिश करती.सच यार, आज अगर  उसकी ममा ना आती तो वो `कांड' कर ही  देता. मैं भी अपना होश खो चुकी थी."
" क्या हुआ था?"- वो हौले से मुस्कुराई.
" आजा बताती हूँ." कहते हुए मैं बैड की तरफ बढ़ गयी. हमेशा की तरह बैड पर बेतकल्लुफ भाव से जम्प मारकर लेटती हुई बोली.
वो भी मेरी तरफ बढ़  गयी.
love diary  जरी है .........

Wednesday, February 9, 2011

love diary 2

अध्याय-३
चलिए मैं अपना परिचय दे दूं.
मैं पलक रस्तोगी.....तब मैं पलक शर्मा थी.
कद पांच फीट सात इंच-तब कद पांच फीट तीन इंच था. दूध-सा गौरा रंग,काला घने बाल-वो कहते हैं ये एकदम सिल्की हैं . भूरी ऑंखें, सीप के आकर की, वो कहते है- इनमें  गजब की पागल कर देने वाली कशिश है.मेरा चेहरा एकदम गोल है, वो कहते हैं- पूर्णिमा का चाँद भी मेरे गोल चेहरे की चमक को देखकर शर्मा जाता है और महीने में एक बार निकलता है. जब निकलता है तो मेरा मुखड़ा देखकर शर्म के मारे कम होने लगता है. सुतवां नाक. गुलाबी होंठ, मेरा निचला होंठ ऊपर वाले के मुकाबले में  जरा सा बड़ा है.वो जब प्यार करते हैं तो निचले वाले होठ को ही ज्यादा चूसते हैं.पतली लम्बी गर्दन जिसपर एक तिल है.तब मेरे उभार संतरे के आकार  के थे, शादी के समय एकदम अनछुए, 30B  इंच के थे,अब `उनकी' मेहनत का नतीजा है कि वो 36D के हो गए हैं.समतल पेट, गहरी नाभि- वहां `उनको' अट्रैक्ट करने वाली जो  चीज है- वो नाभि के साथ ही स्थित काला तिल है. पतली कमर चौबीस इंच की, शादी के वक्त भी इतनी ही थी.
मेरे पापा स्वर्गीय श्री मदनलाल शर्मा भारत  के टॉप पब्लिशर थे.राजनीतिक  मंच पर सीधे तो एक्टिवे नहीं थे लेकिन उनकी पूछ काफी थी. पापा का दो छोटे भाई है.श्री सुरेन्द्र शर्मा और लखन शर्मा- संयुक्त प्रोपर्टी और फाइनांस  का बिजनेस है. उनके बारे में ज्यादा डिटेल में जाउंगी तो कथानक कि गति रुकेगी.मेरे बाकी रिश्तेदारों के बारे में आप मौके के हिसाब से आप जन ही लेंगे.अभी तो कहानी कि शुरुआत है. सारे-के-सारे ट्विस्ट तो आने बाकी हैं.
मेरे `वो'..... यानि मुकुल रस्तोगी. 
कद साढे पांच फीट- यानि मुझसे एक इंच कम. इनकी हाईट कि वजह से मैं इनके साथ बाहर  जाते समय हाई हील नहीं पहनती. तब इनका बदन काफी हल्का था.( हे डोंट मिस-अन्डरस्टैंड यार, हल्का बदन कमजोर जरा भी नहीं. बहुत स्ट्रोंग है वो.खैर अब तो वजन भी सैंतालिस किलो से सत्तर किलो हो गया है.) बाल अब  भी पहले कि ही थर अध्घुन्घराले हैं और सिर पर सलामत हैं.मोटी-मोटी भवें. काली पुतलियाँ. चौड़ा माथा. 
वो बहुत कम बोलते हैं. जब देखते है तो ऐसा लगता है मानो नजर से रूह का पोस्टमार्टम कर रहे हों. बहुत कम मुस्कुराते हैं-पर जब मुस्कुराते हैं तो कमाल लगते हैं. और जब मेरे लिए मुस्कुराते हैं तो दिल करता है अपने हुस्न की तमाम तिजोरी उनपर लुटा दूं- सब कुछ तो उनका है ही. 
ok guys lets back to the story
***
उस दिन पापा मुझे ऑफिस से ही ननसाल छोड़ आये. कई दिनों तक मैं ननसाल में अपनी छुट्टी एन्जॉय नहीं कर सकी. मैंने तय कर लिया था कि अगर बाद में वैसा हुआ तो मैं तमाम  डीसेंसी भुलाकर उनकी बेइज्जती की  कोशिश करूंगी. 
किन्तु.........परन्तु...........लेकिन. 
मेरी एक स्टुपिड हरकत की वजह से वो मेरे गले पड़ गये. 
मेरी  स्टुपिड हरकत ?
***
इतनी स्टुपिड भी नहीं थी मेरी वो हरकत.मेरे स्कूल खुल गए थे तब. उस समय बस मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे कि मैंने पापा से कहा-" पा.......i want to joing economics coaching classes."
" why beta?"-पापा ने पूछा. वो मेरे साथ ही ड्राइंग में सोफे पर बैठे थे. 
" पा, आपको पता है ना मेरी इको वीक है."-मैंने मासूमियत भरे लहजे में याद दिलाया-"कोर्स भी बढ़ गया है. टेंथ  में तो ये S.St. में ये हिस्टरी.भूगोल, और सिविक्स के साथ थी. अब अलह सब्जेक्ट बन गया है.
" कोई इंस्टीट्यूशन सोचा है?"- पापा सोफे पर पहलू बदलते हुए कहा.
"नो पा."- मैंने मुंह बनाकर कहा. 
"ओ.के."-पापा ने सोचपूर्ण भाव से कहा. कुछ देर तक सोचते रहे.मैं भी पापा के जवाब का इन्तजार करती रही.
फिर पापा बोले="ठीक है,मैं कल मुकुल से बात करता हूँ वो इस सब्जेक्ट से मास्टर डिग्री किये है. "
'पा...कौन मुकुल?"-मेरा दिल धड़का. 
" अरे तू    मिल चुकी है उससे."- पापा ने याद दिलाया. 
मैं समझ गयी कि मेरा सामना किससे होने वाला था?
***
अगले दिन जब मैं स्कूल से लौटी तो पापा के साथ घर में उन्हें भी बैठा पाया.मुझे पता है, उन्हें देखते ही मेरे दिमाग में तंदूर जल उठे. मेरे दिल में भरे गुस्से के भाव  मेरे चेहरे पर भी छलक पड़े होंगे. मैंने खुद को सुसंयत रखने का भरपूर प्रयत्न किया, और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी, पापा ने मुझे दूर से ही पुकारा-" पलक, इधर आओ स्वीट हर्ट."
क्या करती ?
मुझे वहां जाना ही पड़ा.
मैं उनके पास पहुंची तो पापा ने कहा-" बेटा, ये मुकुल है. अब से ये तुझे इको. पढाया करेगा."
"जी."- मैं  सिर हिलाया मगर मन ही मन कलपी. 
टाइम तय किया गया-शाम पांच बजे का.
***
शाम पांच बजे मैं डांस क्लास से लौटी तो उन्हें घर में बैठेया पाया.
अब चूंकि बला सिर पड़ चुकी थी सो बला को झेलना ही था. मेरा शरीर तब पसीने से तर था. मैंने टी-शर्ट और लोअर पहन रखी थी. मैने नमस्ते  तक नहीं की, और दौड़ती हुई अपने बैडरूम में गयी इकोनोमिक्स की  किताब और कॉपी उठा लायी.
"सिट प्लीज."-उन्होंने गंभीर स्वर में कहा.
मैं उनके लेफ्ट  में बैठ गयी. मैंने किताब खोलने लगी तो वो गला  खंखारकर बोले-" किताब बंद कर दो."
मैंने झटके से उन्हें लुक दी, सवालिया अंदाज में. 
" कॉपी निकाल लीजिये."-वो बोले-" अभी किताब की जरूरत नहीं. मैं जो भी सवाल दूं उनके जवाब लिखकर मुझे दो."
मैं मन-ही-मन कलपी-'वाओ,एक शब्द भी नहीं पढाया और एग्जाम  शुरू.'
पर क्या करती.?
`गुरु जी' का हर हुक्म शिरोधार्य.मैंने कॉपी निकाल ली. उन्होंने मुझे छोटे-छोटे दस  सवाल लिखकर दिए.नौ सवाल इको के बेसिक से जुड़े थे. दसवां सवाल मेरा दिमाग घुमा गया. सवाल था-' सरकार को चाहये कि वो लोगों को सडक बनाने का  काम दे और रात को उन लोगों से सडक उखडवा दे जिनके पास दिन में काम नहीं था.-इस वाक्य कि व्याख्या कीजिये.'
` वाओ क्या इकोनोमिक्स है. अगर कन्स्ट्रकशन बर्बाद करवानी है तो करवाने कि जरूरत ही क्या है?'-मन-ही-मन मैं हंसी.
साथ ही सोचा-` किस स्टुपिड से पाला पड़ा है. जरूर ये चाँद पर इकोनोमिक्स पढकर आया है. अगर मैं फेल  हो गई ना तो पपमसे इसका बैंड बजवा दूँगी.'
मैंने क्विशन पेपर को सोल्व करना शुरू कर दिया उन्होंने मेरी किताब ली और पढनी शुरू कर दी
पुणे छ: तक पापा भी आ गए. तब तक मैंने क्विशन पेपर सोल्व कर लिया था,वो तब मेरे आन्सर्स चैक कर रहे  थे.आते ही पापा ने उसे सवाल  किया -" क्या पढाया जा रहा है, भई????'
" कुछ नहीं, सर."-उन्होंने कहा-"अभी तो ये ही तय करने कि कोशिश कर रहा हूँ कि शुरू कहाँ से किया जाये?
एक छोटा सा टेस्ट लिया है."
" देखें तो जरा."-पापा ने  उनके हाथ से कॉपी ले ली. उसपर नजर डाली. पढकर वो भी चौंके-" यार, ये कैसा सवाल है? जब सडक उखड़वानी  है तो बनवाने की क्या जरूरत है?"
" सर,इसी फंडे ने तीस की मंदी का इलाज किया था."-वो होले से हँसे.
" क्या बात कर रहे हो!!!!"-पापा हैरान.
मैं भी हैरान.
तीसा मंदी के बारे में मैं टैन्थ की हिस्ट्री में पढ़ा था. जब अमेरिका का इतिहास पढाया गया था. तीसा की वैश्विक मंदी वहीँ से शुरू हुई थी. तभी  मेरे दिमाग में घंटी बजी. बरबस ही मेरे मुंह से निकल गया. -"सर,इसका सम्बन्ध `न्यू डील' से तो नहीं?"  
