Friday, April 27, 2012

love diary 9

अध्याय-१८
अगले दिन सुबह.
बरसात के मौसम में एक बार अगर झड़ लग जाये तो कई दिनोंतक बूंदा-बांदी होना कोई हैरानी वाली बात नहीं होती. सुबह के वक्त तो नहीं हो रही थी, हाँ बूंदा-बांदी जरूर हो रही थी.
नाश्ते के बाद ऑफिस जाने से पहले कमरे में से आवाज दी. मैं किचन से दौड़ती हुई बैडरूम में गयी. वो बैड पर पैर लटकाकर बैठे हुए थे
'कुछ कहना थ?"-मैंने पूछा.
"हाँ, कई दिनों से आपसे बात करना चाहता था."-वो बोले-"एक भी बार आपने फर्म के बारे में नहीं पूछा. हिसाब-किताब की बात नहीं की."
"मैं क्या पूछूं?"-मैं बोली-"मैं तो बिजनेस के बारे में कुछ नहीं जानती."
"पर   आपको जानना चाहिए."उन्हीने बिस्तर से उठते हुए कहा-"आपका बिजनेस है. ये कैसे रन कर  रहा है -इसपर आपको नजर रखनी चाहिए.मुझे लगता है आपको फर्म ज्वाइन कर लेनी चाहिए"
"नहीं ."-मैंने कहा-""मैं इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. रही बात फर्म के  हिसाब-किताब की तो  उसे चाचू देख लेंगे."
" ना."-तत्काल ही उनका स्वर सख्त हो गया-"मैं इसके लिए बाध्य नहीं हूँ."
"मतलब?"-सख्त मेरा स्वर भी हो गया.
"विल के हिसाब से मैं बिजनेस का केयर टेकर हूँ."-वो बोले -"साथ ही ये भी ही हिदायत है की इसमें मैं किसी और को इन्वाल्व न करूँ."
"बट, वो मेरे चाचा हैं, कोई गैर  नहीं."
"सॉरी."-वो अपने इरादे पर अडिग थे -"मैं ये नहीं करूंगा.सर ने मेरे हवाले किया है. मैं किसी और को इसमें इन्वोल्व  नहीं करूंगा."
मैं भन्ना गयी.
पर सच ये था की मैं कोई पंगा नहीं करना चाहती थी. न ही मैं कुछ करने में एबल थी, सो मैंने  झर का घूँट सा पीकर कहा-"हम इस बार में शाम को बात करेंगे."
***
मैंने सुरेन्द्र चाचा के पास फोन किया तो उन्होंने असमर्थता शो कर दी.
"बेटे, भाई साहब  ही विल बनाकर गये है."-वो घायल से भाव से  बोले-"इस बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता.अगर उन्हें हमपर यकीन होता  तो वो ऐसा क्यों करते?"
***
मेरी समझ में कुछ नहीं  आया
मैंने छोटे चाचा से बात की. उनका भी व्ही जवाब मिला. उनकी टोन  भी बड़े चाचा जी के जैसी थी. मैंने नाना  जी से बात की नाना जी ने कहा-"तू खुद ही उसका ध्यान  रख ले ना. एक ऑडीटर हायर कर ले. वो सारे अकाउंट ऑडीट कर देगा. ?
"मैं किसी ऑडीटर को नहीं जानती."
"वो मैं देखा लूँगा."-नाना जी ने कहा-"हर तिमाही पर फर्म का अकाउंट ऑडीट करवा लिया करना. उसे पॉवर ऑफ़ अटोर्नी है तो क्या मालकिन तो तू ही है न. अगर कुछ गलत दिखे  तू अपने हक यूज करना."
"ठीक है."
मैं जरा सी रिलैक्स  हो गयी.
बाते करने के बात मैंने मोबाइल को डिस्कनेक्ट करके बिस्तर पर फेंक दिया और रिलेक्स होकर कमरे में टहलने लगी. मैं बालकनी में चली गयी और शबनम आंटी को आवाज  देकर चाय के लिए साथ  बनाने के लिए बोल दिया. सी पल मुझे  स्टोर में रखे गिफ्ट्स का ध्यान आया. मैंने सोचा चलो जब तक चाय बनती है तब तक नेहा का ही गिफ्ट चेक कर  लिया जाये.
मैं स्टोर में  गयी.
स्टोर रूम में जाते ही मेरा ध्यान वहाँ  पर रखे रबड़ के भयानक चेहरे पर गया जो तब भी हँसता हुआ स्प्रिंग के सहारे ठुमक रहा था. उसे देखते ही मेरे होठों पर बरबस ही मुस्कान थिरक उठी.
उसी पल मेरे मन में नयी खुराफात उभरी-" देखूं तो सही ' उनके' दोस्त ने क्या पर्सनल माल गिफ्ट किया है?"
मैंने नेहा  के गिफ्ट को देखने का प्रोग्राम पोस्टपों करके उन दोनों गिफ्ट्स को देखने  का इरादा बना लिया जो तब अधखुले पड़े थे.
मैंने पहले एक गिफ्ट को पूरा खोला. ओसके अंदर झाँका और उसमे एक पैंटी, एक बर्थ- कंट्रोल  को गोलियों का पैकेट रखा हुआ देखा.
दूसरा गिफ्ट खोलकर देखा. उसमे बस K-Y jelly और सिलिकोन लुब्रिकेंट ट्यूब्स रखी हुई थी. वो किस काम की थीं मैं जरा भी नहीं समझी.  ( हालाँकि अब समझती हूँ सिलिकोन लुब्रीकेंट तो हम अब यूज भी  करते हैं.)
उन दोनों ट्यूब्स को मैंने  कई बार  उलट-पुलट कर देखा, और अब कुह समझ में नहीं  आया तो यथा स्थान वापिस रख दिया. रक बात मेरी समझ में नहीं आई-' उन्होंने वो गिफ्ट्स ज्यों-के-त्यों क्यों रख दिए थे इनमे क्या खास बात है?"
खैर!
मैंने  वहां से अपना फोस हत्या और नेहा  के गिफ्ट पैक को उठा लिया और  बडबडाते हुए-"पता नहीं इस स्टुपिड ने  क्या भेजा है.?"-गिफ्ट पैक को को खोलना शुरू कर दिया.
मैंने उसे खोला तो मेरा ध्यान उसमे रखी  हुई नाइटी पर गया. मैंने उसे बहर निकालकर उसे खोलकर हवा में झुलाकर देखा. वो स्किन से मैच करती हुई गुलाबी  एकदम  पारदर्शी नाइटी थी. उसको देखने के बाद मैंने उसे साइड में रख दिया. पैक में रखे दुसरे आइटम को देखा तो उनमे एक डॉटेड  कंडोम का पैकेट था. एक D.V.D. थी उसपर लिखा था.  watch and try it.
मैं जरा-सी उलझ गयी.
मैंने तुरंत स्टोर से  बाहर आकर अपना लैपटॉप उठाकर  ऑन किया और  D.V.D. को उसमे डाला और उसे प्ले कर दिया.
D.V.D. की टाईटलिंग ने ही एरा दिमाग घुमा दिया. मेरा समूचा चेहरा कनपटियों तक ढकते अंगारे की तरह लाल सुर्ख हो गया था. बदन का समूचा लहू खौलता तेजाब  बन गया था  मानो. उस फिल्म की टाईट्लिंग में ही वासनात्मक सीन्स चल रहे थे. लड़के द्वारा ' जुल्म' होने पर किलकारियां मर रही थी.
वो एक पोर्न फिल्म थी.
उसी पल मेरे कानों में किसी की पदचापें  पड़ीं तो मेरा ध्यान उस तरफ गया. दरवाजे पर शबनम   आंटी  खड़ी  थी. लैपटॉप की स्क्रीन को फोल्ड कर दिया और ह्वासों को काबू पाने की कोशिश करती हुई बोली-"यस आंटी, क-क्या काम है?"
"क्या देख रही थी बेबी?"-शबनम आंटी ने मेरा चेहरा गौर से देखते हुए पूछा.
"N-N-nothing..."-मैं कहा-"कुछ काम था?"
"पकोड़ियाँ यहीं लाऊं या बैडरूम  में?" -वो गंभीरता से बोली.
"बैडरूम में ही तो हूँ मैं "-मैं चौंकी. उलझी.  तत्काल मेरे याद   आया-"तोड़ दी अंग्रेजी की टांग."-मैंने तत्काल मुस्कान दबाई.
अगले ही पल गंभीर हो गयी.-"नहीं.'
"नहीं मीन्स......?"
"i dint want anything."-मैं फ्लो में कह गयी-"i am leaving."
"क्या बोला?"-सब उनके सर के ऊपर से निकल गया था.
अगले ही पल  मैं समझ भी गयी उनके चेहरे के रिएक्सन  देखकर. सो बिस्तर से उठकर बोली-"मैं कहीं  जा रही हूँ. चाय नाश्ता तुम सब कर लेना."
"कहाँ जा रही हो?"
"नेहा के घर."-कहकर मैं निकल गयी.
***
" तेरा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है?"-मैंने घर जाते ही नेहा को आड़े हाथों लिया. उस समय वो अपने बैडरूम में पड़ी सो रही थी जब मैंने जाकर उसे जगाया.
"क्या हो गया यार."-वो बैड पर बैठकर अंगडाई लेते हुए एकदम इनोसेंट भाव से  बोली. --"तू बारिश में क्यों इतने खद्दे खा रही है?"
" तुमे गिफ्ट में क्या भेजा था?" मैंने उसे घूरा.
" यार, मैंने कुछ भेजा ही कहाँ है?"-वो पलकें झपकती हुई सदीद हैरानी  से बोली.
"मैं शादी के गिफ्ट की बात कर रही हूँ."-मैंने खुश्क भाव से कहा. 
" शादी का गिफ्ट......."-वो हैरानी से मेरा मूंह तकती रह गयी." ओह्ह  गोड! तुने वो गिफ्ट आज खोलकर देखा है?"
" नहीं कल खोला था `उन्होंने `"-मैंने बताया-" मैंने  उसे अब देखा."-मेरी टोन  तुरंत क्रोध से भर गयी.-" कितनी गन्दी हो गयी है तू!"
" ओए-होए मेरी जान ."-उसने उठकर मुझे अपनी बांहों में भर किया और बिस्तर पर ढेर होकर बोली-" रात को जब अपने पतिदेव के साथ वो `गन्दा` काम मजे लेकर करती होगी तो मुझे गंदा नहीं लगता होगा. हमने इस काम को  और ज्यादा स्पाईसी बनाने का सामान क्या दे दिया- मैडम को पतंगे लग गये." 
" ईडियट,  हम कुछ नहीं करते."-मेरे मूंह  से बरबस ही निकला. 
उसने मुझे झटके से यूं बंधन मुक्त किया कि जैसे मेरे बदन में कांटे उग आए हों,वो परे छिटक हई-" are you out of mind?"
मैं उठकर बिस्तर पर  बैठ गयी
नेहा भी उठकर मेरे पास बैठ गयी. मेरे पहलू में बैठी वो मुझे यूँ देखती रही मानो मैं कोई एलियन होऊं.
" सब ठीक है ना?"-वो गम्भीर भाव से बोली.
" मतलब?"
"तेरे एंग्री यंगमैन को कोई प्रॉब्लम वगैरा तो नहीं है?"
" न, सब एकदम ठीक है."-मैंने आत्मविश्वास से कहा भरी स्वर में -"वो अपनी गर्लफ्रेंड के साथ सब कर रहे है ना- अगर प्रॉब्लम होती तो क्यों करते.?"
" तुझे  क्या पता की वो करता है?"
"पता है."-मैंने भरी स्वर में बताया-"कल उनकी जेब से कंडोम का पैकेट मिला था. उनमे एक कम था. वो जो एक कम था वो उन्होंने अपनी गर्लफ्रेंड के आलावा किसपर कुर्बान किया होगा?"
नेहा के चेहरे पर गुस्से के भाव आये.
"I can`t beleave this."-गुस्से से वो बोली-" How cheap he is! इतना गिरा हुआ कोई आदमी कैसे हो सकता है! गर में नई-नवेली बीवी के होते हुए भी वो स्तुपिद बहार मुंह मरता फिर रहा है."
"मैं उनकी बीवी नहीं हूँ."-मैंने हताशा से कंधे झटके. परे देखने लगी. मन में डर था  कहीं वो मेरी आँखों में वेदना को नोटिस न कर  ले .
"क्या बात कर रही है!!!!!"-सदीद हैरानी का भाव था उसके स्वर में. उसका हाथ मेरे कंधे पर टिका हुआ था.-"ये कैसे हो सकता है?'
मैं उसके मुखातिब होकर सब बताती चली गयी.
वो हैरानी से मेरा चहरा देखती हुई सब सुनती रही. जब मैंने उसे सब कुछ बता दिया तब भी वो बस मेरा चेहरा  देखती  रही.एकदम चुप. बैडरूम के  तनावपूर्ण माहौल में बाहर की बारिश का शोर गूँज रहा था. 
"अब एक ही बैडरूम में सोते हो?"-उसने मुंह खोला.
"हाँ."
"एक बैड पर?"
"बताया तो है- हाँ."
"कमाल की विल पॉवर है बंदे में."- वो बोल पड़ी.-"तेरे जैसी हसीन लड़की के साथ वो पूरी रात रहता है और कुछ भी नहीं करता-this is amazing yaar."
मैं अंदर से जल गयी- कैसी कमीनी दोस्त है मेरी ये नहीं सोच रही कि मैं  खुद को कैसे  कंट्रोल कर रही थी.
" कुछ भी अमेजिंग कहाँ है, यार?"-मैंने फीकी मुस्कान के साथ कहा-"अगर भूख होगी तो ही मन बेकाबू होगा ना. साड़ी भूख तो गर्लफ्रेंड के सात शांत कर लेते है. फिर क्या रक पड़ता है की मैं रात भर आस-पास होती हूँ या नहीं."
चंद पल ख़ामोशी के बाद वो बोली-" यार तेरे याद है ना- एक बार तुने कहा था की तू तब पोर्न मूवी देखना पसंद करेगी जब तेरा स्पाऊज़ तेरे साथ होगा ताकिउसे देखकर  जो आग तेरे बदन में लगेगी उसे शांत करवा सके. मैंने सोचा अब तो तुझपर प्यार की बरसात करने वाला मिल गया है. तो तुझे भी पोर्न मूवी दिखा दूं. वो नाइटी इस वजह से दी थी ताकि जब तू उसे पहनकर अपने मियां के सामने जायगी तो 'सबकुछ' झलकता देखकर वो दीवाना हो जायेगा.कंडोम का पैकेट ये इशारा किया था कि मजे इ चक्कर में पड़कर अभी से केयरलेस मत बन जाना और अभी से फेमिली शुरू मत कर देना. डॉटेड  कंडोम से औरत को ज्यादा  मजा आता है."
" चल छोड़ ये सब."-मैंने टॉपिक बदलने कि कोशिश की.-"कोई और बात सुना."
सचमुच ही हमने टॉपिक बदल भी लिया.