"हाँ, "- वो मेरी ओर घूमकर मुस्कुराए-" आपने ठीक पहचाना. भले ही देर से पहचाना."
" तब कोई हिंट नहीं मिला था ना."-मैं बेधड़क बोली-"मैं तो अब भी ये नहीं समझी कि ये न्यू डील से कैसे जुड़ा है??????"
"कूल, समझाता हूँ"- उन्होंने व्याख्या देनी शुरू की-ये" बात माननीय जे. एम. कीन्स ने कही थी. उन्ही ने आय, व्यय का सिधांत दिया था. उनका कहना था कि एक आदमी की  आय ही उसका व्यय है, उसका व्यय दूसरे का रोजगार है. यानि किसी भी अर्थव्यवस्था में एक आदमी की कमाई होती  है तो वो उसे अपनी जरूरतों के सामान में खर्च करेगा. जब वो खर्च करेगा तो उसके लिए सामान बनाने के लिए दूसरे को रोजगार मिलेगा. जिसको रोजगार मिलेगा तो उसका भी खर्चा बढेगा.....तो तीसरे को रोजगार मिलेगा. इस तरह चेन में लोगों को रोजगार  मिलेगा. और उस  वक्त अमेरिका कि दिक्कत बेरोजगारी थी. वैसे ये भी सच है कि आय,व्यय,और रोजगार की  चेन के टूटते ही मंदी आ  जाती है."
" हाँ, मेरे याद है टीचर ने हमें यही कुछ बताया था."-मैं एक्साईटेड भाव से कह उठी-" फर्स्ट वर्ल्ड वार में अमेरिका ने भाग नहीं लिया था. वार अमेरिका की धरती  पर नहीं हुआ.पूरे वर्ल्ड कि जरूरतों को अमेरिका पूरी रहा था.वार ख़त्म हुआ और देशों ने उससे माल लेना बंद कर दिया तो जो माल पहले से तैयार था. वो गोदामों में ही रखा रह गया. लोगों को रातों-रात रोजगार से हाथ धोना पड़ा. तब अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डिनालो रूजबेल्ट  ने न्यू डील योजना शुरू कि और उसके तहत बेरोजगार लोगों को रोजगार दिया था. उसी के बाद इकोनोमी रास्ते पर आई थी."
" और वो `न्यू डील' कीन्स के इसी आय,व्यय और रोजगार के सिधांत पर आधारित थी."
मैंने सिर हिलाकर कहा-"समझ गयी."
" तो इसी बात पर पिला चाय."- पापा ने तपाक-से कहा-"चाय तू खुद ही रोज बनाएगी और मुकुल को पिलाया करेगी ट्यूशन के समय."
मैं भन्नाकर रह  गयी.  
अध्याय-4
उस दिन मेरा ट्यूशन शुरू हो गया. 
एकदम बोरिंग क्लासें. 
मुझे ऐसे पढ़ाते  थे जैसे फोर्मैलिटी पूरी कर रहे हों.आते ही लेक्चर देने लगते थे या कॉपी निकलवाकर नोट करवाना शुरू कर देते थे. मेरे सीनियर होने के बावजूद भी वो मुझे `मै'म' कहते थे.एक दूरी बनाकर रखते थे. मैं मन-ही-मन सोचती थी कि अगर मैं पसनद नहीं हूँ तो मुझे ट्यूशन क्यों पढ़ते है????
एक और बात मुझे उनपर गुस्सा दिलाती थी-वो उनका पापा से बहस करना. 
शाम को कई बार वो ट्यूशन के दौरान पापा घर पर आ जाते थे. तब मेरा ट्यूशन ख़त्म होने  पर मैं दोनों को चाय सर्व करती थी. चाय नॉर्मली शबनम आंटी  बनाती थी. अगर वो बिजी होती थीं तो चाय मैं खुद बनाती थी.(वैसे भी पापा चाहते थे शादी से पहले मैं किचन संभालना सीख लूं.)
उस समय पापा और `वो' किसी ना किसी मुद्दे पर डिस्कसन कर रहे होते थे.उस समय ` वो' पापा से खुलकर बहस करते थे. उनके स्वभाव में  नौकर का दब्बूपन जरा भी नहीं होता था. 
आखिर एक नौकर में इतना हौसला कैसे हो सकता था कि वो अपने बॉस से बहस करे और उसे गलत सिद्ध करने कि कोशिश करे.( `वो' पापा को गतल सिद्ध भी कर देते थे.)
***
मेरे दो बेहद खास दोस्त हैं-शशांक और नेहा.उन दोनों  को मैं  सब बताती थी. 
वो बहुत स्मार्ट है. एकदम कम्प्लीट पॅकेज है. फ़ुटबाल प्लयेर था. स्कूल टीम का कैप्टेन था. पढाई में भी शार्प था. स्कूल कि ज्यादातर लडकियां उसपर मरती थी. शायद मैंने उससे दोस्ती भी इसी वजह से कर ली थी. पर हम कभी भी डेट पर नहीं गए.हम जब भी कहीं स्कूल के बाद मिले तब हम तीनों ही मिले यानि मैं, नेहा, और शशांक . वैसे भी मेरे पूरे दिन का शेड्यूल पापा कि नजर में रहता था. टेंथ में मैथ्स ट्यूशन टीचर घर पर ही पढ़ा के जाया करता था. 
शशांक के पापा आई. पी. एस. हैं.
नेहा माथुर के पापा होटल चलाते थे. उनके शादी के दो मंडप थे और मेरिज ब्यूरो चलाते थे. नेहा कि मम्मी भी उसके पापा के साथ कामों में हाथ बंटाती है. एक छोटा भाई भी है उसका. तब वो नाइंथ क्लास में पढता था. मम्मी-पापा चूंकि काम में लगे रहते हैं और थोड़े केयरलैस भी है. इसी वजह से नेहा कुछ आजाद रहती है. उसकी आजादी का नतीजा ये था कि वी इलेवंथ क्लास में ही अपनी `चेरी' गँवा दी थी. वो एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में गयी और वाही पर एक रिश्तेदार के भी रिश्तेदार को अपनी `चेरी' सौंप दी. 
उसने जब उस एक्सपीरियंस के बारे  में मुझे बताया तो मैंने उसे डांटा-"तेरा दिमाग ख़राब हो गया है? अगर `कुछ' हो गया तो??????"
" कुछ नहीं होगा मेरी जान"-उसने फुल मस्ती के मूड में मुझे बाँहों में भरकर बेद बैड पर ढेर होती हुई बोली-"वो पक्का  वाला था. अपने साथ प्रोटेक्शन लिए था. वो खेला खाया था."
उसके बाद उसके वो जब भी मोका मिलता था अपने  बॉयफ्रैंड के साथ मस्ती लेती रहती थी.
खैर,
बात चल रही थी मुकुल की. 
मैंने मुकुल के बारे में बताया तो शशांक ने लापरवाही से कहा-"तू इतनी सी बात से परेशान क्यों है? अपने पापा से कहकर उसे हटवा दे."
मुझे सुझाव ठीक लगा.
***
" क्यों? पढ़ता तो ठीक है."-पापा ने कहा.मेरी बात सुनकर वो एकदम गंभीर हो गये थे.
डिनर के बाद हम ड्राइंगहॉल में टी.वी. देख रहे थे. तब मैंने पापा के सामने अपनी बात रखी.मैं सोफे पर पापा के और पास सरक गयी और लाडली बच्ची की तरह बोली-" पा, वो बात नहीं है."
"तो क्या बात है?"- पापा ने संदिग्ध भाव से मुझे घूरा. 
" पा, वो बहुत रूड हैं."- मैं मिनमिनाई-" जब पढ़ते हैं तो उनके बिहेव  में जरा भी अपनापन फील  नहीं होता.मुझसे ऐसे डिस्टेंस मेनटेन करके रखते हैं जैसे मुझे छूट की  बीमारी हो. मैं उनसे छोटी हूँ और वो मुझे हमेशा मै'म कहकर बात करते  है."
" तो क्या हुआ?"-पापा हंसे-" तू आखिर उसके बॉस की  बेटी है."
" वाट रबिश. i dont like this...........it seems that he didn`t respect me. he just trying maintain distance."
" बेटा, वो जरा-सा रिजर्व है."- पापा ने समझाया -"और अगर वो दूरी बनाकर रखता है तो कोई बात नहीं. वैसे भी में सब तरह के लोगों के साथ निभाना पड़ता है.वो स्मार्ट लड़का है.और एक घंट ही तो तुझे उसके साथ बैठना है. बस तू अपनी पढाई पर ध्यान दे बस."
मैं बस कसमसाकर रह गयी. 
पापा से एक दो बार लाड दिखाते हुए विनती की लेकिन पापा नहीं माने .
मैं पापा से जिद करना चाहती थी लेकिन की नहीं.. कभी की भी नहीं थी.मैंने जब भी जो माँगा पापा ने लाकर दे दिया.अगर वो कोई डिमांड पूरी नहीं भी करते तो उनसे क्या जिद करती?
अध्याय-५
मैंने  और नेहा ने मिलकर उनका नाम `एंग्री यंग मैन' रख दिया.मैंने तसल्ली कर ली कि उस ` एंग्री यंग मैन' को कुछ ही महीने झेलना पड़ेगा. कुछ महीनों में तो मैं इंटर पास कर ही लूंगी, फिर मेरा उनसे पीछा छूट जायेगा.
मैंने इंटर एट्टी परसेंट से पास कर भी ली. मेरे रिजल्ट के आने कि रात मेरे पास कॉल आई.मैं अपने बैडरूम में थी मैंने कॉल रिसीव की.-" हैल्लो"
" कांग्रेट्स"-दूसरी तरफ से मेरे कान में जो आवाज पड़ी उसने बेहद अपनापन था. मैं चौंकी. 
" सॉरी?"- मैं उलझी. 
" i said congraates ma'm"- कहा गया तो मेरा दिल धक्क से रह  गया. सांसें फेंफडों में ही अटक कर रह गयी.  मैं समझ गयी फोन करने वाला कौन था?मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को संभालकर कहा-"थैंक्स."
" क्या परसेंटेज बनी?"- उन्होंने पूछा. 
" एट्टी परसेंट."
" गुड"- वो ज़रा-से बुजुर्गाना भाव से बोले.- आगे क्या इरादा है?"
" i dont know."
" why?"
" बिकॉज, पा  नहीं चाहते कि मैं प्रोफेशनल बनूँ."-मैंने कहा. 