Tuesday, February 28, 2012

love diary 8

शाम को मैं  किचन में थी.  तब भी बारिश पड़ रही थी.
" बेबी आपका फोन है..."-शबनम आंटी ने मेरा मोबाइल मेरी तरफ बढाते हुए  कहा.
फोन तब भी बज रहा था.
"आंटी, सब्जी का ध्यान रखना ....."-मैंने फोन लेते हुए व्यस्त भाव से कहा-"मैंने हल्दी मिर्च डाल दिए हैं.नमक   आप डाल देना."
मैंने मोबाइल की स्क्रीन पर निगाह डाली.
वो शशांक का नम्बर था, जो फ्लैश हो रहा था.
उस नम्बर पर नजर पड़ते ही एक टीस-सी मेरे दिल  में उठी.
उस टीस की वजह से मेरा समूचा वुजूद तडपकर रह गया.
मैं फुर्ती से किचन से बाहर निकली, कहीं शबनम आंटी मेरे चेहरे पर तडप नोटिस न कर लें .
***
" हेल्लो."-मैंने माउथपीस में कहा तो मुझे  लगा जैसे मेरी आवाज सागर के तल को छूकर बाहर निकल रही थी.
अपने बैडरूम  में जाते ही मैंने काल रिसीव की थी.
" कहाँ हो तुम????"-उसने दूसरी तरफ से नाराजगी से कहा-"इतने दिनों से चैटरूम में तुम्हे देख रहा हूँ. तुम ऑनलाइन क्यों नहीं होती हो? फोन भी कई बार स्विचऑफ  मिला. कई बार बैल गयी तो तुमने कॉल अटैंड   ही नहीं की."
"म..मैं  बाथरूम में होउंगी. "-मैंने बहाना बनाया-"ध्यान नहीं गया होगा."
"बहाना मत बनाओ."-उसने रोषपूर्ण लहजे में  कहा-"सच बताओ तुम मुझे क्यों नेगेक्ट कर  रही हो??"
"नेग्लेक्ट नहीं कर रही..."-विवशता से मैं मिमियाई-"बस, मैं किसी से  बात नहीं करना चाहती."
"क्यों?"
"मेरा म..मन नहीं करता."
"पलक, अपनों से बात नहीं करोगी तो कैसे चलेगा???"-शशांक ने मुझे समझाने का प्रयत्न किया-"सारे गम अपनों से ही शेयर किये जाते है. मानता हूँ यार  अपने पापा के गुजर जाने के बाद तुम खुश नहीं हो  बट क्या खुद को घर में बंद कर लोगी?"
"न..नहीं वो  बात  नहीं है."
"तो?"
"अभी मैं  नोर्मल नहीं हो  पा रही हूँ."
"क्या इस तरह लोगों से कटकर नार्मल रह पाओगी?"-शशांक ने मुझे समझाने की कोशिश की -"पलक, हम सिर्फ दोस्त ही नहीं है यार , हम लाइफ पार्टनर भी  हैं. तूम अपनी हर तकलीफ मुझे शेयर करो. अगर ऐसी कोई बात है जो मुझसे शेयर नहीं कर सकती तो मम्मी से शेयर कर लो."
" No-No. I m fine ...."- मैं कांपते हुए स्वर में बोली.
उसकी हर बात जैसे मेरे जख्म पर नमक का फाहा रख रही हो.  तडप के कारण मेरा बुरा हाल था.
"Are you sure?"--वो बोला.
"Yaa...absolutely."
"तो तुम मुझे नेगलेक्ट तो नहीं करोगी?
"तुम स अपनी ट्रेनिंग पर  ध....ध्यान दो बस"-मैंने  बात बदली-"यहाँ पर मेरी केयर करने के लिए बहुत लोग हैं."
"इस वक्त कहाँ रहती हो?"
"अपने घर में."-मैंने बताया.
"अकेली?"
"नहीं, शब्बो आंटी भी यहाँ शिफ्ट हो गयी हैं."-मैंने बताया-"और `वो` मेरे साथ हैं ही."
"वो कौन?"
" व्..वो एंग्री यंग मैन.."मैन बालकनी की तरफ बढती हुई बोली.-"वो मेरी पूरी केयर करते है. "
"एंग्री यंगमैन.."शशांक का लहजा खुश्क हो गया था.
"  नहीं-नहीं ..शब्बो आंटी और उनके हसबैंड .."मैं बोली.मैंने संशोधन किया मानो.-"वो मेरी पूरी केयर करते है.?
"तो अब  उसे घर से निकल जो दो..."-शशांक ने कहा-"अब तो तुम्हारे पापा भी नहीं है."
मैं तत्काल सकपकाई.
गडबडा गयी.
अगले ही पल मैं बोली-"शशांक, एक्चुली पा  ने कहा था `उन्हें`  यही रहने दूं...."-विराम लेकर मैं बोली -"वैसे भी हमारा कोई सम्पर्क नहीं होता. बस ब्रेकफास्ट पर मिलते हैं या डिनर पर. बातचीत तक नहीं होती  है उस दौरान ठीक  से."
"ठीक है, तुम अपना ख्याल रखना."
" हाँ,रखूंगी..."-मैं बोली-"तुम मेरी चिंता मत करो. मेरी जरा-सी भी फ़िक्र मत करो. बस अपनी ट्रेनिंग पर ध्यान दो."
" I love you Palak..."-वो गम्भीर स्वर में बोला.
मेरे वुजूद पर मानो तेजाब बरसा था.
मेरे दिल को किसी बेरहम शिकारी ने जैसे मुट्ठी में लेकर कसकर भींच दिया था. तडप के कारण आँखों में आंसू
छलक पड़े. बरसता आसमान भी जैसे शोक गीत गा  रहा था.
"I love you too....."मैं  भर्राए  स्वर में कहती हो घूमी तो मेरा शरीर जम सा गया था जैसे.
मेरे सामने `वो`  खड़े थे . लगातार मुझे देख रहे थे. पता नहीं क्यों , तब मुझे लगा मानो मैं चोरी करती हुई पकड़ी गयी होऊं.मेरी आवाज और ज्यादा भ्रर्रा  गयी. मैं बोली-"I will  call you later."
और शशांक का जवाब सुने बिना ही सम्पर्क काट दिया.
वो तब भी लगातार मुझे घूरे जा रहे थे.
क्यों?
मैं नहीं समझी.शायद समझ भी जाती अगर मैं उनकी आँखों में झांकर देखती.आँखों में तो  तब झांककर देखती जन मैं उनसे नजर मिला पाती. फोन मजबूती से अपने हाथ में थामे आंसुओं से भरी नजर झुकाए  मैं  उनके पास से होती हुई बैडरूम से बाहर  निकल गयी.
किचन में जाते-जाते मैंने रास्ते में  ही आँखें साफ़ कर ली थीं ताकि शबनम आंटी मेरे आंसूं न देख लें.
***
मैं रूटीन के अनुसार डिनर लेकर बैडरूम में ही गयी.
रोज ही हम ख़ामोशी से खाना खाया करते थे मगर उस रात डिनर के वक्त  पर ख़ामोशी  थोड़ी-सी तनावपूर्ण-सी थी. बरसात के गूंजते शोर  में हमारे मुह के चलने की  आवाजें आ रही थीं.
खान निबटा.
मैंने खाने के बाद गंदे बर्तनों को उठाकर ले जाकर किचन के सिंक में डम्प कर दिया ताकि सुबह के समय नौकरानी  साफ़ कर दे.
मैं वापिस बैडरूम में गयी.वो बिस्तर के बजाए स्टडी टेबल पर बैठे किताब के प्रूफ पढ़ रहे थे.
मैं रूम का दरवाजा लाक करके बिस्तर पर चली गयी.
फिर ख़ामोशी.
बारिश का  शोर निर्बाध गूँज रहा था. मेरा मूड था मैं कुछ  टी.वी. पर देखूं, मगर टी.वी. ऑन करती तो कमरे   में शोर होता जिससे  उन्हें काम  करने  में दिक्कत  होती. उस   रात तो  हमने रात  के आठ  बजे ही डिनर कर लिया था.क्योंकि वो  छ: बजे ही  आगये थे.
बोरियत ने  जब तंग कर दिया तो अचानक मेरा ध्यान उन  गिफ्ट्स की तरफ गया जो  मेरे बैडरूम के स्टोर में रखे थे. वो भी तो तब तक खोले नहीं गये थे
सो!
मैं उठी और स्टोर में चली गयी.
स्टोर रूम में गिफ्ट्स पैक्स का ढेर लगा हुआ था. जो पैक्स उनके थे पहचान वालों के थे वो भी, और जो मेरी पहचान वालों की तरफ से आये थे , सब मिक्स थे.
मैं स्टोर रूम के फर्श पर बैठ गयी और एक-एक करके छांटकर अपने रिश्तेदारों के गिफ्ट्स खोलने लगी.
मैं दो ही गिफ्ट खोल  पाई थी कि स्टोर के दरवाजे पर आहट पाकर मैं चौंकी.
उधर लुक दी.
वो थे.
वो सवालिया निगाह से मुझे देख रहे थे. -"what are you doing?"
"बोर हो रही थी. सोचा गिफ्ट ही चैक कर लूं."-मैंने कहा-"खैर, ये तो बहुत ज्यादा है. आप नहीं देखना चाहते?आपके पहचान वालों ने भी तो फिफ्ट दिए है."
"हाँ, दिए है."-वो बोले-" मुझे नहीं  पता कहाँ रखे है."
"सब इन्ही में मिक्स है."
"ओह्ह."-वो जरा हिचकिचाए.
"आप  नहीं देखना चाहते?"
"हाँ.."-वो बोले-"मैं स्क्रिप्ट को बंद करके रख आऊं."
"OK..."मैंने कहा.
चाँद मिनटों में वो  वापिस भी  आ गये.
स्टोर रूम  ज्यादा बड़ा नहीं था.थोडा-सा  सामान  पहले ही रखा था. साथ में फैले पड़े गिफ्ट्स  पैक की वजह से थोडा-सा ही स्पक्रे बचा था. वहां  पहले से ही मैं भी बैठी थी. सो, उन्हें मेरे पास ही बैठना पड़ा.
हम दोनों ने गिफ्ट्स खोलने शुरू किये.
नोर्मल कपल्स वाले गिफ्ट्स.
राधा-किशन, दो बच्चों के कपल वाली , तोता-मैना उत्यादी कपल वाली चीजें हर गिफ्ट  गिफ्ट में थी.एक-दो गिफ्ट्स के बाद हम दोनों के हाथ में जो भी गिफ्ट आता था हम खोलकर देख लेते थे. अगर गिफ्ट पैक पर लिखा नाम हमारे लिए अजनबी होता था तो हम गिफ्ट के पैक पर लिखा नाम पढकर दुसरे को बता देते- वो  दुसरे की  पहचान का निकल  आता था.
"ये निकुम  चावला  कौन   है......?"-गिफ्ट पैक पर लिखे नाम को पढकर मैंने पुछा.
" he is my chieldhood chum........."-वो मुस्कुराये -"खोलकर देखो क्या हैं इसमें?"
वो गिफ्ट काफी बड़ा था.
मैंने गिफ्ट को खोलना शुरू किया तो उन्होंने अपने हाथ में थमे  पैक पर से ध्यान हटाकर मेरी तरफ देखना शुरू क्र दिया. गिफ्ट खुलते ही बरबस मेरे  होठों से चींख निकल गयी.शुक्र था मैं पछाड़ खाकर नहीं गिर पड़ी. मेरा पूरा वुजूद ही कांपकर रह गया था. रूह दहल उठी थी.
गिफ्ट में से एक भयानक सूरत जम्प मारकर बाहर निकली थी.
`वो` भी स्तब्ध.
फिर अगली ही पल हमे आभास हुआ वो रबड़ का था. नकली था.
हम दोनों विश्फारित नेत्रों से उस रबड़ के भयानक चेहरे को देख रहे थे, जो दाँत दिखता हुआ ठुमक रहा था.
स्टोर में पिन साइलेंस का माहौल चाय रहा.  हम लगातार कई पलों तक फ्रीज हालत में.........उस ठुमकते हुए भयानक चेरे को देखते रहे. फिर मैंने `उन्हें` लुक दी.
हमारी नजरे मिलीं तो हमारे होठों पर मुस्कान न्रत्य कर उठी.वो मुस्कान हंसी में तब्दील होती चली गयी.
"are you fine..."-हँसते हुए वो बोले.
"हाँ....'मैंने बताया-"ठीक हूँ  मैं."
मैंने सावधानी  से  गिफ्ट पैक  से उस भयानक चेहरे को बाहर निकला तो स्प्रिंग समेत वो बाहर निकल  आया.मैंने गिफ्ट पैक में झांककर देखा तो उसमे एक ग्रीटिंग  कार्ड रखा मिला. मैंने ग्रीटिंग बाहर निकला.खोलकर उसे  पढ़ा. लिखा था -
साले , कमीने तो इसी गिफ्ट के लायक है.  अबे   शादी में नहीं बुलाया तो कोई बात  नहीं , अब क्या सुहागरात भी अकेला ही मनायेगा क्या????
                                                                                                                   तेरा बाप -
                                                                                                              निकुम  चावला
पढकर मेरा चेहरा सिन्दूरी हो गया.
"क्या लिखा है?"-वो सस्पैंस भरे स्वर में कहा.
मैने कोई जवाब न देकर वो कार्ड उनकी तरफ बढ़ा दिया. उन्होंने कार्ड कोलेकर पढ़ा और मुस्कुरा दिए.
"लगता है  नाराज हैं वो..."-मैं बोली.
"वो गलत नहीं है..."-वो मुस्कुराते हुए तत्काल वो गम्भीर हो गये.-"पर उसे बताता भी तो तभी न जब सचमुच  शादी हो  रही होती."
मैं भी गम्भीर हो गयी किन्तु उन्हें  गिफ्ट पैक खोलने मेंपाकर मई भी  व्यस्त हो गयी.
उसके बाद उनके एक और अत्यंत क्लोज फ्रेंड का मेरे हाथ में आया.  जैसे ही  मैंने नाम बताया तो उन्होंने वो ले  लिया-" क्या पता इसमें क्या छिपा रखा है उसने ."
उन्होंने  उसे खोला मैं इंटरेस्ट लेती हुई उन्ही  की  तरफ देखने लगी.  मैं एक्स्पेक्ट के  रही थी कि उसमे भी  कोई सरप्राइज होगा. हायद था कुछ सरप्राइज  ही. गिफ्ट पैक के डिब्बे में  झांककर उन्होंने देखा. मुकुराए और डिब्बा बंद  करके अपनी  साइड में रख  लिया.  मैंने पूछना चाह-"इसमें क्या है?"-मगर  होंठ खोलकर सख्ती से बंद क्र लिए.
हम दोनों फिर अपने गिफ्ट्स खोलने लगे. नेहा का गिफ्ट उनके हाथ  में   आया नेहा का नाम गीत पर पढकर वो बोले-"ये तो आपकी शेली  है ना, the verry  close one?"
" Na.............the only one  who is close with me ."
"लो तो देखो क्या भेजा है उसने?"-उन्होंने गिफ्ट  पैक  मेरी ओर बढाया मगर मैंने इनकार क्र दिया-"आप ही निकल लो बाहर."
"ओ.के."-उन्होंने लंधे उचके दिए.
गिफ्ट खोला.
झांककर देखा और तुरंत ही गिफ्ट पैक बंद कर दिया और एक तरफ रख दिया.
मैं चौंकी. उलझी-"क्या है इसमें."
"कुछ  काम की ही चीज  है."उन्होंने  कहा-"पर अभी काम नहीं  आने वाली."
"कब आयेगी?"
"शादी के बाद."-वो बोले -" जब आप अपने बॉय फ्रेंड से करोगी."
मेरी समझ में कुछ  नही आया. चाहती थी की देहूं पैक में क्या कैद करके नेहा की बच्ची ने भेजा था मगर नहीं कर सकती थी. ये बात पक्की थी  कुछ  पर्सनल था इसी  वजह से वो सामान  उन्होंने बाहर नहीं निकला.  देट्स मीन -वो चाहते थे मैं उस सामान को पर्सनली देखूं.
सो!
मैंने गिफ्ट को तब नहीं देखा.
***
सारे गिफ्ट्स देखने के बाद हमने उन्हें वहीं छोड़  दिया. दो गिफ्ट्स उन्हों पैक मैं ही रहने दिए.  नेहा का गिफ्ट भी वहीं र छोडकर मैं बेडरूम में आ गयी थी.
तब आधी रात होने को थी.
बिस्तर पर उसी तरह तकियों का बरसात तब भी पड़ रही थी सो मौसम थोडा ठंडा हो गया था. किंग साइज बैड के लिए लिहाफ भी किंग साइज  ही था  मैंने अपने लिए लिहाफ निकाल लिया. था.
"आपको ठण्ड तो नहीं लग रही?"-मैं बोली-" आप भी ओढ़ लो."
"नो थैंक्स."-वो बोले -"इट्स ओ.के."
 मैने लिहाफ ओढ़ लिया.
हम दोनों लेट गये. हमारे चेहरे एक दुसरे के विपरीत थे. मैं सोने की कोशिश करने लगी. कमरे की ख़ामोशी में बरसात के शोर बीच उनका स्वर मेरे कानों में पड़ा-"अज किसका फोन आया था?"
"कब?"
"शाम को."- उनकी आवाज-"जब मैं आया था. ..........आप बालकनी में खड़ी बात कर रही थी."
"तब........."
"हाँ."
"व्-व्-व्-वो  शशांक का फोन  आया था."
"आपका बॉयफ्रेंड."
मुझे अच्छा नहीं लगा.
"ह-हाँ."-मैं बोली.
"क्या सब ठीक है?-उनकी  आवाज.
"हाँ."-मैंने कहा-" कोई प्रोब्लम नहीं है हम दोनों के बीच "
उन्होंने और कुछ  नहीं पूछा.