" ओह."- वो बोले. फिर तत्काल व्यस्त भाव से बोले.-" अच्छा ठीक है.  अब रखता हूँ. टेक केयर."
फोन डिस्कनेक्ट कर दिया गया. 
मैं हैरान.
ये क्या था?
वो कोई हकीकत थी या धोखा?
उनकी आवाज में इतना अपनापन कहाँ से आ गया. ज़रा सी भी रुडनेस नहीं थी वहां.नर्म और सुसंयत स्वर.
उस बारे में मुझे सोचने का ज़रा भी मोका नहीं मिला क्योंकि तभी शशांक  का फोन आ गया था.
***
" क्या बात कर रही है!!!!!!!!!!"- नेहा ने सुना तो हैरान रह गयी. ये बात मैंने नेहा को उसके घर  पर ही  उसके बैडरूम में बताई थी. तब वो संदिग्ध भाव से बोली. - " कहीं ये ` एंग्री यंग मैन मरता तो नहीं तुझपर ?"
" वाट रबिश"  मेरे मूंह से फूटा पर मेरा दिल धक्क से रह गया.-" i dont beleave  it."
" क्यों क्या बुराई है तुझमे?"-वो हंसी.-" खासी खूबसूरत तो है तू."
" हमारी एज का डिफ्रेंस तो देख. लगभग दस साल बड़े हैं मुझसे."
" तो क्या हुआ?"-  वो बोली-" वैसे भी तू साधू-सन्यासियों  को भी पागल कर  देने वाली चीज है. वो तो बेचारा तुच्छ सा `एंग्री यंग मैन' है. बेचारे के मन में भी तो अरमान मचलते होंगे."
मैंने उसकी बात को बढाने की कोशिश नहीं की. पर सच ये था कि मेरे मन में खलबली मच गयी थी. 
उसके बाद मैं और नेहा चैट करने लगीं. `उनके'  मन का वो  भेद को  महसूर करके मेरे मन में जो खलबली मची थी उसकी वजह से मेरा मन चैट में  मन नहीं लगा.एग्जाम के बाद छुट्टियों में उसे काफी वक्त मिल गया था  जिसका वो और उसका  बॉयफ्रैंड ने पूरा फायदा उठा रहे थे. वो मुझे हमेशा  ही सबकुछ बताती थी. सब सहेलियां अपने ` बेहद निजी' पलों को अपनी खास सहेलियों से शेयर करती हैं.मैं हमेशा  मजे से सुनती  थी. मुझे पता था कुछ ही सालों में मैं भी अपने स्पाऊज के साथ-( जो कि मैं शशांक को या उसके जैसे को बनाना चाहती थी- क्योंकि अलग कास्ट होने कि वजह शायद पापा ना मानते.)- करने वाली थी. `उस खेल' के दांव- पेचों  के बारे में पता चल जाये तो खेल का मजा जल्दी बढ़ने लगता है. 
तब  नेहा ने कहा-"ऐ, चल तुझे एक चीज दिखाती हूँ.कल ही मेरे बॉयफ्रैंड ने मुझे दी है."
" क्या?"
" बी.एफ."- वो कुटिल और लम्पट भाव से राजदाराना भाव से फुसफुसाई-"मैंने रात ही देख ली थी. सच्ची यार कमाल के शोट्स हैं उसमें."
" तू बहुत बिगड़ गयी है." - मैने उसे घूरा. मन में खलबली और ज्यादा बढ़ गय, पर वो दूसरी तरह की खलबली  थी.चेहरा ह्या से सुर्ख हो गया होगा-" इन गन्दी चीजों में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं."
" पक्की बात ??"-उसकी मुस्कान और ज्यादा कुटिल हो गयी. नजर और पैनी होकर मेरे चेहरे पर जम गयी-"तो फिर तेरे चेहरे का रंग सुख क्यों है?आँखों में नशा-सा क्यों छ गया है?"
अब मैं भन्ना गयी. उसके कंधे पर भन्नाकर चपत लगाते हुए मैं कह उठी-"स्टुपिड,इसे देखकर अंदर जो आग लगेगी उसे बुझाने के लिए तेरे पास तेरा बॉयफ्रैंड तो है. जब मेरे अंदर आग भड़केगी मैं किसकी हेल्प लूंगी?"
" क्यों????? एक हंक है ना."-वो शरारत से बोली.-" शशांक."
मेरा  चेहरा और तप गया. वो बोली-" तू कहे तो मैं तुम्हारी `मुलाकात' का अरेंज्मैंट करूं."
" नहीं."-मैंने  साफ़ इनकार कर दिया.-" अभी कुछ भी नहीं.शादी के बाद मैं `उन्ही' के साथ देखूँगी ताकि दोनों  एक साथ पूरा मजा भी ले सकें."
***
उस रात मैं बिस्तर में पड़ी-पड़ी काफी रात तक यही सोचती रही-कि क्या वो सचमुच मुझपर फ़िदा है????
स्टुपिड, अपनी शक्ल तो देखे . अपने मालिक कि बेटी पर ही नजर रखता है. वैसे भी बोरिंग, रूड और एंग्री यंग मैन को कौन भाव देगी.
अध्याय-६ 
 उस दिन के बाद मैन उनसे कटने लगी.
दिक्कत ये थी  उनका  हमारे घर में आना बंद नहीं हुआ था. मंगलवार को पापा कि छुट्टी होती थी. तब वो आ जाते थे .
मेरे इंटर पास हो जाने के बाद पापा ने मेरी  आगे कि पढाई के बारे में पुछा तो मैंने कह दिया-" ग्रेजुएसन कर लेती हूँ. "
"आप कोई प्रोफेशनल कोर्स क्यों नहीं करतीं?"-` वो' कह उठे. 
" क्या करेगी प्रोफेशनल कोर्स करके?"-पापा ने कहा-"इसे वैसे भी इसकी जल्दी ही शादी करनी है. सोच रहा हूँ इसके लिए कोई लड़का तलाश करना शुरू कर दूं. ढंग का लड़का मिलने में २-३ साल तो लग ही जाते हैं.जब तक ग्रेजुएसन करेगी तब तक  कोई ना कोई लड़का टकरा ही जायेगा. आगे क्या करना है इसके ससुराल वाले जाने."
अपनी शादी की बात सुनकर मेरा दिल धक्क से रह गया. मुझे पक्का यकीन है ह्या के कारण मेरा चेहरा तपकर सुर्ख हो  गया होगा. मैन भी उनके चेहरे पर दिल चटकने की तकलीफ को तलाश कर रहीथी किन्तु मुझे वहां कोई रिएक्सन नजर नहीं आई. 
वो एकदम सामान्य भाव से बोले-" सर, जो लोग प्रोफेशनल होते हैं वो भी तो शादी करते हैं. आप मै`म को कोई प्रोफेशनल कोर्स करवाइए ताकि जरूरत पड़ने पर बिजनेस को संभल सकें. इन्हें एडमिशन दिलवाकर आप चाहें तो इनके लिए लड़का तलाश करना शुरू कर दीजिये. लड़का मिलते ही शादी कर दीजियेगा."
सच में ही मुझे इनके बिहेव नहीं लगा कि वो मुझपर फ़िदा थे. 
***
मेरा एडमिशन ग्रेजुएसन के लिए `मेरठ कालेज'में करवा दिया गया.  नेहा ने भी वही एडमिशन लिया लेकिन साइंस में. शशांक ने N.D.A. की तैय्यारी के लिए इंस्टिट्यूट  ज्वाइन कर लिया. 
पापा चाहते थे कि मैं ग्रेजुएसन में इको. लूं लेकिन मैंने ही जानबूझकर नहीं ली. मैंने नहीं ली. मुझे पता था कि जरूर पापा `उन्ही' को मेरा ट्यूटर को  अपोइन्ट करेंगे.ऐसा नहीं था कि हमारा शशांक से मिलना-जुलना बंद हो गया था. वो P.L. SHARMA Road पर पढता था-जो कि मेरठ कॉलेज के पास ही है.जब भी हमारा मिलने का मूड होता हम पास के किसिस भी रेस्टोरेंट में मिल लेते थे. 
***
" ऐ तेरा `एंग्री यंग मैन' तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला."-एक दिन फोन पर नेहा ने मुझे बताया.उस वक्त मैं दोपहर में अपने बेडरूम में थी. टी.वी.देख रही थी. नेहा के फोन आने कि वजह से मैंने टी.वी. का वोल्यूम म्यूट कर दिया.उसने बताया-"उसके साथ एक लडकी है."
"so what?"-मैंने लापरवाह से कहा-"उसकी बहन-वहन होगी."
"wow....कम्पनी बाग़ में!!!!!!!!!!!"-उसने व्यंग्य से कहा-"झड़ी के पीछे.हाथ में हाथ थामे भाई-बहन बैठते है? उनकी बॉडीलैंग्वेज बता रही है कि दोनों के बीच सीन चल रहा है."
मेरा दिल धक्क से रह गया 
"क्या बात कर रही है!!!"-मैं भी  कम हैरान नहीं थी-" i cant beleave it....वैसे वो दिखने में कैसी है??"
"अच्छी है."-उसने बताया-" खूबसूरत है."
" बहुत ज्यादा खूबसूरत है?"- मुझे समझ नहीं आ रहा था  कि मेरा दिल इतना  आंदोलित क्यों था?
" हाँ पर तुझसे कम है. तेरी तरह गोरी चिट्टी नहीं हैं पर रंग फेयर है."
"और?" 
" और क्या ???"-वो झल्लाई -" मैं कोई लेखिका तो हूँ नहीं जो तुझे हैड-टू-टो उसका डिस्क्रिप्शन दूं"-तभी बोली-" ले मैं मोबाइल कैमरे से उसकी पिक्चर ले रही हूँ."
मैं चुप रह गई. तभी मन में आया-` अरे मैं उस लड़की के में इतना इंटरेस्ट क्यों ले रही हूँ?'
क्यों?
शायद मैं उनपर अपना हक समझने लगी थी.मुझे लगता था कि वो मुझपर मरते थे. या शायद उनका- अपने आस-पास मेरे जैसी हसीं लड़की होते हुए- किसी और पर फ़िदा थे, ये मेरे हुस्न कि तोहीन भी तो थी
*** 
अब मैं कोशिश करने लगी थी कि मेरा उनसे सामना ही ना हो. मुझे पता था मंगल के दिन जब भी आते थे शाम को छ: सात बजे आते थे.उस वक्त मैं या तो अपने रूम में पढने बैठ जाती थी या घर में ही नहीं होती थी.पापा को शक ना हो इसी वजह से मैंने अपनी रोज कि पढाई का वाही वक्त तय किया. 
उन लोगों को चाय देने के लिए मुझे खुद ही नहीं कहा जाता था. उलटे मुझे शबनम आंटी मेरे बेडरूम में आकर मुझे -रिफ्रेशमेंट के लिए-चाय दे जाती थी.
 