Monday, November 21, 2011

`love diary' 7

डिनर के समय भी  उनका  कोई पता नहीं था.
सच कह रही हूँ.  मेरा मूड पूरी तरह ऑफ था.फिर भी डिनर करके रखवा दिया और उनका इंतज़ार करने लगी.
वो साढ़े नौ बजे आये. घर के नौकरशाम को ही छुट्टी करके जा चुके थे. शबनम आंटी अपने क्वार्टर में चली गयीं थीं. 
कार के इंजन की आवाज जब मेरे कानों में पड़ी तो मैंने  टी. वी.   का वोल्यूम  न केवल कम कर दिया बल्कि टी.वी. बंद भी कर दिया.कार  के इंजन की घरघराहट  बंद  हो गयी. मैं रूम से निकलकर बाहर  आ गयी. मैं रेलिंग के सहारे कड़ी थी कि वो  बंगले  के अंदर आये, हमेशा की तरह गंभीर.
वो अंदर आये और सीढियां चढ़कर मेरे पास आये.बोले-"आप यहाँ क्या कर रही हैं?"
"आपका इंतजार."
"सब ठीक है न.?"-वो तत्काल सतर्क भाव से बोले.
"हाँ...आपके मामा जी के घर से फोन आया था. वो चाहते थे कि हम डिनर उनके साथ करें. मैंने आपका फोन ट्राई किया था तो आपका फोन स्विच- ऑफ था."
" हा, मैंने कर दिया था."-वो बोले-"बाद में ऑन करना भूल गया था. मैं जब ज्यादा बिजी होता हूँ तो फोन को ऑफ कर  देता  हूँ."
"ओह ..."-मेरी नजर उनके चेहरे पर टिक गयी-"मैना ऑफिस वाले नम्बर पर ट्राई किया था. छाया ने बताया था आप ऑफिस में नहीं थे."
"ओह हां., मैं लंच के बाद बाहर चला गया था, कुछ काम था"-वो तत्काल जरा-से हडबडाए-से बोले -"  तब मुझे कायदे से फोन को ऑन कर लेना चाहिए था पर नहीं किया. कोई ऐसा साइन भी नहीं था कि आप मेरे साथ फोन कर सकती."-फिरती से सब्जेक्ट चेंज किया-" आप चिंता मत करो. मामा जी से माफ़ी मांग लूँगा."
कहकर वो मुड़े तो मैंने टोका -" कहाँ जा रहे हो?"
"अपने रूम में ."
"आपका सामान अब मेरे रूम में शिफ्ट किया जा चुका है..."अँगुलियों को आपस में गूंथकर मरोड़ती हुई मैं बोली.
" क्या ?"-वो चिहुंके-"सामान यहाँ क्यों रख लिया आपने?"
"मैंने नहीं, शब्बो आंटी ने किया  है."-मैं विवश भाव से बोली .साथ ही वो पूरा एपिसोड सुना दिया जब शबनम आंटी ने सामान मेरे कमरे में रखने को कहा था.
उन्होंने आह-सी भरी.
"  आपने  डिनर कर लिया."- मैंने पूछा.
"नहीं.."वो बोले -"पर ज्यादा भूख नहीं है. कॉफ़ी का स्नेक्स वगैरह से काम चल जायेगा."
"मैने भी डिनर  नहीं किया."-मैने कहा-"आप कपड़े बदल लो. मैं डिनर लेकर  आती हूँ."
***
मैं बैडरूम में डिनर लेकर गयी तो मैंने उभे बाथरूम में से निकलते हुए देखा. वो कपड़े बदल चुके थे, और कुरता पायजामा पहन चुके थे.
हम दोनों ने साथ ही खाना खाया. तब मैं अलग-अलग कटोरियाँ लेकर आयी थी. 
"अब???"-खान खाने के बाद उन्होंने सवालिया निगाह मेरी ओर डालते हुए `आह` भरी.
मैंने भी कंधे झटक दिए.
जानबूझकर दूसरी दिशा में देखने लगी.
"त-त -तकिये हैं .?"-वो हिचकिचाते हुए बोले.
"हाँ......."-मैं धीरे से बोली.
"ओके....."आह भरकर वो बोले-"निकल लो."
मैं कबर्ड की तरफ बढ़ गयी.
***
बिस्तर पर तकियों की मखमली दीवार लगाकर हम दोनों बिस्तर के दोनों कोनो पर लेट गये.
तब कुल ही सवा दस बजे थे. हम दोनों ही ग्यारह-बारह  बजे के बाद  सोने  वाला थे. यूं नींद आने का सवाल ही नहीं उठता था. हाँ,ये बात सच अवश्य थी कि मन में न तो खलबली मच रही थी, न मन में तरंगें  दौड़ रही थी. 
मैं जरा-सी कम्फर्ट फील करने लगी थी,पर नींद आने में देर लगी.
***
"मैडम जी..."-चंपा, घर कि नौकरानी ने सुबह के समय कहा-"धुलने के लिए कपड़े  दे दो."
"हाँ, ठहर..."-मैंने  मैग्जीन को एक तरफ रखते हुए कहा. उस समय  मैं ड्राइंगरूम   में ही थी. चुकी जुलाई का महीना था, मौसम था ही बरसात का.बाहर बूँदें पड़ रही थीं.
मैं सोफे कपर से उठी और स्टेयर्स  की ओर  बढ़ गयी.-"चल आ  जा."
चंपा ना मुझे फोलो किया.
***
अपने रूम में जाकर मैना अपने कबर्ड  में से आने मैले कपड़े निकले और चंपा को दिए, तो चंपा चौंकी-"साहब के कपड़े नहीं देने,मैडम जी?"

मैं चौंकी.
अगले ही पल मुझे याद आया की `उनके` कपड़े भी तो वहीँ होंगे.
कहाँ   रख दिए?
मैंने देखे तो उनके वो कपड़े, जो उन्होंने पिछले दिन पहने थे,मुझे दुसरे कबर्ड में मिल गये. मैंने उन कपड़ों को चंपा को देने के लिए चंपा की ओर बढाया ही था कि मैं ठिठकी.मन में आया कहीं उनकी जेब में कुछ ख़ास चीज या कागज या फिर पैसे  इत्यादि न रह गये हों, सो मैंने उनकी जेबों को टटोलना शुरू किया. शर्ट कि जेब में कुछ भी नहीं मिला. पैंट कि जेब में मेरा हाथ गया तो मैं जरा-सी चौंकी. 
उसमें कुछ था.
क्या?????
गहन उत्कंठा की वजह से मेरा हाथ उस चीज को पकडे बाहर आयाजैसे मेरे बदन का पूरा लहू गर्म तेजाब बन गया था. चंपा की निगाह भी उस पर पड़  चुकी थी. इसके होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान न्रत्य कर रही थी.
वो एक कंडोम का पैकेट था.
खुला हुआ था.
मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूँ?कैसे रिएक्ट करूँ? मैंने तत्काल ही उस पैकेट को वापिस पैंट की जेब में रख दिया.  फिर याद आया कपड़े धुलने को भी देने थे. स  मैंने पैकेट को बहार निकालकर कपड़े चंपा को दे दिए.  चाँद पलों में भी  वो वहां से नहीं हिली तो मैंने उसको डांट दिया-"  खड़ी-खड़ी  क्या देखा रही है?  जा अपना काम कर."
मैंने साफ़ नोटिस किया कि उसकी अर्थपूर्ण मुस्कान बेहद गहरी होके हंसी में तब्दील होने वाली थी अपनी हंसी को दबाकर वो कपड़े लेकर मुड गयी.
मेरा बदन तब भी तप  रहा था.
ये पैकेट कहाँ से आया?
मैंने पैकेट को खोलकर देखा. उसमें  दो कंडोम थे. एक कम था उसके पैकेज  के हिसाब से.
ओह! तो कल जब वो ऑफिस से गायब थे  तो जरूर  अपनी  गर्लफ्रैंड के पास  होंगे . उसी वक्त  इस पैकेट से  एक कंडोम  कम हुआ होगा.
पता नहीं  क्यों, उनपर मेरा हक न होने के बावजूद भी , मुझे तकलीफ हुई थी. बहुत ज्यादा नहीं हुई, पर हुई.

Tuesday, September 27, 2011

क्या ये सही है???????????

ये केस मेरठ का ही है.एक लेखक महोदय ने अपने नॉवल में एक जाति के बारे में वक आपत्तिजनक बात लिख दी. उस जाति के लोगों ने हंगामा मचा दिया. केस भी ठोक दिया. चूंकि वो जाति राजस्थान से समबम्ध रखती है सो केस राजस्थान में ही चला और लोग वहीँ पर जाया करते थे. तीन लोगों पर केस चला लेखक प्रकाशक और मुद्रक. तीनों लोगों की सात साला तक परेड हुई-यानी सात साल तक उनपर केस चला.
सात  साल तक  वो लोग खुद को सही सिद्ध करने में लगे रहे. सात साल केस लड़ने के बाद वो  लोग केस हार गये. उनपर सजा के रूप में ५००-५०० रूपये का आर्थिल दंड लगा.
मेरी उन प्रकाशक साहब के रिश्तेदार से बात हुई जो केस में गवाह के तोर पर जाया करते थे. उन्होंने मुझे बताया की उन ५०० रुपयों को पे करने के बाद सब लोग हैरान थे-उनकी समझ में ये ही नहीं आ रहा था कि उन लोगों ने वो केस लड़ा ही क्यों????? 
अगर सजा इतनी  छोटी-सी थी तो उसके लिए सात साल तक लड़ने कि जरूरत ही क्या थी???वो शुरू में ही वो माफ़ी मांग लेते और वो उस सजा को भुगत लेते.
मैंने बाद में थोडा सा इसके बारे में सोचा. 
मेरा मानना है कि उनको जो इतनी दिक्कत का सामना करना पड़ा  उसकी वजह था वकील. उसे जरूर कानून की जानकारी होगी उसने मात्र अपनी फीस को कमाने के लिए उन्हें इतने टाइम तक उन लोगों को केस में उलझाये रखा. 
सच तो ये है वकील का काम जनता तो कानून की पेचीदगियों से बचाना होता है वही कानून ने अनजान लोगों को काटने के लिए केस में उलझाये रखते है. 
मैं मात्र वकीलों की बात नहीं कहूँगा. हल पेशेवर आदमी थोडा सा ज्यादा कमाने के लिए अपने फर्ज से गद्दारी करता है.
क्या ये सही है???????????

Sunday, July 3, 2011

gud news about `love diary'


दोस्तों आपको लग रहा होगा कि मैं नोवेल की आगे की कहानी  पोस्ट क्यों नहीं कर रहा हूं. दोस्तों मेरा ये नोवेल बहुत जल्द मार्केट में आने वाला है. उम्मीद है कि वो अगस्त के मिड में बाजार में होगा और आप उसे एक साथ पूरा पढ़ सकेंगे. स्क्रिप्ट पब्लिशर के पास होने कि वजह से मैं इसे ब्लॉग पर नहीं डाल प् रहा हूँ.जसे ही ये मार्केट में आएगा बाकी का मैं फिर ब्लॉग पर डालना शुरू कर दूंगा.
उम्मीद है आप थोअदा सा सब्र रखेंगे और मेरा उत्साह बढाते रहेंगे.
धन्यवाद 
                                           भवदीय 
                            जोगेंद्र तिलगौडिया 

Saturday, June 4, 2011

कैसे-कैसे लोग???

एक दिन मैं सिटी बस से कहीं जा रहा था. बस में अच्छी खासी भीड़ थी. एक साहब बस में दरवाजे के जस्ट पास वाली सीट पर बैठे थे. अच्छी खासी उम्र के थे. उनकी बेटी जवान न भी हो तो टीन एज की जरूर होगी.पढ़े लिखे भी लग रहे थे.सवाल ये है मैंने उनकी उम्र और बेटी की उम्र  का जिक्र क्यों किया?
उसकी हरकत ही ऐसी थी.
उसकी हरकत का जिक्र करने से पहले मैं मेरठ की सिटी बसों के बारे में बता दूं. जवान लड़कियों को मनचलों की छेड़छाड़ से बचाने के जिलाधिकारी  महोदय ने सिटी बसों में पार्टीशन करवा दिया था. ड्राईवर वाली सीट की तरफ वाले हिस्से में महिला केबिन बना है-जो कि  पुरुष केबिन से एक दरवाजे के द्वारा जुड़ता है.वैसे दोनों केबिन्स में  चढ़ने और उतरने के लिए अपने-अपने दरवाजे हैं. दोनों केबिनों को जोड़ने वाला दरवाजा बेसिकली सहचालक की सुविधा  के लिए बनाया गया है ताकि वो टिकट काटते समय दोनों तरफ आराम से जा सके. सहचालक की इस सुविधा का पुरुष यात्री भी पूरा फायदा उठाते है.वो महिला केबिन की तरफ से चढ़ते हैं और दोनों केबिनो को जोड़ने वाले दरवाजे से होकर अपने केबिन में  पहुँच जाते है. उतरते वक्त जो आदमी महिला केबिन के पास होता है वो भी दोनों को जोड़ने वाले दरवाजे को पर करके महिला केबिन वाले दरवाजे से नीचे उतर जाते है.इससे उन्हें पीछे हटकर पुरुष केबिन वाले दरवाजे के पास जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती. 
अब बात करते है उन भाई साहब की.
हाँ वही भाईसाहब जो पुरुष केबिन के एग्जिट दरवाजे के ठीक पास वाली सीट पर आराम  से बैठे थे. उनका स्टॉप हापुड़ अड्डे से कुछ पहले आया था.जब वो भाई साहब बस से उतरे तो भाई साहब अपने ठीक पास वाली खिड़की से न उतरकर पूरे पुरुष केबिन की भीड़ को को बहादुरी के साथ चीरकर महिला केबिन में गये, उसके बाद वहां महिलाओं के भीड़ में पिसते हुए महिला केबिन के एग्जिट डोर से नीचे उतरे.
उन्होंने ऐसा क्यों किया????? ये समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं.
सच तुच्छ काम करने में  उम्र या शिक्षा कि कोई बंदिश नहीं होती.
पता है जब हम ऐसा काम करते है तो भूल जाते है कि हमारी भी बहन बेटियां है.

Tuesday, May 31, 2011

क्या पैसे से ही सब कुछ हो सकता है??????????

 बात परसों की है. मैं बड़े भाई की दूकान से घर वापिस आ रहा था. तेजगढ़ी पर मैं ऑटो स्टैंड पर पहुंचा और जब मैं तो लोगों को बड़ी उलझन में देखा. एक बूढ़े बाबा जी थे. वो बांह और घुटने में चोट खाए हुए थे. पता चला कि वो कहीं से दवाई लेकर आ रहे थे और दो जगहों पर गिर गये थे, उसी वजह से उन्हें चोट आई थी. वो ऑटो में तो बैठ चुके थे.लेकिन बात ये चल रही थी कि बाब जी को उनके घर कैसे भेजा जाये. एक कपल कि कोशिश था कि ऑटो वाला बाबा जी को उनके घर पर छोडकर आये-मर्द पैसे देने के लिए तैयार था.ऑटो वाला इसके लिए  तैयार नहीं था. बाबा जी ने बताया कि वो R.T.O. के पास कहीं रहते है.  फिर एक रिक्शा  वाले को रोका गया लेकिन उसने  भी उन्हें ले जाने से इन्कार कर दिया. वो थे भी काफी बूढ़े. अपनी उम्र  ९४ साल बता रहे थे. एक और लड़का की मदद करना चाहता था. वो भी रेकुएस्ट कर रहा था की ऑटो वा उन बाबा जी को उनके घर तक छोड़ आये. वो भी उसे पैसे देने की बात कर रहा था. मजे की बात है कि बाबा जी के साफ़-सफ्फाक सफ़ेद झक्क कपडे इस बात के लिए साफ़ इशारा  कर रहे थे कि वो किसी अच्छे घर से थे. उनको पैसे की नहीं सहारे की जरूरत थी. मुश्किल से १५-२० मिनट का समय देना था. खैर, एक बन्दे ने बाब जी को उनके घर ले  जाने की जिम्मेदारी  ली. उसके उस का इ कुल ही १८ रूपये और लगभग आधा घंटा खर्च हुआ.
 मुझे अजीब-सा लगा.क्या हर बार पैसे से ही मदद की जा सकती है?
एक इंसान प्यासा है वो नल तक नहीं जा सकता तो क्या पैसे उसकी प्यास बुझ सकती है?
क्या जरूरत के वक्त जरूरतमंद के लिये  थोडा सा टाइम खर्च नहीं किया जा सकता???

Friday, April 29, 2011

love diary 5

अध्याय- १४ 
अब रिजल्ट ये था कि मैं अपन बैडरूम में सुहागसेज पर बैठी `उनके' आने का इन्तजार कररही थी.

हालंकि रिश्ते  को मेरे  सलामत और मौजूद रिश्तेदारों ने  यूं ही नहीं  मान लिया था. मेरे मामा जी  और बड़े चाचा ने एडवोकेट सचदेव से इस मुद्दे पर काफी बहस की.
पर वो बहस करने क सिवा  कुछ न कर सके .
मैं चुप रही.

जब शादी हो चुकी थी  तो रिसेप्शन भी रखा जाना था . वो भी  रखा गया.मैंने  रिसेप्शन वाली दोपहर को  ही नेहा को फोन करके शादी के बारे में बताया शाम को हों वाले रिसेप्शन कि खबर दी. नेहा ने खबर सुनकर यूं रिएक्ट किया जैसे मैं उसे अपने घर कि छत पर यु. ऍफ़ .ओ. के उतरने कि खबर दे रही होऊं. चूंकि खबर मैं खुद दे रही थी उसको सच स्वीकार करना ही था.मैंने अपने  बाकी दोस्तों को  भी खबर की. शशांक और उसके घरवालों  को कुछ  नहीं बताया. नेहा से भी कह दिया कि वो भी वैसा न करे.

रिसेप्शन   एकदम शांत अंदाज से हुआ .दोस्त और रिश्तेदारों  ने शिरकत की. `उनके' भी दोस्त  और रिश्तेदार  आये मगर उनकी सगे चाचा-ताऊ  का दीदार नहीं हो  सका. हाँ उनके ननसाल वाले  जरूर आए.