 love diary  जारी है.......

Friday, January 21, 2011

love diary

अध्याय-१ 
वो मेरी जिन्दगी में जबरन आये थे . मेरी बगैर मर्जी के उन्होंने मेरे घर में एंट्री ली और फिर मेरी जिन्दगी का हिस्सा बन गए. ना केवल मेरी जिन्दगी का हिस्सा बन हाय बल्कि मेरी  हर चीज पर भी कब्ज़ा जमा लिया.
मुझे उनकी सूरत से नफरत-सी थी मगर वो बार- बार मेरे घर आते थे. घंटो-घंटो मेरे घर पर बैठे रहते थे मुझे उन्हें चाय भी सर्व  करनी  पड़ती थी.
मैं  सोच रही थी कि  उस आदमी का अपने घर पर आना बंद कैसे करूं?  तो वो मेरे घर में ही आकर रहने लगे. पहले उन्हें चाय सर्व करनी पड़ती थी अब तो उन्हें खाना भी देना पड़ता था. मैं कलप-कलपकर सब करती थी. दुआ करती थी उनके साथ  कहीं कुछ ऐसा हो जाये कि फिर उनके कदम हमारे घर में ना पड़ें.
मैं उन्हें अपने घर से दूर करना चाहती थी कि वो मेरी जिन्दगी पर ही काबिज हो गए. रिजल्ट ये है था कि १८ जून को मैं अपनी सुहागसेज  पर बैठी  उनके आने का इंतजार कर रही थी.
अध्याय-
पहली बार मेरा मतलब तब पड़ा था जब मैं सोलह साल की थी. मैंने इलेवंथ क्लास तभी पास की थी और समर वेकेशन शुरू हो चुके थे. मेरे पापा स्वर्गीय मदनलाल शर्मा ने उस शनिवार मुझसे वाद किया था कि वो उस दिन मुझे शोपिंग करवाकर लायेंगे. रविवार को मुझे सुबह ही मेरी ननसाल ले जायेंगे.
मैं उस दिन डांस क्लास से घर लौटते समय ही घर के नौकरानी शबनम आंटी को गीजर ऑन कर देने के लिए कह दिया था. शबनम आंटी ने वही  किया भी. मैं घर आते ही बाथरूम में घुस गयी. नहाई और फ्रेश कपडे पहन लिए. मुझे पता था जब तक मैं तैयार होती पापा घर पर आ जाने वाले थे. शाम के पांच बजे का टाइम मैंने पापा को दे रखा था. ठीक पांच बजे मैं रेडी हो गयी. मगर पापा नहीं आये. दस-पन्द्रह मिनट कि देर हो सकती थी-जो नॉर्मल बात थी.शबनम आंटी ने मेरे कमरे में आकर पूछा-"बेबी, जूश लेकर आऊँ?"
"नहीं आंटी"-मैंने व्यस्त भाव से बैड पर बैठे-बैठे सामानों कि लिस्ट चैक करते हुए कहा-"रहने दो."
तब शबनम आंटी कि उम्र चालीस साल थी.हट्टी-कट्टी, मजबूत काया शबनम आंटी ५'५" कद की  महिला हैं . मेरी ममा तब गुजर गयी थी जब मैं दस साल की  थी. पापा ने दूसरी शादी नहीं की और शबनम आंटी ने मुझे ममा की कमी का अहसास नहीं होने दिया. वो पांचवी पास बताती थी खुद को- लेकिन अक्षर को जोडकर तक  उन्हें नहीं आता था. उसके बावजूद उन्हें टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने कि आदत है. वैसे ज्यादातर वो अंग्रेजी कि टांग तोडती हैं, पर जब गंभीर होती है तो हिंदी-उर्दू में बात करती है.
शबनम आंटी ने वात्सल्यपूर्ण भाव से पूछा-" मगर बेबी, आपने दोपहर में भी डिनर ठीक से नहीं किया था."
"डिनर नहीं, आंटी"-मैं मुस्कुराई -" दोपहर को लंच होता है."
" ह-ह-हाँ-हाँ, वो ही तो बोली थी मैं."- तुरंत उन्होंने बात बदली-" जूश पीना है या नहीं? मैं ला रही हूँ बनाना का लाऊँ या मौसमी का ?"
"बनाना का शेक होता है,आंटी"- मैंने सुधार किया.
" अरे वाह."- वो तमक कर बोली-" कल तो जूश निकलवाकर पिया था. शेक कब से बनने लगा उसका ?"
" कल तो तरबूज का जूस पिया था."-मैं बडबड़ाई. 
" वाही तो...फिर तरबूज का शेक कब से बनने लगा?"
" ohhh godddd"- मैंने माथा पीट लिया -" just get along.आप तो मेरा दिमाग ख़राब कर देंगीअभी मुझे बस अपना काम करने  दो."
मैं समझ गयी थी. वो बनाना को केला नहीं तरबूज समझ रही थी. तुर्रा ये था कि वो ही वो मुझे भी समझाना चाहती थी. 
वो बडबडाती मैं लिस्ट चैक करने में जुट गयी.लिस्ट में क्या-क्या सामान और एड करना था मैं ये तय करने लगी.जो कुछ भूल गयी थी उसे याद करने लगी. मेरा घ्यान बाहर की  तरफ भी था ताकि पाप की  कार के इंजन का शोर सुन सकूं और मुझे उनकी आमद कि खबर हो जाये. मेरा काम ख़त्म हो गया. मगर पापा की  कार का शोर मेरे कानों में नहीं पड़ा. 
मैंने बेडरूम में लगी दीवार घडी को लुक दी. उसमे साढे पांच से ऊपर हो गए थे. मैं जरा बेचैन हो गयी. मुझे लग कही पापा भूल तो नहीं गए थे.मैंने पापा का फोन ट्राई किया तो  वो स्विच ऑफ मिला. मैंने पापा का ऑफिस का नम्बर मिलाया. बैल गयी. कॉल रिसीव की गयी. मेरे कानों में पापा के रिसेप्सनिस्ट की  मधुर आवाज कि जगह पर खुश्क आवाज मेरे कान में पड़ी-" हैलो" 
"पा को फोन दो"-मैंने उसे पूरी तरह से उसे नजरअन्दाज् करते हुए जरा उग्द्वेलित स्वर में कहा.
" कौन  पा "-पूछा गया 
" मेरे पा , और कौन?"-मैंने अधिकार पूर्ण भाव से कहा 
" मै`म आपको किससे बात करनी है?"- फिर पूछा गया 
" ohhhhhhhh shut-up"- मैंने भन्नाकर कहा-" मैना कहा ना मुझे पा से बात करनी है.उन्हें फोन दो और उनसे कहो कि पलक बात करना चाहती है."
" रोंग नम्बर मै`म"-कहकर रिसीवर रख दिया गया. 
गुस्से में मेरे दिमाग में तंदूर जलने लगे. उनकी तपिश मेरे को भी लाल कर दिया था. मेरे दिल में ये आया काश वो बदतमीज मेरे सामने होता तो मैं वही फोन उठाकर  उसके सिर पर दे मारती.   
***
सवा छ: बजे पापा घर वापिस आ गए. पापा- यानि भारत के मशहूर प्रकाशक श्री मदनलाल शर्म, कुंतल भर के भारी भरकम बदन वाले, पौने छ: फीट कद के शख्स थे. सांवला रंग. सिर के आधे बाल गायब थे. डबल ठुड्डी वाले चलेँ शेव्ड चेहरे पर  वो हमेशा ही गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा लगाते थे जब वो आये तो मैं उस समय ड्राईंग हॉल  में ही थी. पापा को देखते ही मैं फट-सी पड़ी-" पा, आप कहाँ थे अब तक ? आपको याद है ना आपको शार्प फाइव ओ`क्लोक  पर आ जाना था और अब सवा छ: बजे है"
" सॉरी माय चाईल्ड"-पापा ने लाड से अपनी बाँहें फैला दीं. मैं दौड़ती हुई पापा के सीने से लिपट गयी. पापा ने अपनी मोटी-मोटी बाँहें   मेरे गिर्द लपेट दीं. पापा ने वात्सल्यपूर्ण भाव से मेरा सिर सहलाते हुए खेद प्रकट किया-"  i was bussy. चार बजे एक पार्टी अचानक बिना टाइम लिए आ गयी थी. उसी के साथ वक्त लग गया था."
" आपको पता है मैंने ऑफिस फोन किया था."- मैंने पापा के सीने  से लिपटे-लिपटे ही बोली-" और पता नहीं वो कौन बदतमीज था उसने आपको फोन नहीं  दिया."
" क्या?"-मैंने पापा के चेहरे पर गुस्से की  रिएक्सन देखी-"कौन था?"
" i dont know, pa"-मैंने मासूमियत से कहा-"बट, बड़ा ही बदतमीज था. मैंने कई बार कहा` आपसे बात करनी है, आपसे बात करनी है' - पर उस बदतमीज  आपको फोन नहीं दिया. मैंने अपने नाम  भी बताया बट उस बदतमीज ने `wrong number'-कहकर फोन कट दिया."
गुस्से से पापा का भी चेहरा  तमतमा गया-" अच्छा, मैं कल जाते ही पता करता  हूँ."
" पा, मैं भी आपके साथ चलूंगी कल ऑफिस."- मैंने कहा. मैं भी उस बदतमीज के चेहरे का पानी उतरता देखना चाहती थी- जब पापा उसकी क्लास लेते. 
सच भी था. पापा हर बात बर्दाश्त लेते थे मगर मेरी तकलीफ और मेरी बेइज्जती उन्हें कभी बर्दाश्त नहीं थी. 
***
" कल मेरे घर से आई काल किसने रिसीव की थी?"- पूरे स्टाफ को फर्म के स्टाफ रूम में रेगमाल के खुरदरे लहजे में पूछा तो स्टाफ रूम में सन्नाटा खिंच गया. सबके-सब अपराधी की भांति हाथ बांधे पापा के सामने खड़े थे. इकलौती मैं थी जो पापा के सामने चेयर पर बैठी थी. उस वक्त मैंने फूलों के प्रिंट वाली स्कर्ट और लाईट पर्पल हाफ स्लीव वाली शर्ट पहन रखी थी. मेरे बालों को पोनीटेल कि शक्ल में बांध रखा था.मेर जेहन में में अजीब-सी संतुष्टि के भाव ने सिर उठाना शुरू किया.
 स्टाफ रूम में कई पलों तक पैना सन्नाटा छाया रहा.
"सर."-पापा कि रिसेप्सनिष्ट छाया ने मिमियाते हुए कहा-" मेरे सामने तो मे`म का कोई फोन नहीं आया था.पांच   बजे के बाद आया होगा."
" काल साढे पांच बजे आई थी."-पापा ने खुरदरे स्वर में  कहा.
" सर, साढे पांच बजे तो अपनके घर से कोई काल नहीं आई थी."-ठीक  पीछे से एक स्वर उभरा-"हाँ एक क्रैंक काल जरूर आई थी."
" क्रैंक काल?"-पापा उलझे.
" सर, किसी लड़की की काल थी."-कहा गया. 
मैंने झटका से घूमकर देखा. 
ठीक मेरे पीछे एक हल्के से बदन का पच्चीसेक साल का युवक खड़ा था. रंगत गेहूं जैसी. कद साढे पांच फीट. अधघुन्घराले बाल अंडाकार चेहरा. काली आँखे. होठों पर छंटी हुई छोटी-छोटी मूंछे. उस शख्स का ध्यान जरा भी मेरी तरफ  नही था. वो पापा के ही मुखातिब था. लगातार कह रहा था-" बार-बार यही रट लगाए जा रही थी कि `पा से बात करनी है, उन्हें फोन दो .' मैंने पूछा `किसके बात करनी है?' तब नही किसी का नाम नहीं लिया."
" तुमने क्या किया?"- पापा ने पूछा.
" और क्या करता?"- उन्होंने सहज भाव से कहा-" फोन रख दिया."
" मैंने अपना नाम तो बताया था."- मैंने शब्द चबाए.
" अरे!"- झटके से मेरी तरफ लुक देकर वो बोले-" अपना नाम बताने से क्या ये पता चल जाता है कि आपको किससे बात करनी है..........."
वो आगे कुछ कहते इसे पहले ही पापा कि आवाज मेरे पीछे से उभरी-" इसके नाम बताने से पता चल जाता है. ये मेरी इकलोती बेटी है.'
वो एकदम जैसे फ्रीज हो गए, मुंह में  दही जम गयी थी. 
सच. 
मेरे दिल को बड़ा सुकून मिला उनकी वो हालत देखकर. किन्तु मेरे मान का सुकून ज्यादा देर तक कायम नहीं राह सका. उनके मुंह कि दही पिघली और वो कह उठे-" मै`म, i m sorry for that, बट ये तो आपको भी सोचना चाहिए था कि आप किससे बात कर रही हैं ? आप स्टुपिड की  तरह हर बार ये ही रट लगाये जा रही थी कि` पा  से बात करनी है, पा से बात करनी है.' अगर आप अपना इंट्रो ठीक से देतीं तो क्या मैं उस तरह बिहेव  करता?
वैसे भी मुझे क्या पता है कि सर के परिवार में कौन-कौन हैं और उनके नाम क्या  हैं?"
मैं जलकर रह  गयी-` मुझे स्टुपिड कहा!'
" बेटा, मुकुल ठीक कह  रहा है."- पापा कि आवाज मेरे कानों में पड़ी तो  मैंने पापा की  तरफ लुक दी. पापा के होठों पर मुस्कान थिरक रही थी.-"इसे दो ही महीने हुए है यहाँ काम करते हुए.इसे तेरे बारे मैं नहीं पता होगा.अगर तू ठीक से इसे अपना इंट्रो देती तो ये उस तरह बिहेव ना करता.वैसे भीं ये बड़ा ही डीसेंट लड़का है-भई मुकुल,माफ़ी मांग लो इससे ."
" सर मैं सॉरी तो बोल चुका हूँ"- वो आज्ञाकारी बालक की  तरह बोले-"पर अगर आप कहते हैं तो मैं फिर  माफ़ी मांग लेता हूँ"- मेरी तरफ लुक दी. मैं भी उनकी तरफ घूमी. वो बोले -" oh sorry ma'm. please forgive me."
मैं कुछ नहीं बोली.
मैंने एक-एक करके सबको लुक दी. सबके होठों पर दबी-दबी मुस्कान थिरक रही थी. मैं कसमसाकर रह गई.वो एकदम गंभीर नजर आ रहे थे किन्तु मुझे यकीन था अंदर-ही-अंदर वो बेहद खुश होंगे.
स्टुपिड को इतना भई कामन सैंस नहीं था-जब फर्म का नाम पलक था और मैं अपना नाम पलक बता रही थी.तो पापा कि ही बेटी थी ना.
  मैंने ये सब कहना तो चाह मगर ना कह सकी. मेरी हालत उस बच्ची कि तरह थी जिसे किसी ने झन्नाटेदार थप्पड़ मारकर लोलीपोप थमा दी हो.
love diary जारी है......... प्यार का मोसम पास आ रहा है दोस्तों ( १४ फरवरी) इसीलिए मेरे द्वरा लिखी गयी अप्रकाशित प्रेम कहानी  उपन्यास पढ़िए. आगे कि कहानी आपको अगली पोस्ट्स में  पढने  लिए मिलेगी.उम्मीद करता हूँ आपकों आखिरी तक बांधकर रखूंगा. 

Tuesday, November 23, 2010

कैसी उन्नति ??????????

कुछ दिन पहले मैने पेपर में कुछ लोगों द्वारा आत्महत्या की खबर पढ़ी. ये चीज पढ़कर मन में करूणा पैदा होती है पर मेरे मन में उलझन  पैदा हो गयी क्योंकि उन्होना जिस कर्ज की वजह से आत्महत्या  की थी वो बेहद कम था. वो भी MFI से लिया गया था.
=>बस्काए अलिया पर ४००० रूपये के कर्ज था जो उसने दो MFI कर्ज लिया था
=>अकबर पर मात्र १०००० का कर्ज था
=> के० रमेश पर १०००० का कर्ज था जो उसने भेंस खरीदने के लिए लिया था . उस लेख को पढ़कर  मेरे मन  मैं कई सवाल उठे. उस लेख में MFI`s की बखिया को उधेडा गया था. उनकी कमियों को सामने लाने की कोशिश की गयी थी. मेरे दिमाग में एक काफी बड़ा सवाल ये उठा कि क्या MFI  गलती थी?? उसके सिस्टम मा कोई गड़बड़ थी या उसके सिस्टम को गलत तरीके से चलाया गया था. मरना वालों की  आत्महत्या का कारण था कि वो अपने घर के सामान  की नीलामी नहीं देख सकते थे. मेरा सवाल ये है कि हमारे देश के एकोनोमिस्ट्स कहते फिर रहे है कि हमारे देश कि इकोनोमी दुनिया कि सबसे तेज उभरती हुई इकोनोमी है जो कि अगले कुछ सालों में दुनिया की  सिरमोर इकोनोमी होगी.ये वो ही देश है ना जो ९% व्रद्धी दर का दावा करता है. ये वो ही देश है ना जिसमे कहा जाता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा डॉक्टर, इंजिनियर है. इस हाल में क्या  इंडिया दुनिया का सिरमोर बन सकेगा कि लोग  कुछ हजार के लिये आत्महत्या कर लें???????  

Monday, November 8, 2010

स्टुपिड होना भी बुरा नहीं

बड़ी अजीब सी घटना है जब मैंने अपने  चरित्र के खिलाफ काम किया. क्यों किया-अब तक मेरी समझ में नहीं आया. मैं आज तक हैरान हूँ कि मेरे जैसा कमीना बन्दा ऐसा कैसे कर गया?
उसे मैने दोनों बार सड़क पर देखा था. गजब का पीस है बॉस. ज्यादा लम्बी नहीं थी लेकिन गोरी-चिट्टी, स्लिम-ट्रिम, खूबसूरसत मासूम-सा चेहरा, सुतवां नाक, पतले गुलाबी होंठ,लम्बी गर्दन. सच कहूं तो पहली बार उसे मैंने नोटिस ही नहीं किया.
दरअसल मुझे तब टी.पी. नगर के बिजली घर में काम था.  मैं ओटो से  बागपत अड्डे पर उतरा और तो वो वहीँ पर खाड़ी थी मगर तब मैंने उसे ठीक से नोटिस नहीं किया.मैं कुछ देर के लिए पास ही किसी के पास गया और जब लौटा तो उसके पास से गुजरा तो उसे नोटिस किया. कुछ देर मैं क्रोस्सिंग पर रुका वो भी वहीँ खड़ी थी.अब जब मैं वहां खड़ा था तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं उसे ना तकूँ . मैं भी तक रहा था और भी कई तक रहे थे. कुछ देर बाद एक सजीला युवक बाइक पर आया और वो हसीना बाइक पर सवार होकर चली गयी. चली क्या  गयी कईयों पर बिजलिया गिरा गयी उसका पता मुझेया उसके जारे ही चल गया. सबसे पहले रिक्सा वाले ने कमेन्ट पास किया-"देखा ये है आजकल के बालक. घर से पढने के लिए आते है और लाडलियों को घुमाते हैं"
मुझे हंसी आ गयी-"भाई वो वो उसकी कनपटी पर पिस्तोल रखकर तो नहीं ले जा रहा............वो  जा रही है इसीलिए वो ले जा रहा है.अगर हमारी शक्ल ठीक-ठाक होती तो और हमें कोई भाव देगी तो हम क्या मोका छोड़ देंगे"
उसी समय पीछे से तीन-चार बाइकों पर लडके सवार होकर आये. एक लड़का जो पहले से ही वहां पर उसकी ताक में खड़ा था उसने बड़े ही उत्तेजित भाव से बताया कि वो अमुक के साथ अभी-अभी बाइक पर गयी है. वो सब तुरंत  ही उस लड़के को साथ बाइक पर बैठकर  उसके पीछे चले गए.कुछ देर के बाद मैं भी अपना रास्ते हो लिया.मैं मुश्किल  से आधा किलोमीटर ही गया था मैंने उसे फिर देखा. उस बार मैं उस धांसू पीस को कैसे नोट नहीं करता मैना उसे गोली कि तरह पहचाना. वो बाइक के साथ हिप लगाकर खाड़ी थी.  मैं उसके पास से गुजरा और आगे चला गया. आगे जाकर मेर्स दिमाग में अचानक एक बात आई-`बालक पिट-पिटा ना जाएँ'. मैंने  उन्हें वार्न करने का फैसला कर लिया. मैं मुडना के लिया मुड़ा तो मेरे दिल में संका पैदा हुई-` कहीं सवरी बखेड़ा खड़ा ना कर दे'
मैं अपने रास्ते चल दिया. कुछ कदम चलने के बाद मेरे कदम फिर रुक गये. मैने कुछ देर सोचा. और- जो होगा देख जायेगा- वाला  इरादा बनाकर वापिस मुड़ा और वापिस चलकर उसके पास गया. उसके पास  जाकर उससे पुछा-` जो लड़का तुम्हरे साथ था वो कहाँ  है?'
` क्यों'-उसने पुछा.
` कुछ लड़के तुम्हारे पीछे लगे है'- मैंने बताया.
उसने पीछे स्थित ATM कि तरफ इशारा करके कहा-` उसके पीछे  लगे है?'
तब मैंने देखा. वो लड़का ATM के अंदर था . मैना कहा-` मुझ नहीं पता, पर टार्गेट तुम हो.................अगर कोई पंगा हो तो ध्यान रखना'
कहकर मैं रुका भी नहीं अपना रास्ते चल दिया.पीछे मुडकर उसकी रिअक्सन देखनी तक जरूरी नहीं समझी. 

मैं अब सोचता हूँ कि मैंने वो क्यों कर दिया. क्या इस वजह से कि वो बहुत खूबसूरत थी या मुझ कमीने के अंदर पहले वाला स्टुपिड -सा जोगेंद्र सलामत है ??????????? जिसने कभी भी कभी भी सही करने से पहले ये नहीं सोचा कि लोग क्या कहेंगे?
पता है जब कोई आपको ढक्कन कहे तो बुरा लगता है मगर तब कुछ भी सही कर डालने पर कभी भी पछतावा नहीं होता .................वैसे भी इतनी सेक्सी लड़की का भला करने कि कोशिश के बदले मा क्या पता वो इम्प्रेस हो जाये और मुझ जैसे गधे को भी पंजीरी खाने का मोका मिल जाये.........................हिहिहिही




Wednesday, October 13, 2010

कल का खलनायक आज का नायक -चंगेज खान

इतिहास भी कमाल की चीज है. नायक को खलनायक बना देता है और खलनायक को नायक बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ता है .