रिसेप्शन के बाद दुल्हन के जोड़े में मुझे मेरे बैडरूम में पहुंचा दिया गया-जिसे नेहा और मेरे चाचा की बेटी ने अपने हाथों से सजाया था. ये सच था उनके लिए मेरे मन में कोई भी एक्साईटमेंट नहीं था मगर `वो' जो मरे साथ  उस रात को करने वाले थे , उसके बार मे सोचकर ही मेरे बदन में करंट सा दौड़ जाता था. शादीशुदा जीवन  की  उस पहली रात के बारे में सहेलियों के बीच काफी  डिस्कशन हो चूका था. कुछ ने कुंवारेपन में ही उस सुख को भोग  लिया था.सबने दो कोमन चीजों को भोगा था. एक तकलीफ और दूसरा बेहद  सुख.किसी को कम तकलीफ हुई थी किसी को थोड़ी ज्यादा.बेहद सुख सभी को मिला था.
मुझमे और उन सबमे एक बात जुदा थी.
उन सब लडकियों ने जिसे अपना तन  सौंपा था, वो उनके मनपसंद मर्द थे-जबकि `वो' मुझे जरा भी पसंद नहीं थे.चूंकि मैं उनकी हो चुकी थी, आज नहीं  तो कल उन्हें अपना तन सौपना ही था तो आज इनकार क्यों  करूँ?
मैं तो सोच रही थी की ऐसा क्या करूँ कि `हलाल' होते समय ज्यादा तकलीफ न हो.मैं उनसे साफ़-साफ़ `उस' बारे बात कर सकूं मैं इतनी बोल्ड भी उनके साथ नहीं थी.
घंटे भर के इन्तजार के बाद उनकी आमद कि आहट मेरे कानों में पड़ी तो मेरे नखशिखांत एह सर्द तरंग मेरे बदन में दौड़ गयी. हालाँकि मैंने रूम के दरवाजे की तरफ ग्लैंस तक तक नहीं डाली थी-तब भी श्योर थी `वो' ही होंगे.
रात को उस समय सुहागकक्ष में- जब दुल्हन अकेली  हो-पति के सिवा आ ही कौन सकता है.
मेरे दिल कि धड़कने बढ़ गयी- जब मेरे  में दरवाजा बंद होने कि आवाज पड़ीं.सन्नाटे में सिटकनी चढ़ने की आवाज सरसराहट स्पष्ट पड़ी. मुझे लगा ए. सी.  कमरे में भी दुल्हन के भरी-भरकम लिबास में मी बदन ने पसीना उगलना शुरू कर दिया था.
पदचापें मेरी तरफ बढीं.
जैसे-जैसे `वो' मेरी तरफ बढ़ रहे थे मेरे दिल की धड़कने और तेज होती जा रही थीं.हालाँकि मैं काफी देर अपने आपको तैयार कर  रही थी तब भी उनके आगमन कि आहट से मेरी हालत जाल में कैद हिरनी के सामान हो गयी थी जिसको शिकारियो के आने की  आहट मिल गयी हो.
`वो' मेरे पास आये.
तब मैंने पहली बार उस तरफ नजर उठाकर लुक दी. हाँ, वही थे. वो एकम गंभीर थे.
हाँ, हलाल करते समय  शिकारी गंभीर ही रहता  है.
 `वो'  बिस्तर पर पैर लटकाकर बैठ गये. मेरी तरफ देखते रहे 
उफ़!उनकी नजर जैसे मेरे लिबास को जलाकर मुझे निर्वस्त्र कर देना चाहती थी. उन निगाहों  की तपिश मेरे लिबास को पार करके मेरे जिस्म क्या मेरी रूह तक को झुलसाने लगी थी.मैं अपनी नजर झुकाए अपने पैरों के नाखूनों  में लगी नेल पॉलिश को देखने लगी  थीजो मेरे लिबास कि मानिंद  ही सुर्ख थी.
" ज्यादा थकी हुई तो नहीं हो ?"-उनका गंभीर स्वर मेरे कानों में पड़ा .
अगर ज्यादा थकी हुई हूँ तो क्या हुआ?-मैं मन-ही-मन बोली-आप कौन-सा बाज आ जाना वाले हो.
सो, मैंने कहा-" कुछ ख़ास नहीं. मैं ठीक हूँ."
" मैं सोच रहा था आपने कपडे बदल लिए होंगे."-वो बोले-" इसीलिए मैं जरा-सा देर से आया था-ताकि आप कपड़े बदल सको."
मैंने झटके से उनकी तरफ लुक दी.उनकी वो बात मेरी समझ में जरा भी नहीं आई.
मैं कपडे क्यों बदलने लगी भला ? जब कपड़ों को बदन से अलग होना ही है तो उन्हें  उतारकर दुसरे  पहनने का क्या तुक है.
अब मैं `उनसे' क्या कहती?
" अब अगर मैं इस वजह से बाहर जाता हूँ- की आप कपड़े बदल रहीं हैं- तो लीगों को अजीब लगेगा."-`वो'   बोले-"अब आप बाथरूम में जाकर वो  कपडे बदल लो जिसमे आप आराम से सो सकें. हाँ न-न-नाईटी मत पहनना. सिंपल  सूट-सलवार पहन लो.......than we will talk."
मैं हैरान !
उस समय वो मुझे किसी एलियन से कम नजर नहीं आ रहे थे.हालंकि `वो' मेंरे साथ `कुछ' नहीं करना चाहते थे -ये मेरे लिए एक सुकून देने वाली खबर थी. तब भी मुझे उनका बिहेव अजीब सा लगा.
जैसा उन्होंने कहा था मैंने वैसा ही किया. मैंने बाथरूम में जाकर कपडे बदले.मैंने बाथरूम में जाकर सूट-सलवार पहन लिए जो महीने भर पहले मैंने ही बनवाये थे. शादी का जोड़ा परम्परा के अनुसार उन्होंने ही बनवया था.आप जानते ही होंगे. हिन्दू शादी की परम्परा में लड़की की गोद भराई से लेकर फेरों तक तमाम वैवाहिक  रीतियों  के कपडे-अन्तः वस्त्र तक- लड़की की ससुराल वालों की तरफ से आते है.चूंकि `उन्हें'  मेरी ब्रा के साइज़ का नहीं पता था, मेरे पति होने के बावजूद भी वो उन्होंने मुझे शबनम आंटी के थ्रू  पत्र करवाया था.
मैं बाथरूम से निकली तो उन्हें बिस्तर पर बैठा पाया. एकदम धीर-गम्भीर . मैं भी बिस्तर पर दूसरी तरफ से चढ़कर बैठ गयी. .मेरी ओर मुखातिब होते हुए वो मेरी ओर खिसके-उनके और मेरे बीच बिस्तर पर भी काफी डिस्टेंस था. उसके बावजूद भी एक इंच की दूरी कम हो जाने पर बदन में तेज सिरहन दौड़ गयी थी-`वो'        बोले-"क्या  आपको पता था -आप किन कागजों पर साइन कर रही थीं?"
" कब?"
" हॉस्पिटल में."-`वो' बोले-" जब आपने शादी के कागजों पर साइन किया था." 
" नहीं मुझे नहीं पता था."
" अगर पता होता तो क्या आप साइन कर देतीं."
मैं चुप रह गयी.
मेरी गर्दन झुक गयी. मुझे पता था `वो' लगातार मुझे देखे जा रहे थे.रूम का माहौल पहले ख़ामोशी से भरा था- तब सन्नाटे भर गया था.चंद पल मेरे जवाब का इन्तजार करने के बाद `वो' पूर्ववत्त या लिखूं की उससे भी ज्यादा धीर-गंभीर भाव से बोले-"मुझे पता था- आपका जवाब यही होगा. आप मुझसे शादी नहीं करती.उस वक्त मेरे मन में आया भी था -कि सर को आपके बॉयफ्रेंड के बारे में बता दूं मगर मैं ऐसा नहीं कर सका......"
मैंने झटके से उनकी तरफ  देखा. वो लगातार कहते चले जा रहे थे-" उस समय सर आपको सेफ हाथों में छोडकर `जाना' चाहते थे.इसी वजह से उन्होंने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा. अब मुझे लगा- शायद वो बच न पायें.सच कहूं तो मुझे नहीं लगता वो नोर्मल हालातों में आपका हाथ मेरे हाथ  में देते. वो आपके लिए आपकी ही तरह खूबसूरत प्रिंस  जैसा लड़का तलाश करना चाहते थे- जो आपको बेहद खुश रखे. हालातों ने उन्हें इस तरह का डिसीजन लेने के लिए मजबूर कर दिया.मैं आपके लायक नहीं हूँ. आपके पापा ने हमेशा -अपनी आखरी सांस तक भी - आपका भला ही चाहा, इसीलिए उनके लिए मन में कोई भी नेगेटिव सोच मत रखना."
" मुझे पता है."-मैं धीमे स्वर में बोली-"पा  ने हमेशा मेरा भला ही चाहा है."
" वैसे आपके लिए एक अच्छी खबर भी है."-उन्होंने कहा-" हमारी शादी कानूनन  मान्य नहीं है."
मैं हैरान!
सुनकर मेरा दिमाग सीलिंग फैन की तरह घूम गया.मैं हैरान-सी उनका चेहरा देखती रह गयी.मुझे मेरे  कानों पर यकीन नहीं  हो रहा था.
" ये सही है."-वो बोले -" कोई शादी तब तक मान्य नहीं होती जब तक दोनों पक्ष कोर्ट में या मेरिज रजिस्ट्रार के सामने शादी के पेपर्स पर गवाहों के साथ साइन न करें जब मैंने गवाहों ने और आपके पापा ने  साइन किये थे तब रजिस्ट्रार साहब मौजूद थे मगर एक अर्जेंसी की वजह से वो आपके आपकी आने से पहले ही चले गये थे. आपने रजिस्ट्रार की गैरमौजूदगी में बगैर जानकारी के साइन किये थे, सो ये शादी मान्य नहीं है."
"जब आपको पता था की ये शादी मान्य नहीं है तो तो इतना ताम झाम किसलिए किया? ये रिसेप्शन  पार्टी  क्यों रखी गयी?"-मैं हैरानी की वजह से पागल सी हो गयी थी.
" आप शायद भूल रही हैं कि आपके पापा आपको सेफ हाथों  में सौंपना चाहते थे."-उन्होंने सब्र से बताया -अगर अगर सबको ये पता चल गया कि आपको शादी हुई ही नहीं है तो मुझे आपसे अलग होना पड़ेगा. आपका बॉयफ्रैंड यहाँ नहीं है......"
" मेरे चाचा जी -मामा जी तो हैं."-मेरी आवाज सख्त हो गयी थी.
" अगर उन्हें उनपर यकीन होता तो ये नौबत ही न आती."-`वो' पूर्ववत्त संयत भाव से साढ़े हुए स्वर में  बोले जैसे पूरा होमवर्क प्रोपर वे में करके आये हों -"अगर   उन लोगों के बीच सबकुछ ठीक होता तो आपके पापा आपका हाथ मेरे हाथ में न देते."- विराम, मानो पैराग्राफ बदलकर आआगे बढे हों-" हाँ, तो मैं कह रहा था कि आपका बॉयफ्रैंड  -i dont know adjectly who is he-यहा है भी नहीं. पता नहीं वो तुरंत लौटकर आ सकता है या नहीं. जब तक वो लौटकर नहीं आ जाता तब तक मैं चाहत हूँ तब तक हम ये रिश्ता ज्यों-का त्यों शो करते रहें.कल लोग चले जायेंगे. नौकर  तो रात को रोज ही यहाँ नहीं रहते. तब हम आराम से अलग-अलग कमरों में सो सकते है.
मैंने सहमति से सिर हिला दिया.बोली  कुछ नहीं- चुप रही.
उस रात हम एक ही कमरे में सोये. एक ही बिस्तर पर महर अलग-अलग कोनों पर. वो एक मकिंग साइज बैड था सो हम बड़े आराम से उसपर दूरी बनाकर सो सकते थे.मुझे पता था  वो `कुछ' नहीं करने वाले थे.अगर उन्हें कुछ करना होता तो वो ये बातें मुझे बताते ही नहीं. मेरे हिसाब से तो शादी हो चुकी थी.
वाओ!!!
क्या कमाल की सुहागरात थी मेरी!!
जिस रात नवदम्पति एक दुसरे के बीच की दूरियां समेटने के लिए  उतावले रहते हैं उस रात हम बिस्तर  के दो कोनों पर सो रहे थे. ये भी तय हो गया था कि आगे से हर रात अलग-अलग रूम्स में सोया करेगे.मेरे  पतिदेव बजाए मुझे हासिल करने के बजाए मुझे ये बता रहे थे कि वो सही वक्त पर मुझे आजाद कर देंगे. मुझे किसी और के हवाले कर देंगे.
वैसे एक बात और भी थी.
मुझे पता था जाने कितने लड़के मेरे लिए  आहें  भरते थे और मैं जिसकी झोली में गिरी वो मुझे हासी करना तो  दूर मुझे किसी और के हवाले करना का इरादा बनाए हुए था.
क्या ये ममेरे हुस्न की बेइज्जती नहीं थी????
***
ठक-ठक-ठक.
नॉक की आवाज से मेरी नींद टूटी.
मेरी बड़ी चाची की लाड  से भरी आवाज नॉक के तत्काल बाद दरवाजे के पार से उभरी-" पलक, उठ जा, बेटा. नहा धो इ. सुबह हो गयी है."
" ज-ज-जी, आंटी जी."-मैंने अलसाये स्वर में कहा.
मैंने उधर- जिधर वो रात को सोये थे-लुक दी.
वो वहां पर नहीं थे.
मैंने वाल क्लोक पर नजर डाली सुबह  के छ: बजे हुए थे.सूरज निक चूका था और उसकी गुलाबी रौशनी बकनी के रास्ते कमरे में प्रवेश कर रही थी. मेरा ध्यान बाक्नी की तरफ गया. `वो' बालकनी में पड़ी लांजचेयर लेटे हुए थे. सिर के नीचे तकिया लगा हुआ था. तब उनकी आँखें खुली हुई थीं.
मैं बिस्तर पर उठकर बैठ गयी.
वो भी उठकर बैठ गये. न केव बैठ गये बल्कि मेरी तरफ भी बढ़ गये. मेरा दिल  धड़का. मैं भी उठकर खड़ी हो गयी.
उनकी हालत साफ़ चुगली कर रही थी वि भी रात को सोये थे.
" गुड मोर्निंग."- मेरे पास आकर वो बोले.
मैं भी बोली-" गुड मोर्निंग."
" आप फ्रेश हो लो."-वो बोले-" मैं बाहर  जा रहा हूँ."
" अ-अ-आप हो लिए?"-मैंने पूछा.
" नहीं."-वो बोले-"मैं अपने रूम में हो लूँगा. वहीं से वाक पर चला जाऊंगा." - अचानक वो ठिठके-" एक मिनट.. अगर मैं अपने रूम में जाकर......-" फिर खुद ही बोए-" लीव  इट. कोई कुछ नहीं  सोचेगा."
कहकर वो तुरंत बैडरूम में से बाहर निकल गये. उस समय मेरी समझ में कुछ नहीं आया. जो एक बात मेरी समझ में वो ये थी कि वो भी बेहद उलझनपूर्ण मानसिक द्वंद्व से जूझ रहे थे.
***
मैं डायनिंग टेबल पर गयी.
ब्रेक-फास्ट  के समय मेरे बड़े चाचा सुरेन्द्र शर्मा,चाची और मेरी चचेरी बहन तथा छोटे चाचा-चाचीमौजूद थे.
नाश्ते के समय जब मैं अपनी शेयर पर बैठी तो मेरे दाहिने तरफ वाली चेयर एकम खाई थी.एक पल को मेरी समझ में कुछ नहीं आया मगर जब `वो' वहां आ गये और अपने लिए चेयर तलाश करने लगे तो मेरे बड़े चाचा ने कहा-" अरे बैठिये न. कुर्सी खाली तो है."
मेरी बगल  में बैठी मेरी कजिन ने शरारत से कहा-"डोंट बी शाय जीजू. बैठ भी जाइये अब. ये चेयर आपके लिए ही रिजर्व है."
वो जरा से हिचकिचाते हुए टेबल का घेरा काटकर मेरी और बढे तो बरबस ही मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी.
वो मेरे पास ही आकर बैठे. मेरी और लुक तक नहीं दी. मैंने भी सीधी लुक  नहीं, पर एक नहीं कई बार लुक दी.
हम सब नाश्ता करने लगे.
***
नाश्ते के बाद चाचाओं ने हमे फैंसला सुना दिया कि वो लोग अपने अपने घरों में शिफ्ट हो रहे  थे. साथ ही बड़े चाचा जी ने कहा -"पलक बबेता, कोई भी बात हो तुरंत मुझे फोन करना. और हाँ, मैंने बात कर ली है. शब्बो का परिवार भी अब इसी बंगले में रह करेगा"
मेरा दिमाग घूम गया. 
मेरे ही पास `वो' भी खड़े थे.उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उनके अरमानों पर तुषारापात हुआ हो.
अध्याय-१५ 
उस वक्त मैं अपने बैडरूम में बैठी मैगजीन पढ़ रही थी जब मेरा मोबाइल बजा.मेरे चाचा-चाचियों को गये हुए घंटा भर ही हुआ था.
कॉलेज जाने में अब मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं रहा था. `उन्होंने' भी मुझसे उस बारे में बात नहें की. शय वो नहीं चाहते थे कि मैं कॉलेज  जाऊ.
मैंने फोन उठाकर स्क्रीन पर नजर डाली. वहां पर शशांक की मम्मी का नम्बर नजर आ रहा था. मैं कॉल रिसीव की-" हेल्लो."
" शादी मुबारक हो, बेटा."-बेहद गंभीर आवाज थी शशांक की मम्मी-मिसेज यादव- की.
मैं सन्न रह गयी.
मेरा हर सैंस सुन्न रह गया.
जुबान को लकवा मार गया था. मेरे अंदर जैसे गुबार-सा  उठा और मेरी आँखें छलक पड़ी. मेरी जुबान बामुश्किल हिली तो भर्राहटपूर्ण स्वर फूटा-"आंटी...."
" पलक, क्या हम मिल  सकते हैं?"-उनकी पूर्ववत्त गंभीर आवाज मेरे कानों में पड़ी.
" आंटी i realy am so sorry."-मेरी आवाज और ज्यादा भर्रा गयी.
" बेटा, क्या हम मिल सकते है?"-उन्होंने दोहराया-जैसे मेरी ओपोलोजाइज का उनपर कोई फर्क न पडा  हो.
"हाँ."-मैं फंसी-फंसी आवाज में बोली.
"कब?"
" आप इस वक्त कहाँ है?"
"घर पर."
" मैं आ रही हूँ."कहकर मैंने  फोन डिस्कनेक्ट कर दिया.
***
शार्प आधे घंटे में मैंने अपनी कार शशांक के घर के गेट के सामने ले जाकर रोकी.उस समय मैंने पिंक कलर का चूड़ीदार सूट पहना  हुआ था.हल्का-सा मेक-अप कर रखा था.मांग में सिन्दूर सजा रखा था. थोड़ी सी ज्यूरी भी पहन रखी थी.मिसेज यादव का सामना करते समय मैं बेहद नर्वस थी.
कार से उतरते हुए मेरी टांगें कांप रही थीं.
मैंने बड़ी मुश्किल  से खुद को काबू में रखा और कार लोक करके दरवाजे की तरफ  बढ़ी.बड़ी हिम्मत करके मैंने कांपती अंगुली से  दरवाजे की बैल पुश की तो घर्रर्र की आवाज ने मेरी चेतना पर चोट सी की.
दरवाजा खुला.
मेरी नजर उनकी नजर से मिली तो मैं उनकी नजर का सामना नहीं कर सकी. नर्वस भाव से  मैंने नजर झुका ली. उनकी समन्दर के बाटम से निकली- सी गम्भीर आवाज मेरे कानों में पड़ी-" आओ."
मैं उनके साथ अंदर गयी. 
वो मुझे ड्राइंग रूम में ले  गयी, सोफे पर बैठाया, और बोली-" क्या लोगी?"
मैं कुछ नहीं बोली.
नजर क्या सिर भी अपराधी की तरह झुका हुआ था.एक गुबार-सा मेरे अंदर उठा और मेरी आँखों से आंसू छक पड़े. वो चौंकी-"अरे!!!"
वो तुरंत- सोफे पर-मेरे करीब बैठ गयी. मेरा कन्धा थाम लिया-" क्या हुआ,पलक."
और....