अगर हम भारतीय पुराणिक साहित्य पर नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि किस तरह चरित्र की इमेज के साथ खिलवाड़ किया गया. या कहें कि चरित्र को ही इस तरह पेश किया गया कि पाठक को चरित्र के रूबरू होते ही उससे नफरत होने लग जाये. उदाहरण के लिए रावण के चरित्र की बात करते है. वाल्मीकि की रामायण में रावण को एक बेहद खूबसूरत इंसान के रूप में चित्रित किया था. मगर तुलसीदास ने बेहद कुरूप चित्रित किया गया था. रावण का असली नाम कुछ और था.....मगर रामायण में में उसे रावण कहा गया. रावण यानी रुलाने वाला.उसके अलावा सूर्पनखा का मतलब है सूप जैसे नाखून है. कुम्भकर्ण का मतलब होता है कुम्भ के जैसे कान वाला.विभीषण यानि विभीषिका लाने वाला.
महाभारत के चरित्रों की बात करें तो सुयोधन का नाम दुर्योधन कर दिया गया. सुशासन को दुशासन कर दिया गया.सुशीला को दुशीला कर दिया गया.
कौन माँ बाप अपने बच्चों के नाम ऐसे रखेंगे जो सुनकर इंसान को नफरत पैदा होने लगती है. ये सब कथा के नायक के चरित्र को उभरने के लिए किया जाता है. साथ ही शुरू से ही ऐसा माहोल  तैयार किया जाता है कि पाठक के मन में शुरू से ही चरित्र के लिए नफरत होने लगे.और नाम से ही चरित्र  कि बुरी इमेज बन जाये.
ये तो हुई पुराण की बात एतिहासिक काव्य कहे जाने वाले काव्य `प्रथ्वीराज रासो' में तो इतिहास को ही बदल देने  की  कोशिश की गयी. इतिहास सम्मत है कि मोहम्मद गोरी कि हत्या पृथ्वीराज ने नहीं की थी. उसके ही सरदारों ने मुल्क लोटते समय रास्ते में कर दी थी.
इसके अलावा एक और महान विजेता है जिसे इतिहास में बदनाम किया गया. वो है चंगेज खान
इतिहास में जिसे सबसे दुर्दांत हत्यारा और बलात्कारी कहा गया.रक्त पिपासु कहा गया. ना केवल उसे बदनाम किया गया उसके महान कामों पर मिटा भी दिया गया, बल्कि उसकी निशानियों तक को मिटा दिया गया. द्यत्व्य है कि मंगोलिया को बसाने वाले की मात्र एक ही मूर्ती पूरे मंगोलिया में में लगी है जो दादन नामक कसमे में है वो भी कुछ ही साल पहले लगाई गई थी. उसे दादन बयोरा नामक एक फ्रेंच ने बनाया था. और मंगोलिया वालों ने उसे मालामाल कर दिया था.
ऐसा नहीं है कि मंगोल्स अपने राष्ट्र  निर्माता की इज्जत नहीं करते. बुर्खान की खल्दून पहाड़ियों पर निकलने झरने का पानी को मंगोल्स बोतलों में भरकर अपने पूजाघरों में रखते है. मान्यता  है कि चंगेज खान के जन्म के तीसरे दिन उसे उसी झरने में नहलाया गया था. उस इलाके में महिलाओं का जाना वर्जित है क्योकि माना जाता है कि एक बार चंगेज खान वहां प्रार्थना करने गया था उस समय उसके साथ कोई महिला नहीं थी.
अब सवाल ये है कि क्या चंगेज खान वास्तव में रक्त पिपासु था? बलात्कारी था??बेरहम हत्यारा था??????
सवाल है कोन  सा शासक रक्त पिपासु नहीं था. किसने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए रक्त नहीं बहाया. हर दौर के राजाओं ने किया.अमेरिका कि सी.आई.ए. के कारनामों से,रूस की खुफिया एजेंसी के चीफ लाव्रेंती बेरिया के दुर्दांत कारनामों को कौन इतिहास का जानकर नहीं जानता. अभी अमेरिका ने हथियारों के नाम पर जो तबाही ईराक में मचाई उससे कौन अंजान है. सब जानते है कि वो उसने तेल के लिए किया है.किसी और तरह तो वो सद्दाम को सत्ता से बाहर तो नहीं कर सकता था. दुनिया में साम्यवाद का ढिंढोरा पीटने वाले रूस ने मंगोलिया में किस तरह तबाही मचाई. उसकी जमीन पर से उसके इतिहास कि निशानियों को मिटाकर हर जगह उसने अपनी छाप छोड़ी.उस चंगेज खान को जैसे मिटाकर रख दिया मंगोलिया से रूस और चीन ने.
चलिए अब बताता हूँ कि चंगेज खान था कौन? वो किस जगह से ऊंचा उठकर शशक बना?
चंगेज खान का असली नाम तेमुंची था. मंगोल के घास के मैंदानों में बर्बर कबीले रहा करते थे. जिनका कोई धर्म नहीं था.  वो शिकार करके और जानवर पालकर जीवन चलाते थे. कोई भी किसी  पत्नी को हासिल करके अपनी पत्नी बना सकता था, मगर उससे पहले उसके पति का कत्ल करना होता था. चंगेज खान के पिता येसुगाई ने भी उसकी माँ ओएलून को उसके पति येकेचिरादु से छीना था जो कि मकीत कबीले का था. वो उसका कत्ल नहीं कर पाया था.तेमुंची के दो भाई -खसर और तेमुगा उर्फ़ ओतचिगीन, एक बहन -तेमुलून थी. नौ साल कि उम्र में तेंमुची कि शादी उन्गीरा कबीले की बोर्ताई के साथ कर दी गयी.ये बात मकीतों को सहन नहीं हुई कि कोई दादा कबीले वाला उनके सगोत्री लड़की से शादी कर ले.
एक दिन जब येसुगाई तेमुंची को उसके ससुर के घर छोडकर वापिस लौट  रहा था तो तातारियो कबीले वालों ने धोखे से उसे जहर देकर मार डाला था. ओएलून ने दूसरी शादी नहीं की और अपने बच्चों को पालने में लग गयी. फिर भी दुश्मनों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. उन लोगों ने उसके तम्बू को जला दिया. उसे भी मारने कि कोशिश की लेकिन वो उनके हाथ नहीं आया. वो पूरे दिन ओनान नदी में नलकी के सहारे साँस लेकर छिपा रहा. उसके बचपन के प्यार और पत्नी को मकीत कबीले के लोग अपने साथ ले गए और मकीत कबीले के सिल्चर से उसके शादी कर दी. तेमुंची बदले की आग और पत्नी के वियोग में में तडपता रहा उसने सेना को संगठित किया और मकीतों आक्रमण किया. उसने भयानक तरीके से मकीतों को कुचल दिया और सिल्चर  को भी ख़त्म कर दिया. मगर उसे ये देखकर घोर निराशा हुई कि तब तक बोर्ताई एक बेटे कि माँ बन चुकी थी. तेमुंची के कबीले  वालों ने उसे उस बच्चे का क़त्ल करने के लिए कहा क्योंकि वो दुश्मन का खून था. मगर उसने सिर्फ इसलिए उसे अपना  लिया कि बोर्ताई उसे बहद प्यार करती थी. उसने उस बच्चे को अपनाया बल्कि बेटे का पूरा हक भी दिया. मन जाता है कि वो सपने बच्चों में सबसे ज्यादा जूजी को ही करता था. ( अगर वो बेरहम था तो उसने अपने दुश्मन के खून को गले  से क्यों लगा लिया?)
उस घटना से बोर्ताई पर बड़ा बुरा असर पड़ा कि वो आत्महत्या करने के लिए चल दी थी तेमुंची उसे वापिस लेने गया तो उसने सवाल किया -` पहले मुझे सिल्चर तुमसे छेन्क्र ले गया और बड़ी ही मुश्किल से मैंने अपने आप को संभाला और अपना पूरा दयां अपनी कोख से पैदा हुए जूजी को पालने में लगाने लगी. अब तुम आये और मुझे सिल्चर से ले आये.......कल को कोई और आएगा और फिर मुझे तुमसे छीनकर ले जायेगा. तब मेरे बच्चों का क्या होगा?'
उस समय तेमुंची ने वादा किया कि वो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होने देगा. और उसने जो वादा किया ही था उसे निभाया भी. उसने अपने आपको ताकतवर बनाना शुरू कर दिया.उसने एक एक करके तमाम कबीलों को जीतना शुरू केर दिया. १२०१ ई० में  ग्यारह कबीलों का खान चुन लिया गया. १२०६ ई० में बाकी तमाम कबीलों ने भीउसकी अधीनता स्वीकार कर ली और उसे चंगेज खान यानि धरती के खान की उपाधि दे दी.
उसके बाद उसने अपने कदम आगे बढ़ने शुरू किये तो ही तो वो यात्रा उसकी सासों  के साथ ही रुकी. उसने १२२०  ई० में उसने समरकंद को जीता. उसके बाद उसने सब्ज्वार नोशापुर इत्यादि को जीतकर अपने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया. मत्र २५ सस्लोंमें उसने उससे भी बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया जितन बड़ा साम्राज्य बनाने के लिए रोम को ४०० साल लगे थे. उसका साम्राज्य की सीमा कोरिया वियतनाम से लेकर पोलैंड , हंगरी और कैस्पियन सागर से लेकर प्रशांत सागर तक थी.बात केवल साम्राज्य के विस्तार की ना करें बात शासन को चलने की भी बात करें तो अब एतिहासिक तथ्य ये बात सिद्ध कर चुके है कि वो एक बेहतर शासक भी था. कई काम उसने अपने हस्सन काल में किये जो दुनिया में बहुत बाद में शासकों ने किये. चलिए उनकी लिस्ट देता हूँ.
# चंगेज खान ने अपने राज्य में मुक्त व्यापार लागु किया.
# उसने डाक व्यवस्था शुरू की. उसके समय में व्यापारियों के अलावा भी लोग शुल्क देकर अपने सन्देश  भेज सकते थे.
# उसने लिखित कानून बनाया.कानून से बढ़कर कोई नहीं था. खुद राजा को भी कानून से बढ़कर नहीं था.कानूनी फैसलों के दस्तावेजों को वो संग्रहित करवाता था.
# उसने अपने राज्य में स्त्रियों के अपहरण पर पाबन्दी लगाकर स्त्रियों को सामान समान अधिकार दिए.
# राज्य में धर्म प्रचार की छूट थी.
# वो पडोसी राज्यों में दूतों  की नियुक्ति करता था.
# उसने चीन के अलावा हरेक विजित राज्य में शासन सञ्चालन का जिम्मा स्थानीय लोगों को दिया.
ऐसी शासन व्यवस्था को चलाने वाला बन्दा क्या बुरा शासक होगा.कट्टर होगा या जानता का बुरा चाहने वाला होगा?ऐसी शासन व्यवस्था तैयार करने वाला बन्दा क्या कम प्रतिभाशाली होगा.?
हकीकतन वो प्रतिभाशाली था भी मगर बाद में वो चीन का गुलाम हो गया और चीन ने उसके साथ बेहद क्रूर व्यवहार किया. उसने उस महानायक जिसके सामने उसने घुटने टेक दिए थे. वो चीन के इतिहास का सबसे काला अध्याय था. उसने उस महनायक को बदनाम बदनाम करने के लिए अपने हिसाब से इतिहास लिखा. उस महानायक कि तमाम निशानियों को मिटा दिया. बाद में उसे रूस कि सह्गयता से आजादी भी मिली तो उसने भी वहां अपनी ही छाप छोडनी शुरू की. अब उसे जब मंगोलिया का रुझान चीन कि तरफ जाता नजर आने लगा तो उसने उस देश के महानायक कि सुध लेनी शुरू कर दी. अब उसके इतिहास को दोबारा लिखा जाने लगा है और उसके महान कामों को सामने लाया जा रहा है.

Sunday, September 26, 2010

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फिल्म ` मुगल- ऐ-आजम'  के सीन को -जिसमे दिलीप कुमार मधुबाला के फेस पर नाजुक पंख फिरता है. उस सीन में दोनों को बेहद रोमांटिक expression निकालने थे के.आसिफ को पता था कि मधुबाला ऐसे सेन करने अपने पापा-अताउल्ला खान- के सामने सामने सहज नहीं हो पातीं थी. इसीलिए के. आसिफ ने एक आदमी को उसके पास भेजा. उसने अताउल्ला खान को दारु और जूए में उलझाए रखा, वो जानबूझकर हारता रहा. उसमे करीब २५ हजार रूपये खर्च हुए.
* एक पत्रिका को दिया साक्षात्कार में हंक रणदीप हुड्डा ने स्वीकार किया है कि वो आस्ट्रेलिया में एक लडकी के प्यार में पड़ा था, और गिगालो तक बनने के लिए तैयार हो गया था. उसका बयान-"आस्ट्रेलिया में ३-४ साल तक नायोबी नाम की लड़की से मेरा रिश्ता रहा ............मैंने तमाम तरह के ओड जोब्स  किये डोर-टू-डोर सेल्स, बार टेंडर, टेक्सी चलाने का काम .......मैंने गिगोलो तक बनने कि कोशिश की जिसके तहत एजेंट ने मुझे एक जोड़े के पास जाने को कहा और मैं तुरंत चिल्ला पडा कि ये क्या बकवास कर रहे हो? फिर मैं उसे थैंक्यू वैरी मच कहकर वहां से चलता बना"
*१८९८ ई० में १२०० रूपये के बदले अंग्रेजों को  सुतुनुती, कलिकता,और गोविंदपुर नामक तीन गांवों की जमींदारी मिल  गई  थी.