लम्बे समय से मेरे अंदर दबा गुबार मनो फूट पड़ा. मैं एक  मासूम-सी  बच्ची की तरह उनसे  लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी. मिसेज यादव ने मुझे कसकर पकड़  अपनी बांहों में जकड़ लिया और मुझे सांत्वना देने लगी.
" आंटी,i nrealy am so sorry."-उनसे अलग होकर सुबकते हुए  र्मैने कहा-" सब कुछ एकदम से हो गया था."
" इट्स ओके बेटा."-मुझे सांत्वना देती हुई वो बोई-तो इसमें रोने वाली क्या बात है? मत रोओ. पर तुम्हे ये बात छिपानी नहीं चाहिए थी."
मैं कुछ नहीं बोली.
" देखो, लाइफ में बहुत कुछ हमारी एक्स्पेक्टेशन्सके विपरीत होता है."-वो बोली-"यूं चीजों को छिपाने से कुछ नहीं होता. जो हो गया  उसे एक्स्सेप्ट कर लेना चाहिए." 
मेरी रुलाई तो थम गयी थी, आँखों में आंसू तब भी थे.
तभी वो जरा से सावधान भाव से बोली-"शशांक को तो अभी कुछ नहीं बताया इस बारे में?" 
" नहीं."-मैंने भर्राए स्वर में बताया-" पा  के गुजर जाने के बाद दो-तीन बार ही बातें हुई हैं. नरसों ही शादी की बात ओपन हुई  थी. उसे बताने की हिम्मत मैं नहीं जुटा सकी."
" उसे अभी कुछ बताना भी मत"-वो बोली-"वो ट्रेनिंग पर  है. अभी उसे वहां ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. वो पाहि बार घर से दूर गया है. उसे अभी अगर तुम्हारी शादी की खबर  सुनकर झटका लगा तो वो संभल नहीं पायेगा. उसकी ट्रेनिंग खराब हो जाएगी. जब वो छुट्टी पर घर आएगा तो मैं खुद उसे सब बता दूँगी."
" जी."
"अब ये बताओ क्या लोगी."-वो तत्काल हमेशा की तरह अच्छी मेहमान नवाज की तरह बोली-"चाय लाऊँ या कोल्ड ड्रिंक?"
मैं ना करती रही तब भी वो मेरे लिए शरबत बना ही लायीं.
आधा-पौना घंटा तक हम सुख-दुःख की बातें करते रहे.तब मैं काफी संभल  भी गयी थी.बातें करते-करते अचानक उनका ध्यान मेरी गर्दन पर गया-जहां बेध्यानी में मेरी चुनरी ढलक गयी थी.
"पलक  बेटा तुम्हारा मंगलसूत्र कहाँ है?"-वो चौंककर बोली.
मैं हडबड़ाई.बेसख्ता ही मेरा ध्यान अपनी गर्दन पर गया. वहां मंगसूत्र था ही नहीं.
" अ-अ-आंटी,वो-" मुझे जवाब नहीं सूझा-" म-मंगलसूत्र...."-तब मेरी समझ में वो जवाब आया. वही जवाब दे दिया-"म-म-मैं पहनना भूल गयी."
"ओह!"-वो बेसाख्ता ही मुस्कुरा पड़ीं-" समझी.`उस वक्त' चुभता होगा......बट सुबह के वक्त तो पहन लेना चाहिए."
किस वक्त?
मैं उलझी. पर तब भी कह  दिया-"हाँ-हाँ, बहुत चुभता है."
उनकी मुस्कान और ज्यादा चंचल और अर्थपूर्ण हो गयी-"जाते ही पहन  लेना." 
" जी, जरूर."-मैंने कहा.
***
घर लौटते समय मैं उलझी  रही.
किस वक्त?
किस`उस वक्त' की ओर इशारा  कर रही थीं  मिसेज यादव?
घर जाकर बिस्तर को देखकर मेरी समझ में `उस वक्त' का मतलब आया  तो मेरा चेहरा ह्या  से तप गया.बदन में करंट-सा दौड़ गया.
***
शाम को तकरीबन ४ बजे मैंने रियलाइज किया कि `उनका' सुबह से ही कोई पता नहीं था. वो नाश्ता करके निकले  थे. मैं शशांक के घर से आकर सो गयी थी. शाम को ४ बजे जगी तो उनका कोई पता नहीं था मैं बैडरूम से  निकलकर नीचे हॉल में आ गयी. वहां मुझे कोई नजर नहीं आया.
" शब्बो आंटी."-मैंने पुकारा 
मेरी आवाज सन्नाटे में प्रतिध्वनित होकर वापिस मेरे कानों में पड़ी. घर कि दूसररी नौकरानी(चंपा)- जिसका काम साफ़-सफाई था-एक कमरे से बाहर निकली-"जी मेम साहब."
" शब्बो  आंटी कहाँ है?"-मैंने पुछा.
 " जी वो तो अपना सामान लेने  के लिए अपने घर गयी है."-चम्पा ने बताया-" आने ही वाली होंगी."
" और तुम्हारे साहब का कुछ पता  है?"-मैने पूछा.
" जी, मुझे क्या पता होगा."-वो इनोसेंट भाव से बोली-" ये तो आपको पता होना चाहिए-वो कहाँ है?"
मेरे दिल  में कांटा-सा चुभा.
 सच कहा था उसने- मुझे पता होना चाहिए .
जबकि मुझे नहीं पता था.
मैं अपने बैडरूम में गयी. 
कहाँ गये होंगे वो ??
अपनी गर्लफ्रेंड  के पास?
मैं बैड पर हारी-सी बैठ गयी.
फोन करना चाहती थी लेकिन मेरे पास उनका नम्बर तक नहीं था. संभव था उनका  नम्बर शबनम आंटी या दूसरे नौकर के पास हो लेकिन मैं अपने हसबैंड का नम्बर उनमे से किसी के मांगती तो मेरे लिए ही शर्म की बात थी. 
कहाँ से हासिल करूं उनका  नम्बर?
तभी मेरा ध्यान पापा के मोबाइल की तरफ गया,जो पापा के गुजर जाने के बाद से मेरे कबर्ड में रखा था. मैंने कबर्ड खोलकर मोबाइल  निकला. उसे देखा तो  वो बैटरी खत्म हो जाने की वजह से बंद पड़ा था. वो मेरे लिए कोई परेशानी वाली बात नहीं थी. मेरा और पापा का फोन एक ही कम्पनीऔर मोडल  के थे.मैंने अपने फोन की बैटरी  पापा के फोन में लगाई और फोन तुरंत चालू हो गया. मैंने मोबाइल  से की फोनबुक से `उनका' नम्बर निकाला और डायल  कर दिया.
बैल  जाने लगी.
काल रिसीव की गयी तो ट्रैफिक  की आवाजें साफ-साफ़ मेरे कान में पड़ने लगी.कहा गया-" हेल्लो."
" हेल्लो."-मैंने कहा-"मैं पलक..."
"हाँ बोलिए"- ट्रैफिक की आवाज के बीच उनका स्वर उभरा-" मुझे पता है आप ही होंगी. सर का फोन आपके ही पास है." 
मेरे मन में उनका-`आपकांटे की तरह चुभा. चुभता तो पहले भी था लेकिन पहले मैं तब की तरह झल्लाती नहीं थी. कसमसाई. आवाज को संभाकर मैंने पूछा-"कहां पर है आप?"
" बाहर हूँ."
" कम से कम बताकर तो जाना कहिये था."-मैंने रोषपूर्ण स्वर में कहा-" आप बिना बताये ही चले गये."
" सॉरी......मैं लौट रहा हूँ." 
" इस वक्त कहाँ हो?"
" बेगमपुल पर हूँ."-उन्होंने बताया-"कुछ  काम था?"
" आ जाइए ."-मैंने कहा.-"मैं चाय बना रही हूँ.....आप सीधे  घर ही आ रहे हैं न?"
"हाँ."
मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया.
***
मैं किचन में गयी और चाय बनाने लगी.
उस वक्त मैं रोज -ट्यूशन से आकर या छुट्टी के इन सोकर उठने के बाद- चाय पीती थी.मुझे नहीं पता था वो भी उस वक्त चाय पीते  थे या नहीं. फिर भी मैंने उनके लिए भी  चाय का पानी चढ़ा दिया.
बेगमपुल से साकेत तक आने में वक्त ही इतना लगता है.जब तक  मैंने चाय तैयार की तब तक वो भी आ गये. मैं दोनों की चाय अपने बैडरूम की बालकनी में ले गयी. उन्हें भी वहीं बुला लिया. वो जब वहां आये तो उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वो बघा बोर्डर पार करके पाकिस्तान में एंट्री ले रहे हों.
"आइये."-मैंने मेजबान वाला पूरा फर्ज निभाया-"बैठिये."
बालनी में दो  लोंजचेयर  पड़ी हुई थीं. हम दोनों उन्हीं पर बैठ गये. मैंने उन्हें चाय दी.
" आप कहाँ चले गये थे?"-मैंने पूछा-"बताकर  तो जाना चाहिए था."
" ऑफिस चला गया था."-उन्होंने बताया-"कई आम बाकी बचे थे. उनको निबटाना भी था."
" ओह."- मेरे  मूंह से निकला, साथ ही मैंने पूछा-" लंच कर लिया?"
" हाँ. टी.पी.नगर मैं ही कर लिया था."
" होटल में?"
"हाँ."
" कल से आपका  लंच घर से जाया करेगा ."-मैंने कहा.-" पा के टाइम में हमेशा ही खाना घर से जाता था."
"आप मेरे बारे में फ़िक्र  मत करो."-वो बोले-"मैं एजेस्ट कर लूँगा."
मेरे मन में आया की उनकी फेमिली के  बारे में बात करूं लेकिन नहीं की.पता नहीं क्यों मुझे लगा -वो मुझे शय कुछ न बताएं.
मैंने किसी मुद्दे पर बहस करने  के बजाए चुप रहना ही बेहतर समझा.चाय का सिप लेते  हुए मैने हिचकिचाते हुए कहा.(मेरा इरादा मंगलसूत्र के बारे में बात छेड़ने का था.कोई तो सूत्र पकड़ना था ही न)-"व्-व्-व्-वो म-म-मैं आज श-श-श-शशांक के घर गयी थी."
"शशांक?"-वो उलझे.
"श-श-शशांक, मेरा क्लासमेट ...."
"ओह हाँ. आपका बॉयफ्रेंड."-एकदम सहज भाव से  वो बोले-"उसे बताया दिया  इस बारे में ?"
मैंने इंकार में सिर हिला दिया.
"बता दो."-वो बोले-"साथ ही सिच्वेशन भी समझा दीजिये."
" आपने अपनी गर्लफ्रेंड को बता दिया?"
"हाँ"-उन्होंने कंधे उचका दिए-"यही बेस्ट तरीका था." 
मेरे मन को मानों उन्होंने बेरहमी के साथ मुठ्ठी में भींच दिया हो.अपनी तडप छिपाने के लिए मैं बालकनी के बाहर  लान की तरफ देखने लगी .
***
रात हो गयी.
तब तक शबनम आंटी अपने पति के साथ सामान लेकर आ गयी थीं.
बंगले में ही बने सर्वेंट क्वार्टर में  उन्हें रखा गया.एक में चौकीदार का सामान रखा हुआ था, दूसरे में शबनम  आंटी अपने पति के साथ  सेटल  हो गयी थीं.उनका एक बाईससाल का बेटा था, जो शादी-शुदा था, खराद का काम करता था और उनसे अलग रहता था. तकरीबन बीस साल की बेटी थी. वो भी शादी-शुदा थी. उसकी शादी को ज्यादा टाइम नहीं हुआ था, अपनी शादी से पहले वो-जब शबनम आंटी बीमार होती थीं तो हिना( उसका ये ही नाम है.) काम पर आ जाती थी.
गौरे रंग की हिना खासी खूबसूरत थी.चंचल  थी.
दसवी तक पढ़ी थी.मुझसे बहुत बार कहानियों वगैरह की किताबे  मांगकर ले जाती थी, पढकर लौटा भी जाती थी.
डिनर  मैंने और शबनम आंटी ने साथ मिलकर  बनाया.खाना जब बनकर तैयार हो गया तो मों बोली-"आंटी आप खाना टेबल और लगा दो तब तक मैं नहा लेती हूँ.गर्मी से बुरा हाल हो रहा है."
" टेबिल पर क्यूँ?"-आंटी हैरानी से बोली-"बेबी खाना तो मैं कमरे में ही भिजवा देती हूँ ना.अब कौन-सा आपके अब्बाजानी आप दोनों के साथ खाना खाने वाले हैं.आराम से एक दूसरे को खिलाते हुए खाना"-खाते समय उनका स्वर शरारतपूर्ण हो गया था.
मैं इनकार न कर सकी.
मन में जब चोर हो तो प्रतिवाद कम ही किया जाता है.
मैं बैडरूम में जाकर फटाफट नहाई.बाथरूम में ही कपड़े बदलकर बाहर निकली. उस समय बालों का जुदा बना लिया था.
मैं बैडरूम में पहुंची तो शबनम आंटी ट्राली में डिनर कमरे में छोडकर कमरे से बाहर जा रही थी.तब कमरे में वो नहीं थे. खान थे-पता नहीं.
" शब्बो आंटी."-मैंने उन्हें  पुकारा-"वो कहाँ  है?"
" शायद अपने कमरे में है."-वो बोली-"कुछ काम कर रहे हैं."
मैं समझ गयी कि उनका इशारा टॉप फ्लोर वाले कमरे की तरफ था-जहां `उनका'  सामान  रखा हुआ  था.
" जरा उन्हें भी यहाँ  भेज दो."-मैं कहकर तौलिये से मूंह पोंछने  लगी. 
जब वो चली गयीं तो मेरा ध्यान खाने पर गया.
खाने में सब्जी मात्र एक ही कटोरी  में थी. एक डोंगे हमेशा कि तरह और भी सब्जी थी  ताकि कटोरी खत्म होने पर उसमे से और सब्जी ली जा सके.
मैं तुरंत दौड़ती हुई बाहर गयी और पुकारा-"शब्बो आंटी, दूसरी कटोरी कहाँ  है?"
" दूसरी किसके लिए?"
"`उनके' लिए ."
"ये उनके लिए ही तो है."-वो मुस्कुराईं.
" और मैं......"-मैं चौंकी-"मैं किसमे खाऊँगी?"
" उसी में. उनके साथ."-वो शरारत से बोलीं-"साथ खाना से प्यार बढ़ता है, बेबी."
मैं कसमसाकर रह गयी.
वो चली गयी.
फिर मैंने गहरी साँस ली. आह-सी मन में फूटी.शब्बो आंटी गलत भी नहीं थी.दम्पत्ति यूं खाना खाते  भी हैं.
पर हम दंपत्ति थे ही कहाँ.
`वो' आये.
" खाना खा लीजिये."-मैंने कहा.
" यहीं."
" हाँ."-मैंने अपनी उन्गियाँ चटकाते हुए विवश भाव से कहा-"आंटी खाना यहीं रखा गयीं हैं........i think हमे आज रात भी इसी रूम में सोना भी पड़ेगा."
" दूसरी कटोरी नहीं है?"
" वो देकर गयी ही नहीं है.-मैने विवशता जाहिर की.
"ओह!"-वो  माथा खुजलाने लगे. एकदम सुसंयत. सोचने वाले भाव उने चेहरे उभरे और चंद पलों के बाद बोले-"शब्बो आंटी अपने क्वार्टर में गयीं?"
"हां, शायद."
" आप किचन में से एक कटोरी ले आओ."-वो बोले-" उन्हें कुछ पता नहीं चलेगा."
"पर फ्यूचर में क्या करेंगे?"
" कल से डाइनिंग टेबल पर ही खाना लगवाना."-उन्होंने हिदायत दी-"वहां अलग-अलग ही खाना खाया जायेगा."
"जी."
"अगर वो एक साथ खाना खाने पर जोर दें तो कह देना-`आंटी जी , हमे किस तरह प्या बढ़ाना है हमे पता है.वैसे भी एक कटोरी में खाना खाने में दिक्कत  होती है. सब्जी बहुत साड़ी बिखरकर खराब हो जाती है."
" जी."-कहकर में बैडरूम से बाहर निकल गयी.
***
डिनर के बाद वो वापिस जाने लगे तो मैंने पीछे से टोका-"कहाँ जा रहे हो?"
" अ-अपने बैडरूम में."-वो इनोसेंट भाव से बोले-"क्यों ?"
" शब्बो आंटी कोम क्या जवाब देंगे ?"-मैं फिर नर्वस हो गयी.
"उन्हें क्या पता चल रहा है ???"-वो बोले-"वो तो क्वार्टर में सोएंगी न."
"वो सुबह चार बजे जाग जाती हैं."-मैंने बताया-"जब मैं बीमार हुई थी तब वो मेरे साथ रही थीं.वो रोज चार बजे जाग जाती हैं और नमाज पढ़ती हैं."
"क्या करें?"-वो उलझनपूर्ण भाव से बुदबुदाए.
मैंने कंधे झटक दिए और बालकनी की तरफ बढ़ गयी . बालकनी में जाकर शबनम आंटी का का क्वार्टर साफ़ नजर आता है. क्वार्टर से भी बालकनी  साफ़ नजर आती है.
मैं बालकनी की रेलिंग के पास खड़ी हो गयी.
रात के वक्त हवाएं थोड़ी सी मखमली हो गयीं थी. मेरे बदन को जैसे बड़ी कोंलता से सहला रही थी.मैंने अपने धड का अगला हिस्सा- पेट- को रेलिंग   के  सहारे टिका दिया और अपनी बांहों को अपने वक्ष पर कैंची बनाकर समेटकर बांध लिया. एक  लम्बी साँस ली.
" do u trust me."-उनका देहद गंभीर स्वर मेरे कानों में पीछे कहीं पास से सुनाई पड़ा.
"हाँ."-मैं बोली.
"किंगसाइज बैड पर बीच में तकिये रखकर उसे सेपरेट करके आराम से सोया जा सकता है."-वो बोले.उनकी बिखरी सांसों का शोर मेरे कान के बेहजद पास था.  मुझे महसूस हो रहा था वो मुझसे मात्र चाँद इंच की दूरी पर, मेरे पीछे खड़े थे -"यकीन करो.आप मेरे लिए किसी की अमानत हो.अमानत में खयानत नहीं करूंगा."
मैंने कोई  जवाब नहीं दिया.
मैंने महसूस किया वो वहां से हट गये थे क्योंकि हवाओं की बेहद मद्धम सरसराहट में घुला उनकी सांसो का शोर लुप्त हो गया था 
मैं घूमी.
देखा-वो बैडरूम में नहीं थे.
कहाँ चले गये?
अगले ही पल मैं समझ गयी कि वो जरूर टॉप फ्लोर पर अपने रूम में चले हए होंगे.
***
मैं वहां गयी.
वो चेयर के हत्थे पर अपने बम टिकाकर किसी स्क्रिप्ट के पन्ने पलटकर-पलटकर देख रहे थे. 
ये दूसरा मौका था जब मैं उनकी मौजूदगी में आई थी.पहली बार गुस्से  में थी साथ ही नर्वस भी थी.तब मैं केवल नर्वस थी. अंदर जाते ही अपनी चुनरी का कौन अपनी तर्जनी अंगुली पर लपेटना शुरू कर दिया.
"अरे आप...."-वो मुझे देखकर चौंके.
"आप यहाँ क्यों चले आये?"-मैंने पूछा.
"थोडा-सा काम था."-उन्होंने बताया-"अभी मैं उसे निबटाना चाहता हूँ. आप आराम कीजिये."
"कब तक आओगे?"
" dont know.....may be- दो-तीन घंटे लग जायेंगे."
"ओह!"-मैं वापिस लौटने के लिए मुड गयी.
***
मैंने बिस्तर के बीच में दो तकिये लाइन से लगा दिए.
वो हमारे लिए बर्लिन की दीवार ही थी. मैंने लाईट बंद करनी जरूरी नहीं समझी.हमेशा मैं नेति पहनकर सोती थी, उस  कुरते -सलवार में  ही सो गयी पिछले रात भी यूं ही सोयी थी बसबाथरूम में जाकर मैंने ब्रा को उतर दिया था. सोते वक्त ब्रा तो मैं हमेशा ही उतर देती थी.(अब तो ये नेक काम `वो'ही करते है.)
मैं बिस्तर पर लेटी. चुनरी से गले से नीचे वक्ष कवर कर लिया.
मैं करवटें बदलती रही मगर कमबख्त नींद थी की आने का नाम नही ले रही थी.
वो रात को वहां आये  ही नहीं. 
रात के ढाई-तीन बजे तक तो मैं जागती रही थी, उसके बाद पता नहीं कब मुझे नींद ने दबोच लिया 