Saturday, September 25, 2010

डिग्री जरूरी या ज्ञान

सफलता को हासिल करने के लिए क्या चीज जरूरी है??????????
जब मैं छोटा था तो माँ पापा हमेश पढाई पर जोर  दिया करते थे. कहते थे कुछ बनना है तो खूब पढो. आगे बढ़ना है तो खूब पढो. मैं भी कोशिश करता था. ये  जुदा बात है कि मैंने पढाई में कोई तुर्रा नहीं जड़ा. ले दे कर स्नातकोत्तर भी हो गया. एक बार और कर लूँगा मजे मजे में, मगर  पक्की बात है कि  मेरी रोजी- रोटी में मेरी डिग्री का सहयोग ना के बराबर है. मुझे नहीं लगता कि आगे भी होने  वाला है. यार अगर सफल लोगों की जिन्दगी का पोस्टमार्टम किया जाये तो पता चलेगा कि वो जिस क्षेत्र में कामयाब हुए उसकी डिग्री उनके पास नहीं थी\है. कुछ के पास तो कोई डिग्री ही नहीं है. चलिए जितनो को मैं जानता हूँ उनकी लिस्ट आपके सामने प्रस्तुत कर देता हूँ.
*पहले अमिताभ बच्चन की बात करते है. भारतीय फिल्म उद्योग के इस  मेगा स्टार पास अभिनय कि कोई डिग्री नहीं है वो graduate जरूर है सुना है वो कोलकाता में जॉब करने के साथ स्टेज से जुड़े थे और बहुत बुरे एक्टर मने जाते थे( शायद उनकी तकनीक के हिसाब से )
* बिल गेट्स =>दुनिया का सबसे अमीर आदमी साक्षात्कार में स्वीकार कर चुका है कि उसे कॉलेज जाने का मौका नहीं मिला
* मुकेश अम्बानी => भारत के इस  सबसे अमीर आदमी  के पास bussiness  कि कोई डिग्री नहीं है. उसके पास कैमिकल इंजीनिअर कि डिग्री है. वो mba करने के लिए लन्दन गया जरूर था मगर एक साल बाद ही अपमे पिता कि मदद करने के लिए लौट  आया था.
* अनिल अग्रवाल =>इस भारतीय उद्योगपति के पास सिर्फ दसवी पास का सर्टिफिकेट ही है.
*अजीम प्रेमजी=> भारत के पूर्व सबसे अमीर आदमी के पास भी कोई bussiness की कोई डिग्री  नहीं है. वो bba करने के लिए लन्दन गए जरूर गए थे लेकिन पिता कि मौत कि वजह से बीच में ही लौट आए थे
 * सुरेन्द्र मोहन पाठक =>हिंदी के व्यावसायिक रूप से बेहद सफल लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक  B.Sc. पास है.
* राज कपूर => शो मैन के नाम जाने जाने वाले इस  फिल्म मेकर दसवीं फेल बत्ताए जाते है. उन्होंने फिल्म मेकिंग की पढ़ाई किसी भी संस्थान से नहीं की थी.
*कार्लोस स्लिम=> दूरसंचार किंग के पास गणित की डिग्री बताई जाती है.
* सम्राट अकबर=> इस महान शासक के बारे में सब जानते है कि वो अनपढ़ था.उसका खुफिया तंत्र बहरत के इतिहास में सबसे बेहतर माना गया. उसने कितने मजबूत शासक वंश कि स्थापना कि सब जानते ही है.
और कितने उदाहरण दूं यार मेरे जैसे ठप्प बन्दे को इतना पता है...........तो जब आप किताबें खंगालेंगे तो आपको बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे.
असली बात ये है हनी कि अगर वो लोग बिना डिग्री के अपने काम में इतने सफल क्यों हुए ?????????????
अगर इस मुद्दे पर लिखा जाये तो पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है लेकिन मैं ज्यादा स्पेस ना लेकर टू द पॉइंट बात करूंगा.
असल बात ये नहीं है कि जो लोग बिना डिग्री के ही सफल हुए इसका मतलब ये नहीं उन्हें ज्ञान नहीं था. उन्हें अपने कर्मक्षेत्र में गजब  का ज्ञान था.
अकबर भले ही अनपढ़ था मगर वो अपने पढ़े लिखे कारिंदों के ग्रंथो क पढवाकर  सुनता था ज्ञान कि उसमे बहुत बूख थी. कई ग्रन्थ तो उसके जुबानी ही याद थे.
अजीम प्रेमजी भी मार्केट में आई बिसनेस मेनेजमेंट की हर किताबको पढ़ते है.
ज्यादा बाल की खाल ना निकलते हुए मैं बस यही कहूँगा कि सफल होने के लिए उन लोगों ने जी तोड़ मेहनत की. जांमारी वाले कम किये. रिस्क लिए और नया करने कि कोशिश की.पुरानी मान्यताओं को टाक में रखकर नया काम किया. पता है जब हम कोई कोर्स  करते हैं तो हमे एक निश्चित पैटर्न पढ़ाया जाता है.वो पैटर्न भी कई साल पहले तैयार किया गया होता है और उसे बाद मैं कई सालों के बाद अपडेट किया जाता है. तब तक उस सब्जेक्ट मैं बहुत से बदलाव आ चुके होते है. दूसरी बात ये है कि कॉलेज के पढाई और प्रक्टिकल में जमीन आसमान का फर्क होता है. साथ ही संस्थान में पढ़ लेने के  बाद बन्दा अपने आप को पूर्ण समझने लगता है, इसी वजह से वो नयो चीजो को सीखना या तो बंद कर देता है या बहुत कम कर देता है. वो भूल जाता है कि आजकल लाइफ बहुत तेज है हर पल कोई ना कोई नयी खोज होती ही रहती है. बाजार में टिकने के लिए अपडेट करते रहना पड़ता है.........और मार्केट में आगे बढ़ते रहने के लिए खुद कोई ना कोई नया काम करते रहना होता है. कामयाब लोग वो ही करते है.
मेरा मानना है कि कामयाब होने के लिए डिग्री नहीं ज्ञान कि जरूरत होती है. साथ ही काम पर फोकस करना होता है. नया करते रहना होता है .........अगर नाकाम हो जाये तो भी प्रयत्न करते रहना होता है. लगतार मेहनत करते रहना होता है.जिस दिन थके समझ लो अप मार्केट से बाहर हो जाओगे.

Tuesday, September 21, 2010

चीन के फंदे

किसी ने एकदम सही कहा है कि चीन वो  दोगला देश है जो एक ओर दोस्ती कि बात करता है और दूसरी ओर षड़यंत्र रचता है. #१९४९ में चीनी समाजवादी गणतंत्र की स्थापना हुई तब भारत वो पहला देश था जिसने उसे मान्यता दी. नेहरु जी उनसे सीने पर मोहब्बत की निशानी लाल गुलाब का फूल लगाकर गले मिले और उन्होंने उनकी पीठ में छुरा भोंका.
#२२  मई १९५४ को भारत-चीन के बीच एक अथ वर्षीय व्यापार समझौता  संपन्न हुआ, जिसके अंतर्गत भारत ने तिब्बत से अपने अतिरिक्त देशीय अधिकारों को चीन के हवाले कर दिया. इस प्रकार भारत पर चीन की संप्रभुता स्वीकार कर ली और
तिब्बत के यांतूग व ग्वान्ग्त्सी क्षेत्र से अपनी सेनाए तैनात करने का अधिकार छोड़ दिया तथा सीमा पर व्यापर एवं तीर्थ यात्राओं के विषय में नियम निर्धारित करना स्वीकार कर लिया
जून १९५४  को चीनी प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई भारत आया और पंचशील समझोता सम्पन्न हुआ.
साथ ही जुलाई १९५४ को चीन ने भारत पर आरोप लगाया कि भारतीय सैनिको ने चीन के तथाकथित प्रदेश स्थित बूजे(बाराहुली) पर अवैध कब्ज़ा कर लिया है.
# अप्रैल १९५५ में एशियाई- अफ़्रीकी देशों के बांडुंग सम्मेलन में नेहरु व चाऊ-एन-लाई ने निकटतम सहयोग का प्रदर्शन किया.बाद में फार्मोसा( ताइवान)तथा क्वेंमोए और मासु द्वीपों पर चीन केदावे का भारत ने पूर्ण समर्थन किया बदले में चीन ने गोवा के प्रश्न पर भारत का साथ दिया था.
# १९५६ में तिब्बत के खाया क्षेत्र में चीनी दमन से आक्रोशित होकर विद्रोह फूट पड़ा जो १९५९ तक चलता रहा. इस विद्रोह को दलाई लामा का समर्थन प्राप्त था. चीनी सरकार द्वारा कठोरतापूर्वक विद्रोह के दमन के पश्चात दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी. इस राजनीतिक शरण को चीन ने भारत की ओर से शत्रुतापूर्ण कार्रवाही बताया.
# १९५८ में चीन के एक प्रकाशन चाइना पिक्टोरिअल ने चीन के मानचित्रों में भारत के कुछ प्रदेशों को चीन  भू-भाग के रूप में जाहिर किया था. भारत ने आपत्ति जाहिर की तो चीन की साम्यवादी सरकार ने उन्हें कोमितंग सरकार के पुराने नक़्शे बताकर उनमे सुधार करने का आश्वासन दिया.
#२३ जनवरी १९५९ में चीनी सरकार ने अपने पत्र में भारत को लिखा कि दोनों के बीच कभी भी सीमा का निर्धारण नहीं हुआ है और तथाकथित सीमाएं चीन के खिलाफ किये गए साम्राज्यवादी षड्यंत्र का परिणाम है. इस प्रकार चीन ने मैकमोहन रेखा को अवैध बताते हुए इसे तिब्बत क्षेत्र के विरुद्ध आक्रमण कि ब्रिटिश नीति की उपज करार दिया.
    ८ सितम्बर १९५९ को औपचारिक रूप से भारत के लगभग ५०००० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर चीन के प्रधानमंत्री ने दावा प्रस्तुत किया.
    अक्तूबर १९५९ चीनी सेनाओं ने भारत के नौजवानों की कोंग्ला दर्रे के निकट, सीमा के इस और आकर, हत्या कर दी.
# १९६२ में चीन ने पाकिस्तान के साथ मित्रतापूर्ण समझौता किया और सितम्बर १९६२ में चीन ने भारत पर पूर्ण आक्रमण करने की घोषणा कर दी.
# वर्ष  १९९० में चीन की ओर से यह बात सामने आई कि यदि लद्दाख में चीन के कब्जे वाले भू-भाग पर यदि भारत चीन का अधिकार स्वीकार कर ले चीन पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेख को स्वीकार करने को तैयार है. 
# आज भी हिमालयी क्षेत्र में चीनी सेना पीपुल लीब्रेसन आर्मी द्वारा आक्रामक गश्त लगती है.सीमा रेखा का उलंघन किया किया जाता है.चीन अरुणाचल प्रदेश के तवांग को अपना क्षेत्र बताता है.सरकारी मीडिया में अब भी चीन कि ओर से भारत पर हमला जारी रखे है
चलिए आपको चीन के बारे में कुछ यात्थ्यों की जानकारी दे दूं .
चीन दुनिया की सबसे पुरानी चार सभ्यताओं में से एक है.देखा जाये तो इसकी महानता पर शक नहीं किया जा सकता भले ही उसे कभी नशेड़ियों और आलसियों का देश कहा जाता हो( यूरोपिअंस के द्वारा). मगर जानने वाले जानते हैं और मानते भी है चीन की सभ्यता एक महान सभ्यता रही है. दुनिया के चार महान अविष्कार चीन के हिस्से में आते है- कागज,कम्पस, बारूद,और मुद्रण.
माना  जाता है ...........चीन शब्द का सर्व प्रथम उपयोग १५५५ ई० में किया गया ये शब्द चिन से निकला जो मार्को पोलो द्वारा पश्चिम में प्रचारित किया गया. यह शब्द पारसी और संस्कृत के cina (चीन) और अंततः किन साम्राज्य से निकला(७७८ई० पू०-२०७ई०पू०), जो झोऊ वंशावली के समय चीन का सबसे बड़ा साम्राज्य था.
एतिहासिक रूप से चीन को सिना या सिनो सिने, कैथे, या  पश्चिमी देशों द्वारा सेरेन के नाम से जाना जाता है.चीन का अधिकारिक नाम प्रत्येक वंश के साथ बदलता रहा है और सबसे ज्यादा प्रचलित नाम झोंग्गुओं, जिसका अर्थ है-केन्द्रीय राष्ट्र अथवा मध्य राष्ट्र.
अब बात आज की करते हैं, आज..........
चीन का पूरा नाम है-peoples republic of china 
चीन की राजधानी है-बीजिंग
राजकीय भाषा- चीनी
देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन ही है. हमने इसे हमेशा अपना भाई समझा मगर इसने हमे अपना कट्टर दुश्मन मन है और समय- समय पर इसका सुबूत भी  दिया है. इसका सबसे बड़ा सुबूत तो ये है कि ये भारत को चारों तरफ से   घेरने में लगा हुआ है. भारत के दुश्मनों से गठबंधन करता जा रहा है या हमारे पड़ोस में उन सरकारों को समर्थन दे रहा है जो भारत विरोधी है ( साथ ही उन्हें भारत विरोधी गतिविधियाँ करने मे मदद कर रहा है)
अगर हम study करें तो हमे हमेशा चीन की हर हरकत में भारत विरोधी atitude ही नजर  आयेगा.ऐसा नहीं है की इसने दोस्ती की बात नहीं  की..............दोस्ती की बात तो की लेकिन उसकी हर बात में एक चल होती है. जब भी इसने कुछ देने की बात की है तो उससे ज्यादा लेने की कोशिश की है.
चलिए अब चीन के उन फंदों पर नजर डाल लेते है जो चीन ने हमारे चारों तरफ लगाये है.
*विकास के नाम तिब्बत में रेलवे लाइन, हवाई अड्डे, हवाई पट्टी और सडकों का जाल फैलाकर वः इस स्थिति  में आ गया है कि चीन भारत पर सम्भाव्य हमला करने के लिए किसी भी समय सेना और रसद के साथ हमारी सीमा के निकट पहुंच सके.
* वो वास्तविक नियंत्रण रेखा और भारतीय सीमा तक चार हाइवे बना चुका है. ये चारों => पूर्वी हाइवे, पश्चिमी हाइवे, केन्द्रीय हाइवे,और यूनान तिब्बत हाइवे के नाम से जाने जाते है.
* भारत नेपाल सीमा में पथ लाहीन से बांग्लादेश सीमा के काकर मिट्ठा  क्षेत्र यक फौर लेन ट्रेफिक पथ का निर्माण चीन द्वारा किया जा चुका है.
*तिब्बत क्षेत्र में अपने हवाई अड्डो एवं हवाई पट्टी के लम्बाई ३००० फीट से बढाकर ९००० फीट कर दी है. सशस्त्र सेनिकों और मिसाइलों कि तैनाती वो पहले ही कर चुका है. १००० किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों से वो भारत के किसी भी शहर को आसानी से निशाना बना सकता है.
* गंगा को छोडकर एशिया की अन्य बड़ी नदियों उदगम तिब्बत में है. खेती और बड़े उद्योगों के लिए चीन और बहरत दोनों को पानी की जरूरत बढती जा रही है. तिब्बत से निकलने वाली अधिकाश नदियों पर चीन बांध बनाने में जुटा है. केवल सिन्धु ( पाकिस्तान से होकर भारत पहुंची है) और सालवीन (म्यांमार और थाईलैंड से होकर गुजरती है) पर उसने कोई योजना शुरू नहीं की है. वो ब्रह्मपुत्र नदी का रुख अपनी ओर मोड़ना चाहता है. तिब्बत में यारलंग तसाग्यो और चीन में येलूजेम्वू के नाम से प्रसिद्ध यह नदी पूर्वोत्तर भारत के राज्यों और बंगलादेश को को जीवन प्रदान करती है. इस परियोंजा के शुरू होते ही पूर्वी राज्यों और बंगलादेश का पर्यावरण संतुलन बिगड़ जायेगा. नदी का रुख मोड़ने के लिए वी परमाणु विस्फोट का भी सहारा लेने के लिए तैयार है.
अब बात करते हैं उन फंदों की जो चीन हमारे पड़ोसियों  के साथ मिलकर हमारे काह्रों तरफ लगा  रहा है .
नेपाल=> नेपाल में माओवादियों की पीठ पर चीन का हाथ है ये बात तो सब जानते है. और सब ये भी जानते है कि वो उन्हें सपोर्ट इसी वजह स है कि माओवादी भारत के खिलाफ है. आर्थिक विकास के नाम चीन नेपाल को माओवादियों का अड्डा बना चुका  है. नेपाली माओवादी भारतीय नक्सलवादियों के साथ मिलकर दक्षिण भारत तक रेड कोरिडोर का निर्माण करना चाहते है. पिछले तीन सालों में २० हजार चीनी नागरिक नेपाल में घुसपैठ कर चुके है और भारतीय सीमा के निकट उनके कई ठिकाने बन चुके है. उन्हें चीनी खुफिया एजेंसी ग्यान्वु ने प्रशिक्षित किया है.
पाकिस्तान =>१९६२ के बाद से  चीन द्वारा भारत को घेरने के लिए बनी नीतियों में  अलग  भूमिका निभाई है. चीन पाकिस्तान की उस हर नीति का समर्थन करने लगा जो कि भारत विरोधी हो या  भारत को क्षति पहुँचाने वाली हो चीन-पाकिस्तान गठबंधन के मुख्य कारण थे------१. भारत कि शक्ति को कम करना. २.विश्व परिद्रश्य में भारत की छवि को धूमिल करना ३. हथियारों के लिए नया बाज़ार हासिल  करना ४.अमरीका के प्रभाव को कम करना
पाकिस्तान स्थित आतंकवादी चीन के हथियारों पर यकीन करते है.
मुंबई हमले के मुद्दे पर वही संयुक्त राष्ट्र संघ में दो बार अपने वीटो का इस्तेमाल करके भारत के उस प्रस्ताव को रोक चुका है जिसका उद्देश्य पाकिस्तान के जमात-उल-दावा को आतंकवादी संगठन घोषित करना था.
हिंद महासागर तक पहुँच बनाने के लिए चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को आधुनिक तकनीक द्वारा सी पोर्ट के रूप मे विकसित कर चुक है
बांग्लादेश=>इस देश को भी चीन आर्थिक सहायता देकर अपने नियंत्रण में लेना चाहता है अवैध बांग्लादेशियों का असम में प्रवेश और जेहादी आतंकवाद  जैसे मुद्दों पर भारत एवं बांग्लादेश के बीच के विवाद को चीन ने सामरिक फायदे के लिए भुनाया है बंगलदेश को सबसे ज्यादा हथियार चीन ही देता है. बांग्लादेश का काक्स बाज़ार और चटगाँव को चीन बंदरगाह के रूप में विकसित करने में लगा है. यहाँ से चीन बांग्लादेश के प्राक्रतिक भंडारों पर शिकंजा मजबूत करने के साथ ही हिंद महासागर तक आसानी से आ सकेगा.
श्री लंका > चीन ने श्री लंका के हब्बान टोटो को सी हार्बर के रूप में विकसित करने के लिए २००७ में समझौता किया है .
मालदीव =>मालदीव में पाकिस्तान ने इस्लामिक कार्ड खेलकर मालदीव के मराओ द्वीप पर चीन को सैनिक अड्डा बनाए जाने की वश्यकता  को को पूरा किया.
म्यांमार=>चीन ने कोको द्वीप व अन्य द्वीपों को म्यांमार से पट्टे पर लेकर वहाँ शक्तिशाली संचार और खुफिया तंत्र विकसित कर रखा है. बंगाल की खाड़ी में स्थित यह कोको द्वीप भारत के केंद्र शासित प्रदेश अंडमान निकोबार द्वीप समूहों से मात्र १८ किलोमीटर की दूरी पर है. म्यांमार का पैगोडा पॉइंट चीन का महत्वपूर्ण सप्लाई केंद्र बन चुका है. म्यांमार का ३\४ मिलिट्री हार्डवेयर  चीन से ही प्राप्त  करता है. अपने संबंधों के कारण ही चीन को हिंद म्यांमार के जरिये महासागर तक पहुँचने का मार्ग मिला है. चीन की इस घुसपैठ के कारण बंगाल की खाड़ी में स्थित ५७२ द्वीपों वाले अंडमान निकोबार द्वीप समूह का अस्तित्व खतरे में है.
     आर्थिक क्षेत्र में भी चीन भारत को घेरने में लगा हुआ है. भारतीय उत्पादों के मुकाबले के मुकाबले ७०% तक सस्ते चीनी उत्पादों की भारत में डम्पिंग हो रही है जिससे छोटे एवं माध्यम दर्जे के उत्पादकों को भरी नुक्सान हो रहा है. चीनी खिलौना उद्योग के हमले से भारत के सैंकड़ों खिलौना कम्पनियाँ बंद पड़ी है. भारत में चरम ऊंचाई तक पहुंचे औषधि उद्योग व्यापर को नुक्सान पहुँचने के लिए नकली दवाइया बनाकर और उनपर मेड इन चाइना का लेबल लगाकर उन्हें दुसरे देशों में बेच रहा है.
आज्नकी तारीख में हर भारतीय पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है मगर हकीकत  ये है की हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन है. सबसे बड़ा दुश्मन वो होता है जो स्सबसे ज्यादा नुकसान देने वाला होता है. ये सही है कि सीधे तौर पर हमे सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान दे रहा है मगर उसे सपोर्ट अमेरिका और चीन कर रहे है. अमेरिका आज कि तारीख में उधर के घी पीकर जिन्दा है....ध्यातव्य है उसपर सबसे ज्यादा कर्ज चीन का ही है. पाकिस्तान भले ही कुछ भी कर रहा हो मगर वो ख़त्म होने के लगर पर है. वो भले ही कुछ भी कहे मगर उसके  लोकतंत्र का अपहरण किया जा चुका है जो कि अब ख़त्म होने के कगार पर है. अब तक ख़त्म हो भी चुका होता अगर अमेरिका उसे टुकड़े ना डाल रहा होता. पाकिस्तान हमपर एक तरफ से हमला कर रहा है वो भी दूसरों के टुकड़ों पर पलकर. उसकी अपनी ही धरती पर इतने भस्मासुर पल रखे है कि वो ही उसे समाप्त करने पर तुले है. चीन ने हमे चारों तरफ से घेर रखा है अगर वो हमला  करता है तो उसकी में पॉवर और हथियार ही खर्च होंगे मगर इन्फ्रा उस देश का बर्बाद होगा जहा से वो हमला करेगा या भारत का होगा. जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था कई साल पीछे  चली जाएगी. और चीन यही चाहता है. इसीलिए उसने भारत के चारों और इतने फंदे लगा रखे है.