Wednesday, April 6, 2011

love diary 4

अध्याय-१० 
उसी रात को.
मैं बिस्तर पर- तकिया अपने अंक में दबोचे- रजाई में पड़ी हुई थी जब फोन बजा.मैंने फोन उठाया,जो बिस्तर के हेडबोर्ड पर रखा हुआ था.स्क्रीन पर लुक दी तो उसपर शशांक का नम्बर फ्लैश होता पाया.
मेरा दिल धड़का.
घडी को लुक दी.
वो रात के सवा दस बजा रही थी.
" हेल्लो."-मैंने कॉल रिसीव की.
अपनी आवाज को सुसंयत रखा.
" hi, how  r u?"-शशांक का स्वर मेरे कान में पड़ा.
"fine."-मैंने कहा-" इस वक्त कहाँ हो?"
" ट्रेन में. दिल्ली से चल चुका हूँ."
"ओह"
"नाराज हो?"
मेरा दिल  धक् से रह गया.
"क-क- किस लिए?"
"दोपहर वाली हरकत के लिए."
"that was ok"-मैने अपना लहजा नॉर्मल रखा-"कुछ गलत हो जाता तो सचमुच गलत होता "
दूसरी तरफ ख़ामोशी  छा गयी.
चंद पलों की ख़ामोशी के बाद शशांक ने कहा-"पलक, मम्मी तुमसे मिलना चाहती हैं."
"क्यों ?"
"she want to talk to u."
" किस बारे में?"
" हमारे बारे में."
मेरी सांसे थम-सी गयी मानो.समूचा बदन कांपकर रह गया. शशांक लगातार खता चला जा रहा था-" पलक, कल किसी समय उनसे फोन करके ये बता देना कब पहुँच रही हो? एक बार उनसे मिल जरूर लेना"
"ओ.के."-मैंने बस इतना ही कहा.
***
घर्रर्र..घर्रर्र.
मैने जब शशांक के घर की डोरबैल बजाई तो मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था.मैं कॉलेज से सीधी वहीं गयी थी.दरवाजा शशांक की मम्मी ने यानी मिसेज संजना यादव ने ही खोला था.
वो मुझे देखते ही चहकी-"ओह, आ गयी तुम.............कम-इन"
वो मुझे लीविंग में में ले गयी.वहां मुझे उन्होंने बड़ी ही मुहब्बत से बैठाया. मुहे चाय दी. चाय के साथ इतने स्नैक्स लाकर दे दिए कि लंच की जरूरत ही खत्म ही गयी.उस दौरान मेरी नजर फर्श में ही धंसी रही.मिसेज यादव ने ही बात कि शुरुआत की-"कल तुम इतनी जल्दी क्यों चली गयी थी?"
" जी, घर से आये काफी देर हो गयी थी."-मैंने नजर झुकाकर कहा-"जब आप आई थी तो मैं जा रही थी."
"तो थोड़ी देर और रुक जाती."-मेरे चेहरे पर नजर शार्प करके टिकाते हुए कहा-"कम-से-कम इतनी तो रेस्पेक्ट तो करनी थी. अगर मैं रोक रही थी तो रुकना था. कुछ देर बातचीत करती तो मुझे तसल्ली हो जाती."
"सॉरी आंटी."-मैं सकपकाई-" ऐसी बात नहीं है कि मेरा मन आपसे बात करने का  नहीं था.बट,तब मुझे जल्दी घर जाना था."
"क्यों?"-उनकी नजर और शार्प हो गयी.
"ज-जी...व्-व्-व्-वो काम था."-मैंने बहाना बनाया. 
मगर वो बेहद शार्प थी.बोली-" काम था या मुझे फेस करने की हिम्मत नहीं थी."
"जी!"-मैं सन्न रह गयी.
झटके से उनकी तरफ देखा.
उनका चेहरा कोरे कागज कि तरह सपाट था.वो लगातार मेरी ओर देखे जा रही थीं मानो मेरे अंदर की उथल-पुथल की गति को माप रही हो.
"आंटी,"-मैं मिमियाई-"आप गलत समझ रही हैं.हम कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे."
"तो क्या कर रहे थे?"
"just chating."
वो हौले-से हंसी-"ohh....reaaallly.....अभी तो तुम कह रही थी कि तुम बस जा रही थी."
" म-म-म-मैं..."-मैं बुरी तरह बौखलाई. मूंह में जैसे दही जम गयी थी. हालत रंगे हाथो पकडे गये चोर कि तरह हो गयी जिसने कोतवाल को ही नहीं जज को भी सामने देख लिया हो.
वो फिर गम्भीर हो गयी-" सच बताओ ,कल कुछ हुआ था ना तुम दोनों के बीच ?"
"थेंक्स टू यू आंटी कि होते-होते बच गया."-मेरे मूंह से बेसाख्ता ही निकल गया.आवाज में तब भी मिमियाहट थी-" बिलीव मी आंटी मेरा वैस इरादा नहीं था.अगर मुझे पता होता कि ऐसी नौबत आ सकती है तो या तो मैं यहाँ आती ही नहीं या नेहा के साथ ही चली जाती."
" शशांक को पसंद करती हो?"-उनके होंठो पर वात्सल्यपूर्ण मुस्कान खेल गयी 
मेरा मुखड़ा बरबस ही सिन्दूरी हो उठा.
मैं समझ तो  पिछली रात को ही गयी थी कि वो हमारे रिश्ते के लिए रजामंद थी-तब प्रूफ भी मिल गया था. 
सोफे पर वो  मेरे और पास को खिसकीं.
ह्या के बोझ के कारण मेरी पलकें और झुक  गयी थी.   नजर फर्श में और धंस गयी. शहद की सी मिठास से भरे स्वर मे उन्होंने फिर सवाल किया-" शादी करोगी शशांक से??????"
"आंटी........इस ब-बारे में पा ही तय कर सकते है."-मैंने कांपती हुई आवाज में, नजर झुकाए  हुए ही कहा-" मैं उनसे बाहर नहीं जा सकती."
" हम लोग तुम्हारे पापा से बात करेंगे."-वो लाड से मेरी ठोड़ी थामकर अपनी ओर घुमाकर मेरा चेहरा ऊपर करती हुई बोलीं-" हम्म्म्म,वैसे भी मेरे बेटे ने हीरा पसंद किया  है, तुम्हे हाथ से कैसे जाने दू? तुम फ़िक्र मत करो-मुझे लगता है हम तुम्हारे पापा को आराम से मना लेंगे."
मेरी पलकें जरा-सी ऊपर नहीं उठीं.
मेरी रग-रग में बिजली-सी  दौड़ रही थी.
एक मधुर संगीत-सा मेरे कानों में गूंजने लगा था.मेर चेहरे को देखती हुई वो बोली-" सच, शर्माती हुई कितनी खूबसूरत लगती हो तुम-ऐसा लगता है जैसे पूर्णिमा का चाँद सिन्दूर में नहाकर मेरे सामने आकर बैठ गया हो."
शर्म की वजह  से जब मैं उनकी नजर का सामना ना कर सकी तो उनसे लिपट गयी.
एक वात्सल्यमयी माँ की तरह उन्होंने मुझे अपने अंक में समेट लिया.साथ ही बोली-" सुनो, हम चाहते है जब वो ट्रेनिंग पूरी कर ले तो शादी की बात हम आगे बढाएं. फिर भी- अगर तुम लोगों के बीच `वैसा' कुछ हो जाए-जो कल होते-होते रह गया -  तो बता देना. हम तुरंत शादी करवा देंगे."
" अब मैं वैसी नौबत ही नहीं आने दूँगी."- मैं बुदबुदाई 
***
मैं शशंक के घर से सीधी अपने घर मेरे पैरों में पंख लग गए थे जैसे.
 मैं ड्राइंगरूम में, किताबें सम्भाले, दौड़ती हुई सीढ़ियों की तरफ भागी जा रही थी.तो कहीं पीछे से शबनम आंटी की आवाज उभरी-" बेबी अब तक कहाँ थी? खाना लगा हूँ?"
" नहीं आंटी."-मैंने पीछे मुड़े बिना, अपनी स्पीड कम किये बिना ही, कहा-" मुझे भूख नहीं है आंटी.लगेगी तो खुद  खाना मांग लूंगी. "
ओर मैं कुलांचे भर्ती हुई सीढ़ियों पर चढ़ती चली गयी.
***
अपने रूम में पहुंचते ही मैंने किताबे अपनी स्टडी टेबल पर फेंकी और पर्स में से मोबाइल निकालकर नेहा का नम्बर डायल  किया और अपन बैडरूम की बालकनी की तरफ बढ़ गयी. दूसरी तरफ बैल जा रही थी. ख़ुशी के कारण मेरा बुरा हाल था उसे मैं नेहा से शेयर करना चाहती थी लेकिन पता नहीं वो कहाँ पर चली गयी थी कि फोन नहीं  उठा रही थी.
खैर.
उसने फोन उठाया, कॉल रिसीव  की-" हेल्लो."
" कहाँ मर गयी थी?"-मैं भुनभुनाई-" इनी देर से कॉल कर रही हूँ. फोन क्यों नहीं उठती?"
" टायलेट गयी थी, यार. तू क्यों तडप रही है? क्या बात है?"
बालकनी की रेलिंग थामकर मैंने पूर्ववत्त उत्तेजित स्वर में कहा-"ख़ास बात ही तो है, स्टुपिड. बहुत ख़ास बात है -तभी तो आते ही तुझे फोन किया."
" क्या बात है?"-उसने रस लेते हुए कहा-" तेरा एंग्री यंगमैन  सुपरमैन बनकर उड़ने लगा है क्या?"
" वाट रबिश"- मैं भन्ना उठी.-" माइंड योर लेंग्वेज . वो मेरा नहीं हैं. उससे मेरा कोई रिश्ता नहीं है."
" तो क्या ख़ास बात है?"
"यूं नो....मैं अभी शशांक के घर से आ रही हूँ."
" अच्छा, क्यों गयी थी?"
" उसकी ममा ने बुलाया था."-मैंने चहकते हुए बताया-" एक्चुली , कल रात को शशंक का फोन आया था. वो तब ट्रेन में ट्रेवल कर रहा था-उसी ने कहा था -आज मैं उसके घर जाकर उसकी ममा से मिल लूं ."
" ओह! but why?"
" क्योंकि, वो हमारी शादी  के लिए रजामंद हैं. इडियट ."-मैं ख़ुशी से चीख ही पड़ी थी उस बार-"वो शशांक की ट्रेनिंग खत्म ही जाने के बाद हमारी शादी करवा देने को कहा रही थी........"-उसी पल आगे के शब्द मानो मेरे हलक में ही घुटकर रह गये. जुबान को मनो लकवा मार गया हो. शरीर में सर्द सनसनी-सी दौड़ गयी.
नीचे...........मेरी बालकनी के ठीक नीचे झूले पर `वो'  लेते हुए थे. उनका चेहरा ऊपर की तरफ ही था. एकटक मेरी ओर देखे जा रहे थे.
नो डाउट, वो मेरी सारी बातें सुन चुके थे.
मैं  तत्काल पीछे हट गयी.
" पलक, क्या हुआ?"-दूसरी तरफ से नेहा की आवाज उभरी.
"गडबड हो गयी, नेहा"-मैंने नर्वस स्वर में कहा-"उसने सब सुन लिया है ."
" किसने?"
"एंग्री यंगमैन ने."
" पर वो इस वक्त वहां क्या कर रहा है?"-नेहा की आवाज में मुझे उलझन साफ़ महसूस हो रही थी-"उसे तो इस वक्त तेरे पापा के साथ में फर्म में होना चाहिए."
" अरे!!!!!!!!"-मई भी उलझ गयी-"हाँ, उसे तो फर्म में होना चाहिए"
***
कुछ भी हो-पर रायता तो बिखर चुका था.
और मैं बेचैन भी हो चुकी थी.
मुझे यकीन था- वो ये बात पापा को जरूर बता देने वाले थे. यदि पापा को पता चल जाता तो पता नहीं वो क्या सोचेंगे? कैसे रिएक्ट करते?
या ये भी हो सकता था कि टिपिकल  भारतीय पापा की तरह बेटी के अफेयर  की बात सुनकर कोई लड़का अपनी बिरादरी में देखते और मेरा हाथ उसके हाथमे दे देते.
अभी शशांक शादी करने के लिए शादी के लिहाज से तो बालिग तक नहीं था.हम दोनों अठारह के उसी साल हुए थे - सो उसे शादी करने के लिए कानूनन दो साल और इन्तजार करना था.
क्या करूं?
इसी उलझन में मैं दसियों मिनट तक बैडरूम में अपनी अगुलियों को मरोड़ती हुई, इधर-उधर चक्कर लगती रही.फिर मैं निर्णयात्मक लहजे में अपने रूम से बाहर निकली और डाउन- स्टेयर्स ड्राइंग-हाल में आ गयी. मुझे वहीं शबनम आंटी मिल गयी. मैंने उन्हीं से सवाल किया-"शब्बो आंटी, ये पा के असिस्टेंट यहाँ क्या कर रहे हैं???"
" कुछ तबीयत वगैरा ठीक नहीं है."-शबनम आंटी ने बताया-"इसी वजह से जल्दी आ गया है....आपको खाना खाना है?"
"नहीं"-मैं उग्द्वेलित भाव से बोली-"पर आपको ये तो बताना ही चाहिए था ना कि घर में वो हैं."
" क्यों"-वो चौंकीं-"कोई गडबड वगैरा की उसने??? बताओ...."-कहते-कहते उनका स्वर उत्तेजना से भरता चला गया.
ohhh hell.
फिर रायता फ़ैल जाने वाला था.
मैं तत्काल  बोली-"no-no there is nothing like like that.everything is fine nd dont tell anything to Pa."
और मैं वहां से भी चल दी.
वो समझी या नहीं, मैंने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की.ना ही उनकी रिएक्शन पर ध्यान दिया.मेरा टार्गेट लान था. 
***
मैं लान में पहुंची तो लान मुझे मूंह चिढाता हुआ-सा महसूस हुआ.`वो' वहां नहीं थे.
कहाँ गये?
शायद कहीं बहार चले गये हों.
नहीं,अगर तबीयत खराब है तो कहीं नहीं जायेंगे.
इसका मतलब `वो' अपने बैडरूम में होंगे.
दिम्माग ने साथ ही सलाह दी-नहीं, अभी नहीं. शबनम आंटी  को तो वैसे भी  शक हो गया है.मई ऊपर जाऊंगी तो शक पक्का हो जायेगा. उन्होंने अगर कुछ सुन लिया तो दुबारा रायता फ़ैल जायेगा.
सो मैंने तत्काल जाने का इरादा कैंसिल लर दिया. और लान में ही झूले पर लेट गयी.
***
मई घंटे भर बाद घर के टॉप फ्लोर पर गयी.
वहीं-जहां उनका रूम था.मैंने रूम में झाँका तो वो मुझे कमरे के अंदर स्टडी टेबल पर लैपटॉप रखकर कुछ काम कर रहे  थे.मैंने अंदर कदम रखा. मेरे कदमों की आहट सुनकर उन्होंने मुझे लुक दी. माथे की मांसपेशियों में सलवटें पड़ी.
" i want tom talk to you."-मैंने निर्णयात्मक भाव से कहा.
" कहिये."
" आप पा को कुछ नहीं बतायेंगे."-मैंने अपना स्वर कडा  किया जो मुझे कांपता हुआ महसूस हो रहा था.
" किस बारे में?"
" oh don't  try to be such innocent."-मैं  भन्नाई-" i know-आपने मेरी बातें सुन ली थीं."
" so?"
" आप प्लीज इस बारे में पा को उछ मत बताना."-अचानक मेरा लहजा विनतीपूर्ण हो गया. मैं और आगे बढ़ी. उनके पास पड़ी कुर्सी अधिकारपूर्ण भाव से बैठ गयी.बैठने के बाद विनीत भाव  से अपनी बात को आगे बढाया -"i know - अपने सब सुन लिया था. जहाँ आप लेते हुए थे वहां से बालकनी हो रही बातें साफ़ सुनाई देती है. वैसे भी मैं धीमी आवाज में बात नहीं कर रही थी."
मैं चुप हो गयी.
`वो' लगातार मुझे देखे जा रहे थे. एकटक.
" उससे आपका अफेयर कब से है?"उनके होठ हिले.
"कभी से भी नहीं"-मैंने बताया-" उसने मुझे प्रपोज किया था. कल ही वो एन.डी. ए. की ट्रेनिंग के लिए चला गया है."
" कौन है वो?"
"please mind your bussiness"-मैं भन्नाई-"you are not my Paa.okkk. मैं आपसे बस ये कहना चाहती हूँ कि पा को आप इस बारे में कुछ मत बताना. उसके परिवार वाले अपने आप बात चलाएंगे. यूं भी वक्त से पहले बात शुरू करने का क्या फायदा?" 
" अगर आपके पापा इस रिश्ते के लिए नहीं माने तो?"
" मुझे लगता है मान जायेंगे. वो अच्छा लड़का है."-मैंने आत्मविश्वास से कहा-"वैसे भी मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली कि पा को सिर झुकाना पड़े. और किसी को प्यार करना गलत भी कहाँ है? आप भी तो प्यार करते है."
" म-म-म-मैं....."-वो बौखलाए.
"yaa....मुझे पता है आपका सीन चल रहा है."-मैंने उन्हें स्पैल में लेने की कोशिश की.-" नेहा ने आपको और आपकी गर्लफ्रैंड को  गांधीबाग  में देखा था. तभी मुझे फोन कर दिया था."
" ओह!"-वो बरबस ही मुस्कुराए-" तो आप मुझे इस बारे में ब्लैकमेल करना चाहती हैं."
"no-no."-तत्काल मैंने कहा-"मेरा ऐसा इरादा  नहीं है. i just want to say- मैं कुछ गलत नहीं कर रही. किसी को चाहना गलत नहीं है."
" हाँ, पता है."-वो कोरे कागज की  तरह सपाट भाव से बोले-"मैं आपका कोई नहीं फिर भी एक दोस्त की हैसियत से सलाह दे रहा हूँ- कोई ऐसा काम `हरकत' मत करना कि तुम्हे पछताना पड़े.बच्चे अगर अपनी मर्जी से कोई गलत काम करें जिससे उन्हें कोई फायद हो तो या ज़रा  भी नुक्सान न हो तो माँ-बाप जानकर भी नैग्लेक्ट कर देते है. तुम, एक लडकी हो. अगर कुछ भी गलत हुआ तो इसका नुकसान सबसे ज्यादा तुम्हे होगा.बाद में भला ही शादी भी हो जाये."
" आप मुझे गलत समझ रहे है."-मैं अंदर-ही-अंदर तडपी-" मैं  उस तरह की लड़की नहीं हूँ. i know- सही क्या है गलत क्या है."
" तुम--i mean- आप समझदार लगती भी है."-  तब वो हौले-से मुस्कुराए-"आपके पापा आपकी बहुत तारीफ करते है."
" तो मैं मान लूं कि आप इस बारे में पाको कुछ नहीं बताने वाले ?"
" नहीं ."- उन्होंने मुझे आश्वासन दिया-" यकीन करो मैं नहीं बताऊंगा पर आपको भी समझना होगा कि आपकी एक गलती आपके पापा का सारा गुरूर तोड़ देगी."
मुझे सुकून मिला -मन जरा सा बेचैन भी हो गया.
मन में डर भी पैदा हो गया कहीं ये जानकर हर्ट न अहो जाये कि उनकी बेटी किसी लड़के में इन्वोल्व है.
अध्याय- ११ 
इसका मतलब ये बिलकुल नहीं था कि-मैंने उनके कहने से ही खुद को आश्वस्त कर  लिया था.
तब भी मेरे मन में अवश्य था कि सम्भव था कि पापा को उस बारे में बता देते. एट लीस्ट `वो' पापा का चमचे थे.
मैंने कई दिनों तक पापा के बिहेव पर बारीकी से नजर रखी ताकि पापा के मन में चल रही असामान्य हलचल को भांप सकूं.काफी कोशिश के बाद भी मैं वैसा नहीं कर सकी.मुझे कोई हलचल महसूस नहीं हुई.
***
`वो' हमारे घर में पूरी तरह सैटल हो गये थे.
सुबह का  नाश्ता `वो' पापा के साथ ही करके ऑफिस जाते थे- जो की मैं ही सर्व करती थी.कभी-कभी बनाती भी थी. लंच मैं कॉलेज से आकर अकेले करती  थी. दिननेर हम सब साथ ही करते थे.डिनर मैं शबनम आंटी के साथ तैयार करती थी. बाद में डाइनिंग टेबल पर बैठ जाती थी.वो रोटिय बनाती रहती थी और चंपा रोटियां ला-लाकर हमे देती रहती थी .वो तब भी पूरे बीजी रहते थे.
सुबह नाश्ते के समय पेपर पढ़ते रहते थे.
डिनर के  समय भी उनका जबड़ा जितन खाने में चलता था,  उतना ही बिजनेस के डिस्कशन में  चलता रहता था.उस दौरान नॉर्मली पापा पेशेंस से उनकी बातें सुनते रहते थे.और खाना खाते रहते थे.
"ह्म्म्म."-"ठीक है"-"देखेंगे"-----इत्यादि शब्द कहते रहते थे.
मैं मन-ही-मन कुढती रहती थी.
चाहकर भी मैं कुछ नहीं कह पाती थी. डॉ भी था -कहीं भड़ककर शशांक वाले रिश्ते के बारे में बक न दे.
***
शशांक से मेरी बाते होती ही रहती थी. रात को तो हम पहले भी बातें करते थे अब पर्सनल  बातें भी शेयर करने लगे थे. ये मैं पहले ह लिख चुकी हूँ कि मेरी ख्वाहिशों  को पंख लग चुके थे. हर तरफ ख़ुशी-ही-ख़ुशी थी. मन पसंद साथी था- जो मुझे बेइंतेहा प्यार करता था. हम दोनों एक दुसरे को `तू' कि जगह ` तुम' कहने लगे थे.
पढ़ाई से मेरा ध्यान पूरी तरह  से हट गया था.
वैसे किसी ने ठीक ही कहा है- जब प्यार का जहर दिल और दिमाग पर चढ़ जाए तो हर चीज से इन्ट्रेस्ट खत्म हो जाता है और अजीब-सी  खुमारी छा जाती है.
मेरी एक हसीन कल्पनाओ में एक चीज थी- जिससे  मैं निजात पाना चाहती थी. और मुझे पता था कि उनसे आज नहीं तो कल  निजात पा लेने वाली थी भी.
वो थे - मुकुल रस्तोगी.
मगर गलत थी  मैं.
एकदम गलत थी.
अध्याय-१२
सात मई को मेरे ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर के एग्जाम निबटे. मेरे दोस्तों ने टूर का प्रोग्राम बनाया. पापा से भी इजाजत मिल गयी. दस मई को हम मेरठ से रवाना हुए.हमारा पहले पड़ाव लैंसडाउन था. वहां से हम एक-एक करके तमाम हिल स्टेशन देखने वाले थे.हम सब आजाद पंछी थे जिनके पंख तभी कुछ दिनों के लिए खोले हए थे.
सबको पता था- घर जाते ही न केवल टाइम शेड्यूल फोलो करना था, ज्यादातर लडकियों को पता था शायद अकाले शायद वो लास्ट टूर हो.उसके बाद पता नहीं ससुराल वाले कैसे हों?एक-दो ने उस खुलेपन  का पूरा फायदा भी उठाया और रात को  मेल फ्रेंड के रूम में सोई. नेहा मेरे साथ रूम  में रहती थी, पर सोती थी अपने बॉयफ्रेंड के रूम में. मैं अपने रूम में अकेली सोती थी.शशांक को याद करती थी.
***
उस वक्त हम कुफरी में थे.
 सुबह का वक्त था.नाश्ता हम होटल के गार्डन में थे. तब  मेरा फोन बजा. मैंने फोन अपने वूलन ओवरकोट की जेब से बाहर निकाला. उसकी स्क्रीन पर उभरा नम्बर देखा- वो एकदम अजनबी नम्बर था. हालांकि उस वक्त किसी फालतू आदमी से बात करने का मेरा जरा भी मूड नहीं था, फिर भी नम्बर चूंकि मेरठ का था सो कॉल रिसीव की-" हेल्लो."
" हेल्लो. मैं बोल रहा हूँ."-दूसरी तरफ से आवाज उभरी. बेइंतेहा गम्भीर आवाज -" आप इसी समय वापिस लौट आइये. आपका टिकेट एअरपोर्ट पर है. आप जैसे ही एयरोड्रम पर है. आप जैसे ही आप जब एयरोड्रम पर पहनो मुझे  फोन कर देना."
" आप पा के असिस्टेंट बोल रहेआ है न?"-मेरा दिल धड़का.
" हां, मुकुल."
" what happened?"
" सर का मेजर एक्सीडेंट हो गया है."-उन्होंने बताया -"वो दिल्ली में ही एडमिट है. उनकी हालत नाजुक है.....आपकी फ्लाईट एक घंटे बाद है सो जल्दी एयरोड्रम पर पहुँचो.
दूसरी तरफ से फोन कट गया.
मेरे बदन में से जैसे ताकत निकल गयी थी.मैं वहीं घास में घुटनों के बल बैठकर फूट-फूटक्र रोने लगी थी.मेरी हालत देखकर मेरे तमाम दोस्त दौडकर मेरे पास आये. सब घबरा गये थे. नेहा ने घबराकर पूछा-" पलक, क्या हुआ? तू रो क्यों रही है? किसका फोन था?"
" घर से फोन आया था."-मैने रोते हुए बताया-" पा का मेजर एक्सीडेंट हो गया है. वो हॉस्पिटल में है."-साथ ही  एक घंटे बाद  फ्लाईट वाली बात उन्हें बता दी.
***
मेरे दोस्त मुझे तत्काल एयरपोर्ट ले हए. होटल से सामान पैक करने की फुर्सत हममे से किसी को नहीं थी.वहां से अब सीढ़ी उड़न है. मैं दिल्ली डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर जब बाहर निकली तो वो मुझे कार के साथ खड़े मिल गये. उन्हें देखते ही मेरी हिचकिय बांध गयी. सच ये था कि उस पल मुझे एक कंधे  की जरूरत थी. अगर वो मुझे सहारा देते तो मैं उनसे लिपटकर फूट-फूटकर रोटी पर वो हमेशा  की तरह रूड रहे.
" बैठिये ."-कार का रीयर दरवाजा खोलकर रीयर सीट की तरफ इशारा किया. खुश्क लहजे में.
मैं कार में बैठी .
उन्होंने कार का दरवाजा बंद किया और ड्राइवर साइड का दरवाजा खोलकर ड्राइवर वाली सीट और जम गये.कार स्टार्ट की और सडक पर दौड़ा दी.
***
वो मुझे हॉस्पिटल ले हए गये जहाँ पर सिर्फ शबनम आंटी ही पहले मुझ नजर आई.मैं दौडकर उनसे लिपटकर रो पड़ी.
शबनम  आंटी ने मुझे मुझे कसकर अपनी मजबूत बाहों में भर लिया और तसल्ली दी-" रोते नन्ही  मेरी बच्ची. आपके अब्बुजानी जल्दी ही ठीक हो जायेंगे.हम सब हैं न."
उसी समय डॉक्टर के साथ हमारी फर्म के लीगल एडवाइजर और पापा के दोस्त एडवोकेट कपिल  सचदेव भी वहां आ गये.
उन्होंने भी मुझे  तसल्ली दी.
" अंकल."-मैंने एडवोकेट  मिस्टर सचदेव से  पूछा-" मेरे चाचू कहाँ है? अभी वो नहीं  आये?"
" वो लोग वैष्णोदेवी गये है."- मिस्टर सचदेव ने बताया-" मैं उन्हें इन्फोर्म कर चूका हूँ, वो लौट रहे है."
" और मामा जी?"
" वो डीन के केबिन में है ." 
" अब पा की हालत कैसे है?"- सुबकते हुए मैं पूछा 
" he is sorious."- डॉक्टर ने बताया.
तभी एडवोकेट सचदेव ने कहा-" बेटा तुम्हे  कुछ पेपर्स पर साइन करने  है."
उनके एक हाथ में फाइल  थी.उन्होंने कहते ही खोल दी और मेरे सामने कर दी.मैंने फाइल में ही रखा पेन लेकर उससे उन जगहों पर साइन घसीट दिए.
उसके बाद वो मुझे आई.सी. यु.  में ले गये.
***
पापा के पास उस समय मैं और मुकुल गये.
आई. सी. यु. रूम में पापा बिस्तर पर लेटे थे. उनके बदन पर जगह-जगह पर पट्टिया बंधी थी. उन्हें आक्सीजन लगी थी.तब वो होश में थे.
" प-पा....."-मैने अपनी रुलाई पर काबू  करने का प्रयत्न किया. पारदर्शी  आक्सीजन मास्क के अंदर उनके होंठ फडफडाए. पापा की आँखों में हमेशा की तरह प्यार का सागर छलकता दिखा.उस दिन उनमे विवशता   भी दिखी.
उनकी हालत देखकर मेरी आँखों में झर-झर आंसू बहने लगे.
 " इधर...आ ..."-पापा की वेदना पूर्ण बेहद धीमी आवाज मेरे कानों में पड़ी. 
मैं पापा के पास गयी.
पापा के एक हाथ में  ग्लूकोज लगी हुई थी.मैं दुसरे हाथ की तरफ गयी थी.मुकुल मेरे साथ थे.पापा ने मेरा हाथ `उनके' हाथ में थमा दिया. पापा की साँसे उखड़ने लगी थी जब वोबोले-" मुकुल....मेरी फूल-सी बच्ची का ख्याल रखना."
" सर , आप खुद इनका ख्याल रखोगे."-उनका हाथ थामकर मुकुल बोले.
"शब्बो कहाँ है?"- पापा ने पूछा.
" वो यहीं है."
" ओह."-उनके मूंह से निकला. उनकी सांसे उखड़ने लगी थीं.
उसी समय डॉक्टर ने  वहां कदम रखा.
" आपको किसी ने कहा नहीं की मरीज से बात नहीं करनी नही."-डॉक्टर  ने जरा-से सख्त स्वर में कहा.-" आप बाहर जाएं, प्लीज....राईट नाओ."
" सर , ये इनकी बेटी है."-मुकुल ने कहा-"ये मिलना चाहती थी....."
" आई सैड... बाहर जाइए." उस बार डॉक्टर का स्वर और ज्यादा सख्त हो गया.
पापा जोर-जोर से हांफने लगे.
मेरा दिल जोर जोर से धडकने लगा. पापा की हालत अचानक बिगड़ने लगी थी. मैं फिर फूट-फूटकर रो पड़ी.
डॉक्टर ने हमें बाहर निकाल दिया. `वो' मेरे दोनों कन्धों को थामकर बाहर ले गये. बाहर ही शबनम आंटी थी मैं उनसे लिपटकर रोने लगी.डॉक्टर आई. सी. यु. से बाहर निकला और नर्स को बुला लिया.अचानक आई. सी. यु. में हलचलें तेज  होने लगी.
नर्स और वार्ड-बोयस तेजी से अंदर बाहर आ जा रहे थे.
मेरी रुलाई  रुकने का नाम नहीं ले रही थी.शबनम आंटी ने मुझे वात्सल्यपूर्ण भाव स बांहों में भर लिया पर मुझे तसल्ली देने लगी.  हम सब आई.सी यु. रूम के सामने ही खड़े रहे थे. एक घंटे बाद डॉक्टर रूम से बाहर आया तो वो जरा भी जल्दी में नहीं था. वो एकदम शांत था.`वो'  और एडवोकेट सचदेव डॉक्टर के पास   गये. 
" डॉक्टर, अब सर कैसे है?"- `उन्होंने ' पूछा
डॉक्टर ने अत्यंत खेदपूर्ण भाव से अपना सिर हिलाया-" sorry...........he is no more."
मुझपर जैसे वज्रपात हुआ.
तमाम कायनात में मनो भूचाल आ गया था. सब्न्म आंटी से जुदा होकर मैं पागलों की मानिंद चींखती हुई दौडकर आई. सी यु. रूम में गयी.जहां नर्स और वार्डबॉय उनके शरीर से लगे उपकरण हटा रहे थे.
पापा से लिपटकर मैं जर-जर रो पड़ी 
तभी ममेरे दोनों चाचा सुरेन्द्र शर्मा और लखन शर्मा भी वहां आ गये. उनके साथ `वो' , एडवोकेट सचदेव, मेरे नानू,मामा जी,और शबनम आंटी के पति मुस्तफा अली भी वहां आई.सी.यु. रूम में आ गये थे.
अध्याय- १३
मैं तो बोलने तक की हालत में  नहीं रह गयी थी. कुफरी के सर्द माहौल में पहने गये कपड़ों में ही मैं कुफरी से दिल्ली के लिए रवाना हुई थी. पापा की हालत सुनने के बाद तो कपड़ों पर से ध्यान हट गया था . न ही गर्मी को महसूस किया था- ये अलग बात है- ए.सी. में भी -मेरा बदन गर्मी के कारण  मेरा बदन पसीने में नहाया हुआ था.शुक्र था ए.सी. के कारण वातावरण ठंडा था वरना  मेरी हालत बिगड़ जाती. 
पापा के  गुजर जाने के बाद पापा की बॉडी हॉस्पिटल से बाहर निकालने के लिए मेरे चाचाओं ने हॉस्पिटल की बिलिंग इत्यादि पर ध्यान देना शुरू कर दिया था. 
`वो' अचानक गायब हो गये.
आधे घंटे केव बाद `वो' आये. एक पैकेट उनके हाथ में था.मैं तब भी मासूम बच्ची की तरह गुमसुम सी शबनम  आंटी से चिपकी बैठी थी.   
" आंटी,"-`वो' पैकेट आंटी की तरफ बहाते हुए बोले-" इन्हें वाशरूम में ले जाकर इनकी वूलन कोट और फुलोवर निकलवा लो. ये गर्मी से परेशान होंगी. अगर फुलोवर के नीचे भी कोई वूलन कपडा पहन रख हो तो उसे भी उतरवाकर इन्हें ये शर्त पहना देना."
 शबनम आंटी ने वो पैकेट ले लिया. मुझे उठाकर वाशरूम की तरफ लेकर चल दी. मैं रोबोट की तरह उनके साथ चल दी.
***
पापा के  शव को लेकर हम शाम तक दिल्ली से मेरठ आ गये. तब तक काफी अँधेरा हो गया था. सो पापा का शव बर्फ में रख दिया गया. तय किया गया था पापा का अंतिम संस्कार अगले  दिन किया जायेगा. तब तक कई और रिश्तदार आ जाने वाले थे. नेहा तो शाम को ही कुफरी स लौट आई थी. उसे `उन्होंने' ही फोन पर पापा के गुजरने की खबर कर दी थी. खबर मिलते  ही टूर छोडकर वापिस आ गयी थी. वो मुझे मेरे  घर  पर ही मिली उसी देखते मेरी हिचकिय बांध गयीं. उसने आगे बढकर मुझे अपनी  बांहों में भर लिया. वो भी अपनी रुलाई पर काबू  नहीं रख सकी थी.
***
पापा का शव जब अंतिम संस्कार  के  लिए ल जाया गया तो `वो'  पापा की शवयात्रा में शामिल नहीं हुए. मुझे बड़ा  बुरा लगा -जब शव  को कन्धा देने के वक्त पर वो अपने रूम म चल गये. पापा  को दाग मेरे बाद चाचा सुरेन्द्र शर्मा ने दिया था.
उसी दिन मेरे बाद चाचा का पूरा परिवार मेरे घर में आकर रहने लगा. चाचा जी केवल रात को सोने के लिए ही जाया  करते थे. या कुछ टाइम के लिए ऑफिस जाया करते  थे.  छोटे चाचा लखन  शर्मा की फैमिली दिन में हमारे घर में रहती थी. रात को भी कोई न कोई-सी चाची मेरे साथ ही सोती थी. पापा की शव यात्रा से लेकर उनक तीजे  तेहरवीं तक में शबनम आंटी के पति और दामाद अल्ताफ - जो बाईस-तेईस साल का था.सोती गंज में मोटर मैकेनिक था.
पापा की तेहरवी निबट जाने के बाद उस शाम मेरे भविष्य का फैंसला करने के लियी मरी ननसाल और दधियल  परिवार के लोग बैठे. सब घर के ड्राइंग रूम म बैठे थ. पापा क दोस्त और वकील एडवोकेट सचदेव भी वहीं थे.
 `वो' भी एक तरफ उपेक्षित से बैठे थे.
मैं घर की सीढ़ियों पर रेलिंग का सहारा लिए खड़ी थी.
शबनम आंटी मेरे साथ ही थी. मुझ एक-दो स्टेप नीचे.
" पलक अब हमारे घर में रहगी"-सुरेन्द्र चाचा ने कहा-" पलक के लिए बड़े भैया की जो भी जिम्मेदारिय थीं वो मैं पूरी करूंगा."
" और बिजनेस का क्या होगा."-मामा जी बोल-" जीजा जी बिजनेस भी तो छोडकर गये है."
" उसका क्या होना है? वो पलक का था उसी का रहेगा."- चाचा जी नी सहजता स कहा-"  फिलहाल तो फर्म के एग्जिक्यूटिव संभल लेंगे . सारा पैसा खाते में जाता  है. ये चाहे तो खुद फर्म संभल सकती है या भैया की जगह किसी की चीफ एग्जिक्यूटिव बना देंग. इसक शेयर का पैसा तिमाही हिसाब से इसे मिलता रहेगा. "
तब नाना जी बोले-" अगर ये  आपके साथ रहेगी तो इस घर में कौन रहेगा? सवा महीने तक तो घर में दिया जलना जरूरी है वरना घर में भूत बिया जायेंगे."
" घर में किरायेदार तो हैं ना." - सुरेन्द्र चाचा ने कहा-" वो घर में दिया जलाकर रखेगा.नौकर चाकर साफ़ सफाई का पूरा ध्यान रखा करंगे."
तभी एड्वोक्त सचदेव ने गला खंखारकर कहा-" can i say something?"
सबने उनकी तरफ लुक दी.
" मरे मरहूम दोस्त और क्लायंट ने  मरने से पहले ही अपनी बेटी की फ्यूचर का फैंसला कर दिया था."-वो बोले-"अब पलक को कहाँ रहना है कहाँ नहीं-इसका फैंसला उसके हसबैंड को करना है.... मिस्टर मुकुल रस्तोगी से पलक की रजिस्टर्ड मैरिज हॉस्पिटल में ही हो चुकी है. वहां पर आप लोग मौजूद नहीं थ इसीलिए तमाम औपचारिकताएं आपक सामने  नहीं हुई थी."
 सब हैरान रह गये.
मेरा शरीर जैसे जड हो गया था.
मरे तमाम सैंस सुन्न हो गये थे. पता नहीं वेदना की अधिकता थी  या कोई और कारण था -मेरे आंसू तक बाहर न निकल सके. शायद सूख गये  थे.
मेरी जिन्दगी का वो सबसे  बड़ा सरप्राइज था.
मैं सपने में भी  नहीं सोच था -पापा मेरे फ्यूचर का फैंसला इस तरह करेंगे.
अब समझ में आया- मरने से पहले  पापा ने मेरा हाथ `उनके' हाथ में क्यों दिया था?
उन्होंने मेरी जिम्मेदारी ही `उन्हें' नहीं  सौंपी थी बल्कि मुझे ही उनके हवाले कर दिया था.


love diary जारी है ...........